My annual pilgrimage to #Jaipur for #ZeeJLF

 जयपुर लिट फैस्ट के बहाने आवारगी

जयपुर कभी सिर्फ सैलानियों और खरीदारों की मंजिल था, आज आखर का मेला भी इसकी पहचान देश-दुनिया तक पहुंचा रहा है। जब गुलाबी नगरी में हर्फों और लफ्ज़ों के शामियाने तन जाते हैं तो इसकी हर सड़क सिर्फ डिग्गी पैलेस तक पहुंचती है।  साहित्य की इसी रासलीला में गोते लगाकर लौटी हूं बीते हफ्ते। 

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Diggi Palace, Jaipur

मुझे लगता है लिटरेचर तो बहाना है, इसकी आड़ में NH8 पर फर्राटा गाड़ी भगाने का जो मौका मिलता है वही शायद असल प्रेरणा है। जनवरी की सर्द सुबह कुहरे और ओस में नहाए हाइवे पर दौड़ते हुए जब स्टीयरिंग व्हील पर नहीं होती तो मेरा यायावरी मन इस खेल में रमा होता है — खिड़की के शीशों पर कुछ दर्ज करते-मिटाते हुए …

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इन खेतों के गिर्द कसते शहरी शिकंजों को देखते हुए सफर जारी रहता है। दिल्ली से जयपुर तक NH8 का सफर कभी बासी नहीं लगता। बातों-बातों में शहर की हदों के भीतर पहुंच जाते हैं। हालांकि दिल्ली – जयपुर की दूरी करीब-करीब पौने तीन सौ किलोमीटर है लेकिन एक बार गुड़गांव-मानेसर पार हो जाए तो आपकी गाड़ी को पंख लग जाते हैं। आवारा मन तो पहले से ही उड़ान में होता है!

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somewhere on Delhi_Jaipur highway (NH8)

डिग्गी पैलेस का आंगन और लफ्ज़ों-हर्फों के रंगमंच

रेगिस्तान की धूप जब चिलचिलाती नहीं बल्कि सुहाती है और जनवरी में जयपुर का पारा दिन में डिग्गी पैलेस के आंगन में शब्दों को दुलारता है ठीक उस वक़्त जयपुर लिटरैचर फेस्टिवल ( click here for website ) जैसा पांच दिवसीय आयोजन यह अहसास करा जाता है कि साहित्य की दुनिया आज भी आबाद है। सिर्फ आबाद ही क्यों, उसमें गर्मजोशी है दुनियाभर से आए शब्द-शिल्पियों से लेकर युद्ध के मोर्चे से खबर परोसने वाले पत्रकारों की, उसमें नरमी है सीने में उलझी नज़्म को धूपीले आंगन में तैराते गुलज़ार की शख्सियत की और कहीं किसी कोने में महक है आदिवाणी से लेकर भक्ति वाणी जैसे देसी साहित्य की।

और इसी महक में सराबोर होने के लिए बीते कितने ही सालों से जनवरी के 2-3 दिन इस शहर के नाम करती आ रही हूं।

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फैशन से फिल्म तकसब कुछ दिखता है लिटफेस्ट में!

साहित्य के आधुनिक मेले विशुद्ध तौर पर किताबों और लेखकों के इर्द-गिर्द ही नहीं सिमटे होते हैं। बीते सालों में इनमें फैशन, खान-पान, संगीत, नृत्य, फिल्म, नाटक और यहां तक कि कठपुतली शो जैसे रोचक तत्व भी जुड़े हैं। जेएलएफ भी बिल्कुल ऐसा ही है। यह खालिस साहित्य का मेला कभी नहीं रहा। जनवरी के मौसम में जयपुर पधारे सैलानियों से लेकर स्कूल-कॉलेज के छात्रों ने मेले को हमेशा जवान बनाए रखा है।

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लिटेरेरी फैस्ट की दुनिया में और बहुत कुछ

जेएलएफ में डिग्गी पैलेस से लेकर अल्बर्ट हॉल और आमेर दुर्ग, नारायण निवास समेत दस-बारह ठिकानों पर फैली साहित्यकारों-कलाकारों की महफिलों में दौड़ते-भागते दर्शकों की दीवानगी को महसूस करना बहुत मुश्किल नहीं होता। कितने ही हैं जो सालों से इस सालाना जश्न में चले आ रहे हैं। दुनिया के सबसे बड़े मुफ्त साहित्यिक मेले के तौर पर खुद को प्रचारित करने वाले जयपुर लिट फैस्ट के बहाने पढ़ाकुओं और लेखकों के रिश्तों में नया आयाम जुड़ा है। जेएलएफ के आंगन में युवाओं के हाथों में सजी किताबें आश्वस्त करती हैं कि वहां सिर्फ सैल्फी स्टिक ही नहीं बल्कि साहित्य के मोती भी पहुंचते हैं। बुक लॉन्च के मंचों से लेकर आॅथर्स आॅटोग्राफ किओस्कों पर जमा भीड़ इस सुखद अहसास से भर जाती है कि किंडल और ई-बुक्स की दुनिया फिलहाल छपाई पर भारी नहीं पड़ी है।

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बीतें सालों में कई बार जेएलएफ को छू आने से इतना तो खुद को यकीन दिला चुकी हूं कि साहित्य और कलाओं के मंच चाहे कितनी दूर सजते रहेंगे मुझ जैसे यायावर वहां-वहां पहुंचते रहेंगे। एक तीर से दो-दो निशाने साधने का रोमांच अलग ही होता है।

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With travel bloggers Shubham Mansingka (left) and Mariellen Ward (right) @Diggi Palace, Jaipur

