My journey to a world frozen in time – Ladakh in winter

कुदरत के खेल देखने हों तो बाम-ए-दुनिया (roof of the world) के आसमानी सफर पर जरूर जाना चाहिए। दिल्ली से लेह की सिर्फ एक घंटे बीस मिनट की उड़ान में जरूर सवार होना कभी। आधे घंटे बाद ही पहाड़ों की झलकियां शुरू हो जाती हैं और 40 मिनट बीतते-बीतते आप खिड़की से ऐसे चिपक जाएंगे कि कोई हटा नहीं सकेगा। कभी अपनी आंख से और कभी कैमरे की आंख से, बार-बार हिमालयी श्रृंखलाओं को देखते जाना ज्यॉग्राफी की क्लास के 3D view देखने जैसा लगता है। हम शहरी लोगों के लिए नदियां जिस रूप में सामने आती हैं वो दरअसल, अपने जन्मस्थान पर बिल्कुल भी वैसी नहीं होतीं। वे ऐसी होती हैं जैसी इन तस्वीरों में दिख रही हैं, ध्यान से देखिए उन पतली लकीरों को, पहाड़ी चोटियों के आंगन से सरकती ये लकीरें ही वो नदियां हैं जिन्हें हम कभी दिल्ली में किसी नाले की शक्ल में पहचानते हैं या काशी के तट पर एकदम सीवर के पानी में बदल चुकी गंगा का नाम देते हैं।
CYCrmv3W8AA_DU4लद्दाख के कुशोक बाकुला रिनपोछे हवाईअड्डे पर सवेरे के सवा ग्यारह बजे हमारा विमान आ लगा था। उस नन्हे से हवाईअड्डे पर जब तक आप अपने बस्ते को कंधे पर लटकाते हैं, सिर उठाते हैं और एक हल्की-सी नज़र जंस्कार रेंज से घिरी उस हवाईपट्टी पर डालते हैं जिस पर पता नहीं किस हुनर से पायलट ने जहाज़ उतारा होता है, बस उन 10-20 सेकंड में ही आप हवाईअड्डे के लाउंज में भी दाखिल हो चुके होते हैं! 11,500 फुट पर बने इस मिनी एयरपोर्ट पर आपको अमूमन किसी बस की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन बाहर का तापमान अगर दोपहर में भी माइनस छह हो और उस पर लद्दाख की बदनाम हवाओं की सांय-सांय कानों में टूट पड़ती हो तो आप झट से इस वाहन में दुबकना पसंद करते हैं!

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इस बार सर्दी में लद्दाख के सफर की हमारी शुरूआत कुछ इस तरह हुई थी। लाउंज में अपने सामान के इंतज़ार में हर किसी के पास एक ही काम था, खुद को टोपी, मफलर, शॉल में लपेटना। देखते ही देखते मेरे आसपास खड़े चेहरे बदलने लगे थे क्योंकि अब हर कोई भारी जैकेट में सिमट रहा था, खुद को ढक रहा था .. वैसे मुझे उस रोज़ लगा था कि ये माइनस-वाइनस तापमान मनोवैज्ञानिक ज्यादा होता है। या फिर शायद माइनस छह और माइनस बारह या माइनस अठारह में कोई ज्यादा फासला नहीं रह जाता। शायद ऐसा सोचने की ठोस वजह मेरे पास थी। मैं पिछली दफा की तरह सेना के सियाचिन बेस कैंप के ‘बेसिक’ सुविधाओं वाले ठिकाने में नहीं बल्कि लद्दाख में लग्ज़री ठौर के रूप में अपनी पहचान बना चुके #The Grand Dragon Ladakh click here for accomodation में रुकी थी। मौसम की मार से बेखबर, अगले दो रोज़ सिर्फ acclimatisation के नाम गुजार दिए थे। हॉस्पीटेलिटी में जो गरमाइश होती है उसका अहसास कराया था ग्रैंड ड्रैगन ने।

