When my journey to the border town of #Amritsar led me to the most famous stone in the history of humanity!

कोहिनूर कभी रखा था अमृतसर में महफूज़ !

 पंजाब आने वाले सैलानियों को जल्द ही उस तोशाखाने को देखने का मौका मिलेगा जिसकी दीवारों ने कभी दुनिया के सबसे कीमती कोहिनूर हीरे को महफूज़ रखा था! अमृतसर शहर के दक्षिण-पश्चिम में छावनी की दीवारों से सटकर खड़े करीब ढाई सौ साल पुराने गोबिंदगढ़ किले में यह तोशाखाना बना है जिसे इन दिनों पंजाब टूरिज़्म पुरानी शानो-शौकत में लौटाने के लिए मुस्तैदी से जुटा है। महाराजा रणजीत सिंह इसी तोशाखाने में अपने सिक्कों, हथियारों आदि को रखा करते थे और नज़दीक ही उनका हवामहल भी था।

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Toshakhana at Gobindgarh fort, Amritsar

इन दिनों यहां इसी तोशाखाना को पुराने दौर में ले जाने की तैयारियां चल रही हैं। भव्य अतीत की यादों को वापस लाने के लिए जल्द ही यहां पुराने सिक्कों, जेवरों को प्रदर्शित करने की योजना है। अलबत्ता, कोहिनूर कब लौटेगा इस तोशाखाने में इसकी कोई तारीख मुकर्रर नहीं है। लंदन टावर से गोबिंदगढ़ किले का फासला महज़ छह हजार तीन सौ ग्यारह किलोमीटर है लेकिन तोशाखाने और कोहिनूर के बीच दूरी बेइंतहा है!

कैसे पहुंचा कोहिनूर ब्रिटेन

इतिहास में कोहिनूर का जिक्र सबसे पहले 1306 में हुआ और इसके बारे में कहा गया कि इसे ‘सिर्फ खुदा या औरतें ही धारण कर सकती थीं’। और वाकई यह हीरा मर्दों के लिए कभी भाग्यशाली नहीं रहा। कहते हैं महाराजा रणजीत सिंह ( click here to know more about Maharaja Ranjit Singh  ) भी इसी कोहिनूर के चलते अपना साम्राज्य गंवा बैठे थे।

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हिंदुस्तान पर ब्रिटिश हुकूमत के दौरान तत्कालीन गवर्नर जनरल ने लाहौर संधि के तहत् 1850 में ब्रि​टेन की महारानी विक्टोरिया को कोहिनूर हीरा उपहार में दिया था।

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इंग्लैंड के प्रिंस एल्बर्ट ने इस हीरे को और चमकदार बनाने के लिए इसके दो हिस्से करवाने का आदेश दिया। और इस तरह 186 कैरेट का यह विशालतम हीरा काट-छांटकर 109 कैरेट का कर दिया गया। तराशे जाने के बाद इसे महारानी विक्टोरिया के उस ताज में जड़ा गया जिसमें पहले से ही 2000 और कई बेशकीमते हीरे-जवाहरात टंके थे। अलबत्ता, इसकी शान निराली तब भी निराली रही। 1902 में यह ब्रिटेन सम्राट एडवर्ट सप्तम की बजाय उनकी पत्नी एलैक्सैंड्रा और फिर 1911 में महारानी मैरी के पास रहा। आज यह ताज लंदन टावर में प्रदर्शित है।

