Here lies a precious heritage of the capital city of Delhi, but do we really care?

How my walk with fellow travel blogger Swati Jain of  Buoyant Feet fame to the Coronation Park in North Delhi (near Burari village) turned me into thinker. I was visiting the place after almost two decades when it was nothing more than a marshy land almost inaccessible in monsoon and for a certain period of time, home of CRPF platoon. The park would also turn into a marriage ground or some religious function now and then and would leave me wondering about how much we care about our heritage and do we really want to preserve our past?

However, on a cold, gloomy afternoon yesterday, as I walked into the Coronation Park, I was impressed by the lovely landscaping around the Coronation Pillar and was excited to learn more about the place at the interpretation centre now built inside the complex. But only to be disappointed to find it empty. While the structure is waiting to be housed with memorabilia from the past, the  place has become a convenient place for the locals to use it as a playground, a bathing area and for amorous meetings

104 साल पहले यहीं हुआ था दिल्ली को राजधानी बनाने का ऐलान

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Coronation pillar – Do we care?

उत्तरी दिल्ली में सजे दिल्ली दरबार में 12 दिसंबर, 1911 को ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम ने जब पहली बार हिंदुस्तान की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने का ऐलान किया था पूरे माहौल में सन्नाटा पसर गया था। यह मौका था ​जॉर्ज पंचम और उनकी महारानी मेरी के राज्याभिषेक का और उनकी ताजपोशी पर जमा हुए हिंदुस्तान के कोने-कोने से आए राजे—राजकुमार, नवाब—नरेश इस ऐलान से सकते में आ गए थे। इस घोषणा के करीब पांच-छह सेकंड बीतने के बाद तालियों की गड़गड़ाहट ने उस सन्नाटे को उखाड़ फेंका था। लगभग 57 एकड़ में फैली उस तंबु नगरी में उस रोज़ जो इतिहास रचा जा रहा था उसका अंदाज़ा उस वक़्त लोगों को था या नहीं लेकिन आज उसी दिल्ली को विश्व पटल पर एक सशक्त राजधानी के रूप में पहचान मिल चुकी है। दुनिया की किसी भी दूसरी राजधानी की तरह इसके पास भी आबादी, ट्रैफिक और प्रदूषण जैसी ‘वैश्विक समस्याएं’ हैं और दूसरी तरफ दुनिया के सर्वाधिक ग्रीन शहरों में भी यह शुमार है। लेकिन इस शहर के ऐतिहासिक पहलू से बेरूखी आज भी बरस्तूर जारी है।

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राजधानीदिल्ली की जन्मस्थली

कलकत्ता को छोड़कर दिल्ली को सत्ता और ताकत का केंद्र बना देने का ऐलान जिस जगह से हुआ था वो जगह यानी ‘राजधानी’ दिल्ली की जन्मस्थली आज कहां है, किस हाल में इसका अंदाज़ा आम जन को तो छोड़िए अच्छे-अच्छे इतिहासकारों को भी नहीं है। किसी ज़माने में दिल्ली दरबार की यह स्थली दलदली जमीन भर हुआ करती थी जिसमें राज्याभिषेक की याद के तौर पर एक स्तंभ और ब्रितानी हुक्मरानों की संगमरमरी मूर्तियां खड़ी थीं।

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6 feet Statue of Kind George V at Coronation park is quite prominent

आज इस दलदली जमीन को डीडीए और इंटैक ने रेनोवट कर बाकायदा कोरोनेशन पार्क में तब्दील कर दिया है। किंग्सवे कैंप से ढाई-तीन किलोमीटर की दूरी पर शांति स्वरूप त्यागी मार्ग पर खड़े इस कोरोनेशन पार्क को इस रूप में लाने में कई साल लग गए। 2011 में राजधानी दिल्ली के सौ बरस पूरे होने के सिलसिले में इस कारोनेशन पार्क को तैयार करने की योजना उस वक्त़ लक्ष्य से क्या चूकी कि फिर खर्रामा-खर्रामा अब जाकर यह काम पूरा हुआ है। डीडीए ने यहां लैंडस्केपिंग के अलावा बिजली, पानी, इंटरप्रेटेशन सेंटर और एक रेस्टॉरेंट का निर्माण कर दिया है।

