From the little Himalayan secret called Andretta to the magical world of Palpung Sherabling

एंड्रैटा गांव के अजब संसार में

पालपुंग शेरबलिंग मठ हमारी मंजिल जरूर था लेकिन रास्ता था कि जगह-जगह हमें अटका रहा था। घुमक्कड़ दिल को भी सब्र शायद इसी तरह अटकते-लटकते हुए ही आता है। पालमपुर से यही कोई 16-17 किलोमीटर आगे बढ़ने पर हम हाइवे के दायीं तरफ उभर आए एक छोटे-से गांव की तरफ मुड़ गए थे। यह वही गांव था जो चित्रकारों की बस्ती के रूप में जाना जाता है।

एंड्रैटा का छोटा-सा गांव उस रोज़ हमारी चहल-कदमी से गूंज रहा था। दिल्ली से आए हम उतावले सैलानियों का कारवां अब नोराह रिचर्ड्स का जिक्र सुनते हुए एंड्रैटा पॉटरीज़ की जड़ों की तरफ बढ़ चला था। आयरिश कलाकार और नोराह 1920 के दशक में एंड्रैटा आकर बस गई थीं। उनकी लेखनी ने एक अजब प्रयोग यह किया अंग्रेज़ी नाटकों पंजाब की जिंदगी को उतारा। हिमाचल का यह हिस्सा तब पंजाब में आता था और पंजाब के थियेटर संसार को नोराह अपनी सर्जन शक्ति से लगातार समृद्ध बना रही थी।

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सरदार सोभा सिंह की आर्ट गैलरी में घुसते हुए कदम कुछ ठिठके थे। किसी भव्य, आलीशान इमारत की कल्पना इस छोटी-सी, घरनुमा जगह को देखते ही ध्वस्त हो गई थी। गैलरी में प्रवेश के कुछ नियम मेन गेट पर चस्पां थे, फोटोग्राफी वर्जित थी और सूनेपन से घिरी वो मामूली-सी इमारत गैलरी कम घर ज्यादा लगी थी।

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इस मेन गेट के पीछे सरदार सोभा सिंह का जादुई संसार इतनी संभाल के बीच अपनी हस्ती बचाए खड़ा होगा, यह कल्पना करना आसान नहीं है। उनकी बेटी इस इमारत के एक कोने में रहती हैं, घर का एक बड़ा हिस्सा आर्ट गैलरी में तब्दील हो चुका था। गैलरी में कदम रखते हुए भगत सिंह का पोर्ट्रेट, सोहनी महिवाल, हीर रांझा का कैनवास, और सिख गुरुओं के विशाल चित्र आपको आकर्षित करते हैं। एक घर का कमरा है यह जिसकी दीवारों पर सोभा सिंह की चित्रकारी बड़े जत्न से सजायी गई है, एक आले में उनके पत्र रखे हैं, एक कोने में उनका निजी सामान और साथ ही वो स्टूडियो है जो आज भी वैसा ही है जैसा इस कलाकार के आखिरी दिनों में था। यहां तक कि आज भी वो अधूरा कैनवस जस-का-तस रखा है जिस पर वे अपना आखिरी चित्र बना रहे थे। इस कला दीर्घा का दूसरा हिस्सा पहली मंजिल पर है। यहां ज्यादातर सिख गुरुओं के चित्र टंगे हैं, पिछले हिस्से में वो कमरा है जिसमें उस महान पेंटर का निजी सामान रखा है जिसने हमें गुरु नानक से लेकर गुरु गोबिंद सिंह जी की शक्ल दिखायी है। कहते हैं गुरु नानक की 500वीं जयंती के मौके पर सरदार सोभा सिंह ने प्रथम सिख गुरु का जो पोर्ट्रेट बनाया था वो इस मायने में नायाब था कि उससे पहले गुरु नानक देव की कोई तस्वीर नहीं थी। इस तरह, सिख गुरुओं की दिव्य ‘शक्ल’ इस अनूठे कलाकार ने ही सौंपी।

