What you should know before travelling into the thin air – winter in Ladakh

सर्दीले दिन-रात और लद्दाख का सफर

कैसा होगा जनवरी में लेह का नज़ारा ? क्या ठहरने का ठीक-ठाक मुकाम मिलेगा? मुझ वेजीटेरियन जीव को खाना नसीब होगा? पानी मिलेगा? क्या कड़ाके की शुष्क ठंड हम महानगरों में पले-बड़े जीवों को बर्दाश्त होगी? और क्या लद्दाखी जमीन पर बेरहम सर्द दिन-रात के हिसाब से हम एक्लीमटाइज़ हो पाएंगे? ऐसे ही सवालों से जूझते हुए नए साल की एक सुबह मैंने दिल्ली को अलविदा कहा और लेह के छोटे-से कुशोक बाकुला रिनपोछे हवाईअड्डे पर उतर गई।

महज़ सत्तर मिनट में मेरी काया समुद्रतल से साढ़े ग्यारह हज़ार फुट की उंचाई पर पहुंच चुकी थी। विमान को लेह के हवाईअड्डे पर उतारने से पहले पायलट ने बाहर का जो तापमान बताया था उसे सुनकर रोमांच की सिहरन पूरे बदन में दौड़ी थी। दोपहर के ग्यारह बजे थे और तापमान शून्य से छह डिग्री नीचे था। विमान से बाहर निकलने पर लेह की बदनाम हवाओं में घिरकर ठंड का असल अहसास और भी बढ़ गया था।

कड़कती ठंड में लद्दाख का सफर –  कैसे पहुंचे ?

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सर्दियों में लद्दाख के सफर की तैयारी में सबसे अहम् होता है हवाई रास्ते से लेह में प्रवेश का इंतज़ाम करना। दरअसल, श्रीनगर-लेह हाइवे और मनाली-लेह हाइवे सर्दियों में बंद हो जाते हैं। अब इस बर्फीली कोठरी में पहुंचने की एक ही राह बचती है। एयर इंडिया, गो एयर, जेट एयरवेज़ जैसी कई एयरलाइंस दिल्ली से लेह तक की सीधी उड़ानों का संचालन करती हैं। अगर आप सोचते हैं कि सर्दियों में इस रूट पर कौन जाता होगा जो तो ज़रा लेह की टिकट कटाकर देखना। अच्छी खासी आॅक्यूपेंसी होती है सर्दी में भी इन विमानों में, लद्दाख का सड़क संपर्क कटने के बाद यही रास्ता जो बचता है इस आसमान में टंगी सरज़मीं तक पहुंचने का।

क्या हाड़-मांस गलाती सर्दी में होटल खुले होते हैं ?

दस साल पहले लेह के अपने पहले सफर में जाना था कि उस जगह एक भी ऐसा होटल नहीं है जो साल के 365 दिन खुलता हो। अक्टूबर आते-आते ज्यादातर होटल बंद हो जाते हैं, कारोबारी और कर्मचारी लौट जाते हैं और फिर अप्रैल-मई में गर्मी की आहट पाकर ही दोबारा काम शुरू होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सर्दियों में लेह का रुख कोई नहीं करता था/है। लद्दाखियों के घरों के दरवाज़े खुले होते हैं और अब तो होम-स्टे के रूप में कई विकल्प मिल जाते हैं। तो भी पहले से सब तय कर लेने में समझदारी है।

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हमने अपने ठिकाने के तौर पर होटल ग्रैंड ड्रैगन को चुना था। दिन और रात सर्दी में लिपटी जरूर थीं लेकिन मेहमाननवाज़ी में जो गरमाइश होती है उसका अहसास कराया था होटल ग्रैंड ड्रैगन ने। जब लेह में होटल-रेस्टॉरेंट अपने दरवाज़े बंद कर लेते हैं, जब पानी जमकर पाइपों में दौड़ना बंद कर देता है और पर्यटकों की आमद गिर जाती है, उस वक़्त भी इस होटल के दरवाज़े मेहमानों के लिए खुले रहते हैं। पूरे लद्दाख में ऐसे ठिकानों को उंगलियों पर गिना जा सकता है।

होम-स्टे में लद्दाखी मेहमाननवाज़ी की गरमाइश

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cosy interiors of a Ladakhi home stay @Alchi near Leh

सर्दी में लद्दाख जाना बस यों ही उठकर कहीं भी चले आने जैसा नहीं होता, क्योंकि आप औसतन तीन हजार मीटर उंची ज़मीन होते हो। लंबी तैयारी जरूरी है और उसी तैयारी का एक अहम् पहलू होता है आपके ठहरने का ठिकाना। आप अपने बजट और पर्यटन के मिजाज़ के हिसाब से ग्रैंड ड्रैगन जैसे लग्ज़री ठिकाने या होम-स्टे के विकल्पों को चुन सकते हैं।

