In the times of Rowling’s Harry Potter let’s take a turn to Khurja’s Potters

चिमनियों के शहर में खुर्जा से दोबारा वास्ता बना था करीब डेढ़ दशक बाद। पहली बार जब देखा तो सिर्फ शॉपिंग के अड्डे के तौर पर, जहां से सस्ते में ढेरों सामान खरीद लायी थी – सेरेमिक पॉट्स से लेकर सूप बोल्स, प्लेटें, कॉफी मग, कप, टी-पॉट और भी जाने क्या-क्या। फिर वक़्त की बेरहमी…

How travelling with mom taught me the secrets of slow travel

सीनियर सिटीज़न पेरेंट्स के संग सफर वाकई है आसान  मैं भूल जाती हूं अपने एजेंडा, अपनी दौड़-भाग वाला पर्यटन, अपनी रफ्तार, अपनी हजारों ख्वाहिशें … मां के साथ सफर का मतलब है, मां, उनकी मंज़िल और मर्जी भी उनकी। बारिश मेरे लिए रोमांस है और उनके लिए कीचड़! पूरे एक सौ अस्सी डिग्री का फर्क…

Haveli Dharampura – tête-à-tête with heritage in the by lanes of Old Delhi

बीते वक़्त की एक मिसाल – हवेली धरमपुरा शहरों को अक्सर आदत होती है सब कुछ निगल जाने की, और नया भूगोल बनाते हुए सबसे पहले वो अपना अतीत निगलते हैं। लेकिन कुछ ईंटे पुरानी बची रह जाती हैं, कुछ गलियां संभाल ली जाती हैं और कुछ पुराने आंगन भी वक़्त रहते या तो बचा लिए…

क्यों Savaari की सवारी रास आ गयी #मस्तMaharashtra में

A review of Savaari Car Rental just to remind ourselves that we need to pat on the back of a good service provider (इन दिनों एक अजब दौर चला है, हम सिर्फ उन सेवाओं/उत्पादों का रिव्यू करते हैं जो मुफ्त पाते हैं, लेकिन अक्सर उनके बारे में तारीफ के दो शब्द लिखना भूल जाते हैं या लिखने…

How the heritage status of a hotel in amchi Mumbai tricked me

Free wi-fi and only wife in the room! बंबई overwhelm करता है, अपनी खूबसूरती या बदसूरती या अपने पेशेवर अंदाज़ या अपनी बेफिक्री और बेताबियों से नहीं बल्कि कदम-कदम पर बदलते अपने तेवर से। शहर भर को पैदल या काली-पीली टैक्सियों से नापते हुए जो छवि बुनी थी मैंने वो ‘too-busy-to-care-what-you-do’ जैसी थी, लेकिन इसे दरकते हुए…

How to spend next two weeks in the capital #Delhi

चलो मिल आएं अपनों से, अपने ही शहर में दूर-दराज के आसमान टटोलने वाले हम सफरबाज़ों को कभी-कभी खुद अपने पंख कतर लेने चाहिए, और निकल पड़ना चाहिए अपने ही आंगन में यहां-वहां जमा अफसानों को टटोलने, नज़ारों को देखने और इसी बहाने अपने आप से मिलने। कितना अलग अहसास होता है न वो जब…

It’s pouring travel in monsoon

सावन की अलबेली गलियां जेठ का महीना लगते ही हमने उस साल अरब सागर से उठती मानसूनी भाप को मुट्ठियों में जमा करने का इंतज़ाम कर लिया था। अल्टीन्हो का सरकारी गैस्ट हाउस एक हफ्ते के लिए हमारा था। मडगांव से पंजिम तक के सफर की वो रात कोई साधारण रात नहीं थी। बादल जैसे…