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जिस एंड्रैटा पॉटरीज़ को अब तक हमने महानगरों के लाउंज, फाइव स्टार प्रॉपर्टीज़ में देखा था अब उसे उनकी मूल सैटिंग में देखने का वक़्त आ चुका था। एंड्रैटा की संकरी-सी एक गली हमें मिनी-मेरी सिंह के स्टूडियो तक ले गई थी। कांगड़ा की उस सुस्त दोपहर में स्टूडियो भी अलसाया-सा अंगड़ाई ले रहा था। पॉटरी की कोई क्लास जैसे बस कुछ देर पहले ही खत्म हुई थी, पेंटिंग ब्रश सूख रहे थे, पॉटर्स व्हील आराम फरमा रहे थे और आलों में, दीवारों पर, ज़मीन पर, बाहर और भीतर पॉटरी के नमूने अपनी इस खास दुनिया में सजे थे।

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Andretta Potteries bu Mini and Mary Singh

पॉटरी आर्टिस्ट और पद्मश्री गुरचरण सिंह के बेटे मिनी और उनकी ​ब्रिटिश पत्नी मेरी सिंह की दुनिया पॉटरी में आबाद थी। कुछ स्टूडियो के भीतर और कुछ बाहर आंगन में। कहीं कोई ताला नहीं, कोई चौकीदारी नहीं, पूरा संसार जैसे आने-जाने वाले लोगों के लिए खुला रखा था, खुले आसमान के नीचे। कांगड़ा की वो दोपहर जितनी साफ थी, लगता है उतने ही साफ यहां के दिल भी होते हैं। हम कुछ देर अपनी टोली के साथ अकेले ही उस स्टूडियो को समझने की कोशिश करते रहे थे, कयासों में उलझे थे कि दो हिमाचली औरतों ने खुद-ब-खुद गाइड की भूमिका संभाल ली थी। पता चला, स्टूडियो इन दिनों बंद है क्योंकि सीखने वाले सीखकर कुछ दिन पहले ही लौटे हैं और अगली क्लास शुरू होने में अभी वक़्त है। वो दोनों औरतें हमें हैरत कर गईं थी यह बताकर कि वो भी पॉटरी के नुस्खे सिखाती हैं। तीन महीने का रहना-खाना और कलाकारी का खर्च कुल जमा नब्बे हजार रु। एंड्रैटा की उस सैटिंग में रम जाने का मन हुआ था उस रोज़, उसकी हवाओं ने हमें धीमे से रुकने को कहा था मगर घड़ी ने एक बार फिर उलाहना देकर हमें वापस हाइवे पर पहुंचा दिया।

बैजनाथ से पालपुंग शेरबलिंग की राह

अब हम बैजनाथ की तरफ बढ़ चले थे। भट्टू ही वो गांव है जिसका निचला हिस्सा बैजनाथ से सटा है और ऊपरी भट्टू में वही मठ है जो इस बार हमारी मंजिल था। सालों की ख्वाहिश पूरी करने जा रही थी। बौद्ध भिक्षुओं के छाम नृत्य को देखने, मुखौटों से ढके भिक्षुओं की ध्यान की इस दिलचस्प तकनीक को साक्षात् देखने। सही पढ़ा आपने, छाम नृत्य यानी ध्यानावस्था की एक तकनीक। तिब्बती शरणार्थियों ने सत्तर के दशक में पालपुंग शेरबलिंग मठ भट्टू के जंगल के बीच बनाया था। हम भी उस रोज़ चीड़ के दरख्तों की लंबी कतारों को पार कर प्रार्थना ध्वजों के लहराते संसार में प्रवेश कर रहे थे। मठ के प्रवेश द्वार पर ही छॉरतेनों की लंबी श्रृंखला थी। लंबे सफर के बाद सड़क के किनारे खड़े उन सफेद छॉरतेनों को पार कर हम मठ के गेस्ट हाउस पहुंच चुके थे।

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अगला दिन खास होने जा रहा था, सवेरे चार बजे से वज्र नित्यम शुरू होने जा रहा था। अगली सुबह हमारे गेस्ट हाउस में संगीत की स्वरलहरियों ने दस्तक दी और हम वज्र नित्यम यानी लामा नृत्य देखने लगभग दौड़ पड़े थे। बौद्ध धर्म की इस परंपरा से से हमें परिचित कराने के लिए इस बार पालपुंग शेराबलिंग मठ के कुछ वरिष्ठ भिक्षु भी मौजूद थे।