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लेकिन इंटरप्रेटशन सेंटर फिलहाल दीवारों से घिरी एक इमारत भर है जिसमें इतिहास की गूंज सुनायी देने में अभी शायद और कई महीने लग जाएंगे। इस बीच, कोरोनेशन पार्क में बीते सालों की उपेक्षा के बावजूद बचे रहे पांच बुतों और यहां तक की स्तंभ को भी यहां आने वाले लोगों ने नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया​ है। इन पांच बुतों में सबसे अलहदा बुत जॉर्ज पंचम का है जो साठ के दशक तक इंडिया गेट के नज़दीक साउथ ब्लॉक के सामने खड़ा था। हिंदुस्तान की गुलामी की दास्तान के इस प्रतीक को यहां से हटवाकर कोरोनेशन पार्क में भेजा गया जहां और भी कई बुत पहुंचाए जाते रहे। आज भी साउथ ब्लॉक के ठीक सामने उस खाली कैनोपी को देखा जा सकता है जहां से यह बुत हटाया गया था। करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं, दिल्ली को राजधानी बनाने का ऐलान करने वाला ऐतिहासिक स्थल कोरोनेशन पार्क के रूप में तब्दील हो चुका है लेकिन इतिहास प्रेमियों की बजाय प्रेमियों की आशिकी का अड्डा भर बनकर रह गया है। हालांकि यहां तैनात डीडीए के अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा का इंतज़ाम किया गया है और सीसीटीवी तथा नई चाक-चौबंद व्यवस्था भी जल्द ही हो जाएगी लेकिन तब तक यहां पहुंचने वाले शरारती हाथ हिंदुस्तान के इतिहास की इस इबारत को जाने कितनी बार खरोंच चुके होंगे।

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Coronation Park stands at Shanti Swaroop Tyagi Marg, near Burari in North Delhi

 

जब रोशनी से नहायी थी बुराड़ी की तंबु नगरी

1911 का दिल्ली दरबार दरअसल, ब्रितानी ताकत की धमक सुना रहा था। उस वक़्त इस दरबार के साक्षी बने लगभग सत्तर हजार लोगों में सिक्किम से लेकर बर्मा के नरेश—राजकुमार,  हैदराबाद के निज़ाम और यहां तक कि भोपाल की बेगम भी ​पहुंची थी। उत्तरी दिल्ली में दिल्ली यूनीवर्सटी से सटा किंग्सवे कैंप वही इलाका था जहां से इस तंबु नगरी की राह गुजरती थी। तब आसपास के पच्चीस-तीस गांवों को करीब सालभर तक मशक्कत के बाद इस तंबु नगरी और इसके लिए जुटायी जाने वाली सुविधाओं में तब्दील कर दिया गया था।

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Image sourced from Google

और तो और दिल्ली शहर से गुजरने वाली रेलवे लाइनों और आजादपुर जंक्शन तक को बदला गया, दुरुस्त किया गया और आज जिस जगह विधानसभा खड़ी है उसी सिविल लाइंस से लेकर बुराड़ी तक एक छोटी पटरी भी बिछायी गई थी। यह इंतजाम हुआ था इंतज़ाम करने की खातिर! जी हां, इस रेलवे लाइन का मकसद था दरबार के लिए लगने वाले तंबुओं और उनके लिए सुविधाओं की खातिर माल—ढुलाई करना। दरबार की शानो—शौकत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस दौर के रिकार्ड में दर्ज है कि एक-एक तंबू रोशनी से जगमगाया था और लगभग 25 वर्ग मील में 233 तंबुओं को गाढ़ा गया था। 85 एकड़ में अकेले सम्राट जॉर्ज पंचम का आशियाना सजा था।

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Image sourced from Google

मीडिया के लिए भी था उम्दा इंतज़ाम

दिल्ली दरबार को ‘कवर’ करने के लिए दुनियाभर से आए मीडिया का जमावड़ा भी कम नहीं था। लगभग 90 प्रेसकर्मी इस दरबार में मौजूद थे और हरेक से 120 पौंड स्टर्लिंग भी व्यवस्था के नाम पर वसूले गए थे! लेकिन उनका इंतज़ाम वाकई शानो—शौकत वाला था और सम्राट के नज़दीक ही टैंटों में उन्हें ठहराया गया था।

क्या थी दिल्ली दरबार की परंपरा

ब्रिटिश हुकूमत ने मुगलई शानो-शौकत की परंपरा का दोहराव करते हुए हिंदुस्तान पर अपनी हुकूमत का रौब गांठने के मकसद से तीन दफा शाही दरबार लगाए थे। ये दरबार, दरअसल, ब्रिटेन में सम्राट/साम्राज्ञी की तख्तपोशी के समानांतर हिंदुस्तान में सजाए गए। बड़े पैमाने पर इन दरबारों के आयोजन के लिए उत्तरी दिल्ली को ही चुना गया और हर बार इसी जगह पर यह आयोजन हुआ। दूसरा दरबार कर्ज़न के उत्साह और भव्यतम आयोजन की वजह से याद किया जाता है। वैसा दरबार न तो पहले सजा था और न ही 1911 में उस रौनक को दोहराया जा सका। अलबत्ता, कर्ज़न को यह निराशा रही कि खुद सम्राट एडवर्ड सप्तम उसमें शामिल नहीं हुए बल्कि अपने भाई ड्यूक आफ क्नॉट को उन्होंने अध्यक्षता के लिए भेज दिया। इस मायने में तीसरा और अंतिम दिल्ली दरबार सबसे अलहदा था जिसमें खुद ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम और उनकी महारानी क्वीन भारत की पांच सप्ताह की यात्रा पर बंबई—दिल्ली—कलकत्ता पधारे थे।

1877 — वायसराय लिटन के दौर में

1903 — वायसराय कर्ज़न के दौर में

1911 — वायसराय हार्डिंग के दौर में

 

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