मौसम और उंचाई से तालमेल – एक्लीमेटाइज़ेशन के नाम 48 घंटे

पैकेज टूर आॅपरेटर आपको नहीं बताते कि लद्दाख जाना बेंगलुरु—चेन्नई की यात्रा जैसा बिल्कुल नहीं होता। 24 से 48 घंटे होटल में रहकर एक्लीमेटाइज़ेशन के नाम गुजारने होते हैं। वैसे भी आक्सीजन की मामूली-सी मात्रा अपनी हवाओं में रखने वाले लद्दाख में सांस का उखड़ना इतना आम होता है कि खुद ही बिस्तर-कुर्सी छोड़ने की हिम्मत नहीं पड़ती। नहाना बहुत बड़ा काम लगता है और उससे भी बड़ा काम होता है अपनी काया को ढोकर खाने की मेज तक ले जाना। 24 से 48 घंटे आराम नहीं किया तो एएमएस यानी आल्टीट्यूड माउंटेन सिकनेस का खतरा तैयार रहता है, खासतौर पर उनके लिए जो हवाई सफर से यहां पहुंचते हैं।

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Endless supply of garlic soup

लेह पहुंचने पर अगले दो रोज़ होटल में रहते हुए सारे लोकल नुस्खे आजमाती रही – काहवा से गार्लिक सूप तक, खूब पानी पीने से लेकर तीनों वक़्त भरपूर संतुलित खाने तक।

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Drinking lots and lots of water helps in acclimatisation

कहा था न, लद्दाख का सफर मखौल नहीं होता। ऐसी नौबत भी आ जाती है! दूसरा दिन बीतते-बीतते भी डॉक्टरी जांच में मेरा आॅक्सीजन लैवल जब नॉर्मल नहीं पाया गया तो इस सिलेंडर की शरण लेनी पड़ी।

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बहरहाल, सफर शुरू हो चुका था, यों तकनीकी तौर पर मेरा सफर दिल्ली से रवाना होने से 48 घंटे पहले डायमॉक्स की उस गोली के साथ शुरू हो गया था जिसे एक्लीमेटाइज़ेशन की तैयारी के नाम पर घर में लेना शुरू कर दिया था। इस बर्फीले और बेहद उंचे रेगिस्तान में आना वाकई शारीरिक फिटनैस की अपेक्षा रखता है। अपने पिछले सफर में कई सबक लेकर लौटी थी और शरीर को यहां के हिसाब से ढालना कितना जरूरी है यह भी उसी सबक का हिस्सा है।

मेरे कमरे की खिड़की से झांकती स्तोक कांगड़ी की ग्लेश्यिरों से पटी पर्वत श्रृंखला ने अद्भुत कुदरती कैनवस बिछा रखा था। इन चोटियों पर सवेरे की थिरकती धूप को धीरे-धीरे पूरे पहाड़ को अपने आगोश में लेने का कुदरती खेल देखने मैं हर दिन सवेरे​ खिड़की पर टंग जाती थी।

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और मुझसे भी पहले होटल के टैरेस में जमा हो चुकी होती थी फोटोग्राफरों की वो टीम जो सर्दी में लदृाखी रोमांस को कैमरों में समेटने आए थे। उनके सिवाय कोई और टूरिस्ट पूरे सफर में नहीं दिखा था। सुकून था कि रैंचो का स्कूल देखने और सिर्फ पैंगोंग को ही लद्दाख समझने की भूल करने वाले टूरिस्ट इस विषम मौसम में कहीं नहीं थे।

सर्दियों में लद्दाखी सड़कों पर टैक्सियां दिखती हैं ?

जनवरी में जब हम लेह में उतरे थे तो लेह की सरज़मीं को लेकर मेरी कल्पनाओं को पहला झटका लगा था। सड़कों पर बर्फ के गलीचे बिछे होंगे, शहर भर में जगह-जगह आइस-कटर काम में जुटे होंगे, पैदल चलना मुहाल होगा और गाड़ियों के पहिए चेन में सिमटकर घिसटते होंगे… माइनस में तापमान देखकर ऐसा सोच लेना गलत भी नहीं था। लेकिन लेह की ज़मीन बिल्कुल वैसी मिली जैसी जून-जुलाई में मिलती है। बिन बर्फ की फर्राटा सड़कों पर हम इनोवा में रफ्तार से दौड़ते रहे थे, 4X4 की जरूरत सिर्फ खारडूंग-ला जैसे बर्फ से ढके दर्रों को पार करने के लिए होती है यहां। हम चिलिंग से लेकर लद्दाख के आखिरी छोर पर खड़े लामायुरू तक दौड़ आए थे मगर हाथ बर्फ की छुअन से महरूम बने रहे। लोकल लद्दाखियों से मैंने कितनी ही बार सुना कि अब उतनी सर्दी उनके इलाके में भी नहीं पड़ती जितनी कुछ साल पहले तक पड़ा करती थी।