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हमें बताया गया कि गुरु रिनपोछे यानी गुरु पद्मसंभव जो कि बुद्ध के अवतार माने गए हैं, द्वारा रचित पवित्र वज्र नित्यम तिब्बत के मध्य स्थित महान नियु धोंग मठ की मूल परंपरा के अनुसार किया जाता है। आगे चलकर यह परंपरा तिब्बत के कई मठों में स्थापित हुई।

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गुरु रिनपोछे की इसी वंश परंपरा को भारत में कांगड़ा के पालपुंग शेराबलिंग मठ में गुरु वज्रधर बारहवें चामगोन केन्टिंग ताइ शितुपा के संरक्षण में जारी रखा गया है। हम इसी के साक्षी बने थे उस रोज़।

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दिन भर चलने वाला लामा नृत्य दोपहर होते-होते हमें एकरस लगने लगा था और हम उसे अधूरा छोड़कर जाने को ही थे कि देखते हैं ‘कॉमिक रिलीफ’ देने के लिए दो ​बोद्ध भिक्षु हंसोड़ की भूमिका में उतर आए थे।

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लामाओं और मठों में उनके जीवन को लेकर जो पुरानी धारणाएं थीं वो इस तरह से टूटेंगी, सोचा नहीं था। भिक्षु यानी अनुशासन में बंधे तपस्वी। लेकिन छाम नृत्य की एकरसता को तोड़ने उतरे वो दो हंसोड़, पेट पर बड़े-बड़े कपड़े बांधे, चेहरे पर जोकर के मुखौटे बांधे और ऐसे ऐसे करतब दिखा रहे थे कि दर्शकों में हंसी के पटाखे फूट रहे थे। और देखते ही देखते वो दोनों असली वाले पटाखे लेकर आतिशबाजी भी करने लगे। उस रोज़ मुझे महसूस हुआ कि मठों की दीवारों के पीछे सिर्फ धर्मशिक्षा, मंत्रजाप, प्रार्थनाओं, पढ़ाई-लिखाई, भाषायी ज्ञान सीखने पर ही ज़ोर नहीं दिया जाता बल्कि ये बौद्ध भिक्षु वो सारे हुनर भी सीखते हैं जो गृहस्थ जीवन में दाखिल होने पर उनके लिए जिंदगी जीने का सामान जुटा सकते हैं।

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उस रोज़ लामा अगर वज्र नित्यम् कर रहे थे उनके ही साथी उनके नृत्यगान को कैमरों में, वीडियो में समेट रहे थे।

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Learning Veena in Palpung Sherabling (Image – Dipankar Khanna)

और कांगड़ा के इस चार दशक पुराने मठ में रहने वाले कुछ भिक्षु तो भरतनाट्यम भी करते हैं, वीणा भी बजाते हैं यह सुनकर मेरा चौंकना वाजिब था।

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monk practising Classical dance Bharatnayam in the jungles of Bhattu (Himachal) (Image – Dipankar Khanna)

मुझे याद आया कि घर से बाहर निकलना वाकई किताब के पहले पन्ने को पलटना होता है, कुछ नया सीखना होता है, है न!

कैसे पहुंचने पालपुंग शेरबलिंग

दिल्ली से दूरी — 530 किमी
नज़दीकी रेलहैड — पठानकोट 140 किमी
नज़दीकी एयरपोर्ट — कांगड़ा गग्गल 62 किमी
बैजनाथ से पालपुंग शेराबलिंग — 7.5 किलोमीटर
दिल्ली से बैजनाथ तक हर दिन बस सेवा भी है

About Palpung Sherabling Monastery 

It is the monastic seat of the incarnations of Tai Situ Rinpoches, currently headed by the 12th Kenting Tai Situpa from Derge (Tibet) who settled in Bhattu (Near Bir, Palampur) after exiting Tibet. to know more about Palpung Sherabling, click here

 

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One thought on “From the little Himalayan secret called Andretta to the magical world of Palpung Sherabling

  1. Nice post. I could not go to the places you have mentioned on my recent trip. I have heard a lot about Andretti Pottery. Though it’s surprising that monks perform Bharatnatyam and play veena. I also wish I catch monks performing Cham dance someday.

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