और इस बहाने कुछ परदेसी भी मिलते हैं। वैसे डिग्गी पैलेस और लंदन की आॅक्सफर्ड स्ट्रीट में मुझे एक गज़ब की समानता दिखायी देने लगी है और वो यह कि यहां आपको कोई न कोई परिचित चेहरा जरूर दिख जाता है।

जेएलएफ के आंगन में दस्तक देता बदलाव 

खुद को दुनिया का सबसे बड़ा मुफ्त साहित्यिक मेला कहकर प्रचारित करने वाले जेएएलएफ में वैसे अब सब-कुछ मुफ्त नहीं रह गया है। अभी कुछ साल पहले तक डिग्गीपुरी चाय से भरे मुफ्त कुल्हड़ साहित्य के दीवानों को जनवरी की सर्द हवाओं में गरमाइश का अहसास करा जाने के लिए काफी हुआ करते थे। अब कुल्हड़ का आकार सिमट चुका है और उस पर प्राइस टैग भी चस्पां हो गया है! मेला सभी के लिए खुला है मगर इसके लिए रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है। बीते साल तक रजिस्ट्रेशन आॅनलाइन या आॅन-स्पॉट मुफ्त होता था। इस बार से पहली बार आॅन-स्पॉट रजिस्ट्रेशन पर 100/रु का खर्च भी जोड़ दिया गया है। डिग्गी पैलेस में चर्चाओं के लिए तय चारबाग, ​बैठक, संवाद, फ्रंट लॉन, दरबार हाल जैसे मंचीय संसार को छोड़ कुछ कोने सिर्फ और सिर्फ कमर्शियल हैं जिनमें कॉफी-चाय-बियर-​वाइन से लेकर कारपेट-शॉल-स्टोल से लेकर जैम-कुकीज़ तक बिकने पहुंचते हैं। वैसे इसमें भी बुरा क्या है? साहित्य का मेला है, कलाओं के कितने ही मंच हैं, कलाकारों के जज़्बात हैं, साहित्यकारों के बयान हैं, नेताओं के ऐलान हैं तो फिर मेले में उस सबसे परहेज़ क्यों जो इस साहित्य के जमावड़े को असली वाले मेले का रंग भी देते हैं।

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कुछ प्रमुख साहित्य मेले आप आने वाले दिनों में इन शहरों में देख सकते हैं

  • टाटा लिटरेचर लाइव! द मुंबई लिट फेस्ट
  • कुमांऊ लिटरेचर फेस्टिवल
  • मसूरी माउंटेन राइटर्स फेस्टिवल
  • अमेजॉन ‘किंडललिटफेस्टएक्स’
  • पूना लिटरेचर फेस्टिवल
  • कसौली लिटरेचर फेस्टिवल
  • समन्वय भाषा उत्सव (नई दिल्ली)
  • गोवा आर्ट्स एंड लिटरेचर फेस्टिवल
  • हैदराबाद लिटरेचर फेस्टिवल
  • माउंटेन इकोज़
  • खुशवंत सिंह कसौली लिट फैस्ट
  • दिल्ली लिटरेचर फैस्टिवल
  • संगरूर हेरिटेज एंड लिटरेरी फेस्टिवल

 

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9 thoughts on “My annual pilgrimage to #Jaipur for #ZeeJLF

  1. jlf अब सिर्फ साहित्य की बजाय लाइफस्टाइल फेस्टिवल बन गया है। ये अच्छा है या बुरा कहना मुश्किल है क्योंकि सब के अपने अपने तर्क है। लेकिन ये सच है की भीड़ देखते हुए कुछ करना जरुरी है आखिर सब साहित्य सुनने या पढने नहीं आते। बहुत से लोग जो साहित्य सुनना पसंद करते है वो अब jlf नहीं आना पसंद करते। कारण – चलने और बैठने को जगह नहीं, ऐसा लगता है किसी फैशन मेल में आ गये , चलते जा रहे है क्योंकि पीछे से लोग धक्का दिए जा रहे हैं। कहीं ऐसा ना हो कि साहित्य प्रेमी jlf से दूरी बना ले।

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  2. आपसे पूरा इत्त्फाक है मुझे। खुद मेरी स्थिति यही है कि आगे से इस मेले को अलविदा कहा जाए, क्योंकि साहित्यकारों को सुनने, उनसे रूबरू होने की बजाय अब काजोल-करण जौहर ज्यादा दिखते-सुनाई देते हैं। बेशक, एक्टर्स से कोई एलर्जी नहीं है मुझे लेकिन मैं और शायद मेरे जैसे और भी कई हैं जो जेएलएफ की हाजिरी साहित्यकारों को सुनने उनसे रूबरू होने के लिए ही बजाते हैं।

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  3. बहुतों को चिंता होने लगी है कि इस साहित्यिक मेले में आने वाले दिनों में साहित्य के नाम पर शायद सिर्फ नाम में ‘लिट फेस्ट’ बचा रह जाएगा 🙂
    मौका लगे तो मेरा विस्तृत विश्लेषण पढ़ना –
    http://bit.ly/1Tv5bEv

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  4. साहित्य व सहित्यकार इस परिपेक्श में कहाँ है व jlf का भविष्य क्या होगा। क्या इस भीड़ में इन दोनों के साथ न्याय किया जा रहा है? शायद jlf में बाजार हावी हो गया है। अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार इस मंच को इसलिए ही छोड़ रहे है। पर अभी इसे पूरी तरह नगण्य मानना भी गलत होगा। जैसे आपने लिखा हो सकता है कि अन्य नए साहित्य के मेले अब ज्यादा लोगो को आकर्षित कर पायें। समय ही बताएगा।

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  5. अलका जी मैंने आपके द्वारा दिया लिंक पढ़ा। ये अब समय बताएगा कि jlf किस दिशा में बढेगा। लिंक के लिए धन्यवाद।

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