क्यों Savaari की सवारी रास आ गयी #मस्तMaharashtra में

A review of Savaari Car Rental just to remind ourselves that we need to pat on the back of a good service provider

(इन दिनों एक अजब दौर चला है, हम सिर्फ उन सेवाओं/उत्पादों का रिव्यू करते हैं जो मुफ्त पाते हैं, लेकिन अक्सर उनके बारे में तारीफ के दो शब्द लिखना भूल जाते हैं या लिखने के लिए कोई खास  motivation महसूस नहीं करते जो हमने पैसा चुकाकर खरीदी होती हैं )

पश्चिमी घाट का सफर अनूठा था इस मायने में कि 70 बरस की मां को घुमाया था, सच कहूं तो दौड़ाया था महाराष्ट्र की सड़कों पर। पुणे-बॉम्बे-पंचगनी-महाबलेश्वर-पुणे का वो तूफानी सफर मानसूनी #मस्तMaharashtra जैसा ही था। लगातार, सड़कें नापने के लिए मुझे एक अदद सवारी की दरकार थी, क्योंकि मां के साथ बस और ट्रेन का सफर लगभग नामुमकिन था। Savaari Car Rental की सेवाएं ली, सच्ची बोलूं थोड़ा फिक्रमंद थी क्योंकि अपनी दिल्ली में टैक्सी ड्राइवरों के मिजाज़ और आदतों से आजिज़ आ चुकी हूं। और फिर इतना लंबा सफर, पता नहीं कितना मीटर दौड़ेगा असल में और कितना बिल उठेगा बेईमानी से। हम दिल्ली वाले कितने शक्की हो चले हैं … अपनी सोच पर शर्म तो आयी थी लेकिन सरासर गलत भी नहीं था ऐसा सोचना।

बहरहाल, सवारी कार रेंटल की हैल्पलाइन पर चुटकियों में बुकिंग हो गई, झटपट Etios बुक हो गई मगर असल सफर शुरू होने से दो घंटे पहले संदेश मिला कि हमें अपग्रेड किया गया है। यानी अब पश्चिमी घाट पर हमें दौड़ाने के लिए एक और बेहतर कार दरवाज़े पर होगी। मन खिला था इस खबर पर।

सफर शुरू हुआ, बारिश की बूंदों के संग एफएम के गीत और बीच-बीच में मराठी संगीत की धुनों पर थिरकता हुआ मन। ड्राइवर था तो सही मगर लगभग अदृश्य। सिर्फ अपने काम में मग्न। सहयाद्रि के घुमावदार रास्तों पर बेफिक्री से आगे बढ़ती हुई हम दो जान, हमारी रेंटल  कार और हमारा उड़ता-तिरता मन। गाड़ी जैसे ड्राइवर विहीन थी, ऐसा भी हो सकता है कि कोई आपको सेवाएं तो दे लेकिन तकलीफ ज़रा भी नहीं। और जहां मन हुआ हम रुकते रहे, चलते रहे, चाय-वाय के ब्रेक लेते रहे।

देखते ही देखते हमारी मंजिल हमारे कदमों तले थी। बस यहीं असल परीक्षा थी हमारे ड्राइवर की। हमारे पास कोई एडवांस बुकिंग नहीं थी। हमें महाबलेश्वर पहुंचकर ही अपने लिए ठिकाना चुनना था। बारिश ने पूरे शहर को अपने शिकंजे में ले रखा था। पता चला बीते पंद्रह दिनों से महाबलेश्वर के आसमान ने चुप्पी नहीं धारण की थी। मूसलाधार बारिश, रुक-रुककर बारिश और कभी बस हौले-हौले से मचलती बारिश … पता नहीं कितने किस्मों की बारिश गिर रही थी उस ज़मीन पर।