Deluxe Room --The Grand Dragon Hotel Ladakh

View of Stok Kangri range from my room

पूरे 48 घंटे होटल में बंद रहने के बाद तीसरे रोज़ हम लामायारू और चिलिंग के सफर पर निकल पड़े थे। लद्दाखियों के जज़्बे की मत पूछिए। हम जब अपनी हीटेड गाड़ियों से बाहर निकलने से भी बचने की फिराक में थे उस वक़्त वो इस frozen lake पर आइस हॉकी खेल रहे थे! हम महानगरों में बैठकर सोच लेते हैं पहाड़ों में जिंदगी थम गई होगी, ठिठुर रही होगी, बस सरक भर रही होगी। कितने मुगालते में होते हैं हम।

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locals playing ice hockey in Leh when temp was – 12°C

लद्दाख का सफर याद दिलाता है कि कैसे यह इलाका कभी सिल्क रूट का एक अहम् पड़ाव हुआ करता था, पूर्व में तिब्बत और पश्चिम में कश्मीर के मार्ग में पड़ने वाला लद्दाख अतीत में कारोबारियों का ठिकाना था। इस रूट पर से नमक, मसाले, पश्म और ऊन का व्यापार सदियों तक चलता रहा। उन पुराने राहगिरों को कभी लद्दाखी मठ ठौर दिया करते थे और आज पूरे लद्दाख में होमस्टे से लेकर साधारण होटल और लग्ज़री ठिकानों के रूप में आधुनिक राहगीरों के लिए कई-कई बसेरे बन चुके हैं।

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Partially frozen Zanskar near Chilling

चिंलिंग से ही ‪#‎ChadarTrek‬ की शुरूआत होती है। जनवरी के पहले हफ्ते तक चादर यानी जांस्कर नदी पर पानी की परत उतनी जमी ही नहीं थी कि ट्रैकिंग की जा सके। अलबत्ता, चिलिंग के नज़दीक रास्ते में पड़ने वाले झरने जमने लगे थे।

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frozen fall en route Chilling

लामायारू का मूनस्केप गर्मियों में गज़ब नाटकीयता लिए होता है मगर सर्दियों में उसकी नाटकीयता मानो बर्फ की स्प्रे पेंटिंग से ढक जाती है।

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Lamayuru village

लद्दाख की सर्दी को मात देने के लिए लोकल लद्दाखी की मेहमाननवाज़ी सबसे कारगर हथियार साबित होती है। लेह का पारा जब सवेरे माइनस पर टंगा था तो नाश्ते की मेज सजाकर हमारे इंतज़ार में दरवाज़े पर खड़ा था एक लद्दाखी परिवार। Thiksey Monastery में सवेरे की प्रार्थना के बाद इसी घर में हमारा ब्रेकफास्ट तय था।

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लद्दाखी रोटी के संग मक्खन और आॅमलेट और गुड़गुड़ चाय की दावत में पूरा परिवार बस भागा-भागा फिरता रहा था। मक्खन और नमक मिली गुड़गुड़ चाय (Ladakhi butter tea with salt) जितनों से नहीं पी गई उनके लिए ब्लैक टी हाजिर हो गई, बिना किसी नखरे के।

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ज़रा अपने शहर में, अपने घरों में सवेरे के नाश्ते पर मेहमानों की बारात की कल्पना कीजिए। अब तो याद भी नहीं पड़ता पिछली दफा किस दोस्त या रिश्तेदार के संग बैठकर घर पर नाश्ता किया था। मेरी यादों में जो चैप्टर मिट रहा था उसे ताज़ा, चटख रंगों से भर दिया है लेह की मेहमाननवाज़ी ने।

 

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2 thoughts on “My journey to a world frozen in time – Ladakh in winter

  1. अलका तुम्हारी ये माइनस वाला तापमान पढ़ पढ़ के पूरे शरीर में सिहरन हो रही है। तुम इतनी ठण्ड में क्या क्या कर रही हो।ठण्ड के मजे ले रही हो।

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  2. जैसे गोवा का असल सौंदर्य देखने मानसून में जाना चाहिए वैसे ही लद्दाख को उसके शबाब में देखने के लिए सर्दियों में जाना ही मुनासिब है। लद्दाख के पिछले सारे सफर एक तरफ और यह सर्दियों वाला एक तरफ है

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