Sardhana of Begum Samru

सरधना – शेरदिल बेगम की रियासत में एक दिन गुज़रे वक़्त के रोमांस और रोमांच से बचा जा सकता है क्या? आपकी राहेगुज़र दिल्ली से यही कोई 100 किलोमीटर दूर सरधना हो तो यकीनन आपका जवाब नहीं ही होगा! चांदनी चौक के बाज़ार-ए-हुस्न में ठुमकती कश्मीरी फरज़ाना से जंग के मैदानों में हुंकार भरती बेगम…

My longest cashless journey in times of demonetisation

How I traversed 3000 kilometers with Rs 80 in my wallet and hope in my heart ”मैडम परवाह नहीं, आप बोलो किधर जाने का है? मैं टैक्सी दूंगा आपको … परवाह नहीं” ”हंपी जाना है… मगर पैसे नहीं है …..  कार्ड लोगे?” “मैडम, जब लौटोगे शाम को तो कार्ड दे देना, दोस्त का पेट्रोल पंप…

Muziris – a voyage into history

लहरों पर विरासत का सफर  ‘गॉड्स ओन कंट्री’ का दम भरने वाले केरल के पर्यटन नक्शे पर कुछ नई रेखाएं तेज़ी से उभर रही हैं। इस नई इबारत की जड़ें अतीत के उन ज़र्द पन्नों तक खिंची चली जाती हैं जहां ईसा से आठ-नौ सौ साल पूर्व में मालाबार तट पर किलोल कर रहा ऐसा…

Glimpses of Himalayan heritage by train

Book Review – “The Kangra Valley Train” by Niyogi Books ‘द कांगड़ा वैली ट्रेन’  लेखिका — प्रेमला घोष | प्रकाशन — नियोगी बुक्स | कीमत — 795/रु | श्रेणी — यात्रा लेखन | पन्ने – 135 जो असल वाली यात्राएं नहीं करते या नहीं कर सकते वो भी ‘आर्मचेयर’ यात्री तो बन ही सकते हैं। और अगर उनके लिए…

In the times of Rowling’s Harry Potter let’s take a turn to Khurja’s Potters

चिमनियों के शहर में खुर्जा से दोबारा वास्ता बना था करीब डेढ़ दशक बाद। पहली बार जब देखा तो सिर्फ शॉपिंग के अड्डे के तौर पर, जहां से सस्ते में ढेरों सामान खरीद लायी थी – सेरेमिक पॉट्स से लेकर सूप बोल्स, प्लेटें, कॉफी मग, कप, टी-पॉट और भी जाने क्या-क्या। फिर वक़्त की बेरहमी…

Haveli Dharampura – tête-à-tête with heritage in the by lanes of Old Delhi

बीते वक़्त की एक मिसाल – हवेली धरमपुरा शहरों को अक्सर आदत होती है सब कुछ निगल जाने की, और नया भूगोल बनाते हुए सबसे पहले वो अपना अतीत निगलते हैं। लेकिन कुछ ईंटे पुरानी बची रह जाती हैं, कुछ गलियां संभाल ली जाती हैं और कुछ पुराने आंगन भी वक़्त रहते या तो बचा लिए…

Date with heritage #MyheritageTrails

मुलाकात विश्व धरोहर के साथ हिंदुस्तान की तमाम विश्व धरोहरों को छू आने का अभियान आसान नहीं है। कुल जमा 365 दिनों में पूरे 32 मुकाम पार करने हैं। मैदानों से समंदर तक, लहरों से बुलंदियों तक, किलों और स्मारकों से जंगलों तक। और जंगल भी बस साधारण जंगल नहीं, सुदूर नॉर्थ ईस्ट में काज़ीरंगा…

An encounter with Zoroastrianism, my journey in Parsi-land

रीतियों—रिवायतों के गलियारों में सफर  मई की उस दोपहर जनपथ पर लगी प्रदर्शनी के एक-एक सैक्शन, फ्रेम दर फ्रेम, प्रतिकृतियों (replicas) के सामने से गुजरते हुए मैं उस धर्म और उसकी स्थापनाओं से पहली बार रूबरू हो रही थी जो ईसाईयत से करीब डेढ़ हजार साल पहले और इस्लाम की जड़ों के फूटने से लगभग…

The White Rann and my nomadic quest

Come closer to your past  ‘’Are you a history buff? Or a researcher? Or a history teacher?’’ ‘’None.’’ My reply to the Gujarat Tourism manager handling bookings for one of the remotest resorts in the country was simple but expressions on his face suggested he was not convinced. Then why are you going to that…

Peeling back the layers of a city’s past #Delhi6

मुज़फ्फर जंग के बहाने विरासत से रूबरू होने की दास्तान  “Any society ignorant of its past is in danger of misunderstanding the present” – Daniel Snowman इतिहास के झरोखों से झांकते हुए, ढहती दीवारों, चटकती मीनारों या रेत होते खंडहरों को टांपते हुए मुझे हमेशा महसूस हुआ है कि मैं यहीं की हूं। स्कूल में…