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Road to Old Mahabaleshwar

कार से रेसोर्ट के रिसेप्शन तक की दूरी नापने में भीग जाने के पूरे आसार थे। सवारी कार रेंटल के ड्राइवर की ड्यूटी में कहीं नहीं लिखा था कि वो हमारे लिए एक छतरी भी साथ लेकर चलेगा। लेकिन मेरे कार से उतरने से पहले ही उसने दौड़कर कार की डिग्गी खोली और छतरी मेरे सिर पर तान दी। अब मेरे कदम रिसेप्शन की तरफ बढ़ रहे और वो साथ में चल रहा था, छतरी ताने। ठीक उस पल मैं दो अहसासों से गुजरी थी, एक जैसे कोई राजकुमारी हूं जिसे मौसम की ज्यादती से बचाने का जतन हर कोई कर रहा था। और ठीक उसी वक्त मेरे मिडिल क्लास संस्कारों ने मुझे झिंझोड़ा था, मैं असहज हुई थी। मेरे सिर पर छतरी ताने कोई और चले? मैंने ड्राइवर के हाथों से छतरी ली, उसे गाड़ी में बैठकर इंतज़ार करने को कहा और रेसोर्ट बुक कराने चल दी। बुकिंग भी चुटकियों का खेल साबित हुई।

MTDC का बारिश से नहाया रेसोर्ट का वो नन्हा सा कॉटेज हमारा था।

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मैंने जाने क्या सोचकर एकतरफा बुकिंग ही करायी थी सवारी के साथ, यानि मुंबई से महाबलेश्वर की ड्रॉपिंग ही ली थी, हालांकि कंपनी की पॉलिसी के मुताबिक मुझे दोतरफा दूरी का भुगतान करना था। लेकिन मेरा मन रुकने का था, सोचा क्यों कई रोज़ किसी कैब सर्विस को गले लटकाकर रखा जाए। बहरहाल, आलम कुछ ऐसा बना कि अगले ही रोज़ लौटने की तैयारी भी हो गई। दोबारा कंपनी को फोन लगाया। पक्का यकीन था, अब नए सिरे से कुछ पैसा वसूला जाएगा, कुछ तो अफसाना सुनाया जाएगा, कोई तो नियम होगा जिसकी आड़ में हमसे कुछ एक्स्ट्रा भुगतान करवाया ही जाएगा। लेकिन हैरान थे हम जब बड़े प्रेम से हैल्पलाइन एग्ज़ीक्युटिव ने बताया कि वही बुकिंग लागू रहेगी, उतने ही पैसे, उन्हीं शर्तों पर जो शुरू में तय हुए थे। … और वाकई, अगले दिन जब लौटे, नए-पुराने महाबलेश्वर-पंचगनी की सड़कों को सिरे से नापने के बाद तो कंपनी ने वही मूल बिल हमारे नाम जारी कर दिया जो तय था। बिलों में ये ट्रांसपेरेंसी? कायम है? अब भी? बरसते मौसम में, किसी दूर हिल स्टेशन पर दो अकेली जान से कुछ भी ज्यादा ऐंठने की कोई नीयत नहीं ? आपको लग रहा है मुझे फालतू हैरानी हुई थी, हुजूर अचरज हुआ था हमें, दिल्ली के जो ठहरे ! इतनी दफा ठगे गए हैं अपने ही शहर में कि अब हर शहर में उसी अनुभव से गुजरने का गुमान होता है ..

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Santosh, caring driver of Savaari helping mom come out on a busy road

Note – This post is a tribute to the driver Santosh of Savaari Car Rental who made me realise that we may hire services virtually but what comes along as a package is humane quality. Thank You Savaari Car Rental for the experience.

Disclaimer : This is NOT a paid review. I paid for the services of Savaari Car Rental.

Untitled

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5 thoughts on “क्यों Savaari की सवारी रास आ गयी #मस्तMaharashtra में

    • yes, reliable and no fuss services are less but what is lesser is our own reluctance to let others know about our sweet experiences. We are always ready to flood social media by sharing our bitter experiences but shy away from saying a heartfelt thankyou note to a small time driver.

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  1. Very very sensitive portrayal. In the North, one really has to be on one’s guard , prepare for the worst and hope for the best.
    It’s good to read the narrative in free flowing Hindi.
    Thanks for sharing your experience.

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    • शुक्रिया मेरे इस छोटे-से, निजी अनुभव को पढ़ने और अपनी राय से वाकिफ कराने का। यह सच है कि उत्तर भारत में इतनी बेफिक्री अब नहीं रही, महाराष्ट्र में पूरे सात दिन, सड़कों-होटलों पर बिना किसी फिक्र के जिए, उस अहसास को बांटे बगैर भी नहीं रहा गया, लिहाज़ा ये वाली पोस्ट

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  2. We expect a good service when we pay for it. But being (ab)used to a dismal service at most of the time, such nice service really gives us pleasure and the vendor gets a lifetime loyalty besides references. It’s the time that service companies start valuing such goodwill. Nice post Alka.

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