लद्दाख में सर्दियों में भी जिंदगी चलती है।

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This mother and child were out collecting water in -8°C

और हां, टैक्सियां भी दौड़ती रहती हैं। दूर के मुसाफिरों के लिए इक्का-दुक्का चलने वाली बसें भी भूले-भटके दिख जाती हैं।

सर्दियों में वेजीटेरियन के लिए विकल्प होते हैं ?

लद्दाखी समाज में मांस का सेवन आम है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वेजीटेरियन लोगों को खाने-पीने की परेशानी होगी। हमारे ग्रुप में हम पांच लोग वेजीटेरियन थे और पूरे सफर में हमें खाने को लेकर कोई जद्दो-जहद नहीं करनी पड़ी। ब्रेड-बटर, जूस, फल, मेवे, पनीर, सब्जियां, सूप, काहवा … वाकई मैन्यू में कई-कई विकल्प हमारे लिए भी थे। अब ये रही बात लग्ज़री ठिकाने की। आप होम-स्टे में रुकते हैं तो वहां भी आपके हॉस्ट आपके लिए वेजीटेरियन भोजन उत्साह से परोसते हैं।

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enough for the vegetarian souls even in winter

कितना होता है सर्दियों में तापमान

जनवरी के दूसरे हफ्ते में सबसे ‘गरम’ दिन का तापमान -3°C डिग्री था! सूरज दिन भर चमकता है और दोपहर बाद धीरे-धीरे सर्दी अपने आगोश में लेने लगती है। शाम ढलते-ढलते होटल से बाहर निकलना लगभग नामुमकिन हो जाता है। यही वक़्त होता था जब मैं रिसेप्शन पर लगी स्क्रीन पर लुढ़कते तापमान को देखने से खुद को रोक नहीं पाती थी। डिनर टाइम तक पारा माइनस दस पहुंच जाता था। और आधी रात के वक़्त जब कभी नींद खुली (जो बार-बार खुलती है क्योंकि उस कम हवा में नींद को भी कहां करार आता है) तो -16°C देखकर सिहरन के साथ-साथ होंठों पर भी मुस्कुराहट फैल जाती थी। मैं अपने ही रिकार्ड की धज्जियां उड़ा रही थी, इससे पहले -9°C तक सहा है।

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मुस्कुराहट की वजह पता है क्या थी? मेरा पहाड़ी डीएनए जो बर्फ और सर्दी में सुकून पा रहा था। अपनी जड़ों की तरफ लौटना खुशनुमा अहसास से भर जाता है, लेह का सफर ऐसा ही था। मन का नाचना लाज़िम था…

लद्दाख – सर्दियों में क्यों जाएं ?

ज्यादातर होटल बंद होने का मतलब है कि सर्दियों में लद्दाख में ज्यादा टूरिस्ट नहीं पहुंचते। यानी सड़कें और दूसरे ठिकाने खाली होते हैं। ज़रा सोचकर देखिए, दिल्ली से महज़ एक घंटे दस मिनट की दूरी पर एक ऐसी जमीन है जहां ठंड के महीनों में पहुंचने वाले लोगों की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है, जहां जाने के लिए हवाई टिकट भी साल के दूसरे महीनों के मुकाबले कमोबेश सस्ते हो जाते हैं, जहां कुदरत इन दिनों पूरा कैनवस किसी और ही अंदाज़ में रंग चुकी होती है .. और जहां आप हवाओं में अपनी सांसों को सुन सकते हो, खुद से मिल सकते हो, खुद को टटोल सकते हो, खुद से बातें कर सकते हो।

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winter landscape – when Nature adorns a special hue

अब भी कुछ सोचना बाकी है क्या?

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One thought on “What you should know before travelling into the thin air – winter in Ladakh

  1. A beautiful ready reckoner of sorts, Alka ma’am. While the thought of being in such harsh temperature (-16°C!) gave me goosebumps, the photos of striking landscape and Ladakhi hospitality were welcoming enough to warm the cockles of my heart. 🙂

    Hope to see Ladakh soon – it’s summer splendour and winter wonderland, both!

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