कोहिनूर के पिछले 5000 सालों के सफर की दिलचस्प दास्तान के लिए देखें — click here

किले के खुलने के साथ ही खुलेंगे इतिहास के तीन दौर

पंजाब सरकार फिलहाल एशियन डेवलपमेंट बैंक की मदद से पंजाब हेरिटेज एंड टूरिज़्म बोर्ड के जरिए इस किले की पुरानी शानो-शौकत लौटाने की तैयारी कर रही है। अब तक इस काम पर करीब 95 करोड़ रु खर्च हो चुके हैं और पहले चरण का काम, जो लगभग आधे किले को उसका पुराना गौरव लौटाएगा, जल्द पूरा हो जाएगा। जनता के लिए 2016 में इस किले के दरवाजे खुल जाएंगे। पंजाब हेरिटेज एंड टूरिज़्म बोर्ड के एग्ज़ीक्युटिव डायरेक्टर बसंता राजकुमार ने बताया – इस किले को एकजीवित स्मारककी तरह तैयार किया जा रहा है जहां आधुनिक टैक्नोलॉजी की मदद से, अभिनय के जरिए दर्शकों के सामने इस किले के गौरवशाली इतिहास को प्रदर्शित किया जाएगा। किले की ज्यादातर इमारतों को संग्रहालयों में बदला जा रहा है और दर्शकों को अतीत की झांकी दिखाने के लिए साउंड एंड लाइट शो, 5-7D थियेटर भी बनाए जाएंगे। इसके लिए पंजाब टूरिज़्म ने निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ पीपीपी भागीदारी का फैसला किया है।

किले में रेनोवेशन के बाद यहां एक हेरिटेज होटल, कैफे और म्युज़ियम खोलने की भी योजना है।

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Souvenir shops under construction inside the fort

अमृतसर में टूरिस्ट गाइड गुरविंदर जोहाल तो यहां तक कहते हैं कि “किले के द्वार खुलने से पहले ही टूरिस्टों को इसका इंतज़ार है। अक्सर शहर में घूमने आने वाले टूरिस्ट हमसे गोबिंदगढ़ किले के बारे में पूछताछ करते हैं और हमें अफसोस के साथ उन्हें बताना पड़ता है कि यह किला अभी उनके स्वागत के लिए नहीं खुला है।”

अमृतसर के पर्यटन मानचित्र पर गोबिंदगढ़ का किला स्थापित हो जाने के बाद पंजाब में तीन अलग-अलग दौर की हेरिटेज और हिस्ट्री तक जनता की पहुंच बन जाएगी। ऐसी इमारतें बहुत कम हैं जो एक साथ मिसिल दौर, रणजीत सिंह काल और फिर ब्रिटिश काल के इतिहास को अपने में समेटे हुए हैं। यह किला वाकई इतिहास के दरवाजे से होते हुए पर्यटन के लिए नए अवसरों को लेकर आएगा।

गोबिंदगढ़ किले का इतिहास

1760 में भंगी मिल, जो उस समय अमृतसर की सबसे ताकतवर मिसिलों में से एक थी के शासक गुज्जर सिंह और सरदार लहणा सिंह ने गोबिंदगढ़ किले को बनवाया था। 1805 में महाराजा रणजीत सिंह ने इसे अपने कब्जे में लिया और इसका नाम बदलकर दसवें सिख गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम पर गोबिंदगढ़ कर दिया। महाराजा रणजीत सिंह ने 1805 से 1809 तक किले का पुनरुद्धार कराया। 1846 में  ब्रिटिश ताकतों ने महाराजा रणजीत सिंह से इस किले को हड़प लिया और 1947 तक यह अंग्रेज़ों के पास रहा।

विभाजन के वक़्त पाकिस्तान से आने वाले कुछ शरणार्थी भी कुछ दिन इस किले में ठहरे थे। 1948 में किले को भारतीय सेना ने अपने कब्जे में ले लिया और अगले लगभग साठ साल तक गोबिंदगढ़ किले में सेना के पास रहा। पंजाबी आवाम की मांग पर आखिरकार 2008 में सेना ने इसे पंजाब सरकार को सौंपा जो अब पंजाब टूरिज़्म के अधीन है।

दिल्ली से गोबिंदगढ़ किले, अमृतसर की राह

सड़क मार्ग से : दिल्ली से अमृतसर 452 किलोमीटर का सफर अपनी कार में आराम से किया जा सकता है (दिल्ली- सोनीपत- पानीपत- करनाल- कुरुक्षेत्र- अंबाला- जालंधर- अमृतसर वाया एनएच1, समय लगभग साढ़े आठ घंटे )
रेल मार्ग से : दिल्ली-अमृतसर स्वर्ण शताब्दी हर दिन सवेरे 7.20 बजे नई दिल्ली से चलकर दोपहर 1 बजे अमृतसर पहुचाती है । इसके अलावा, गोल्डन टैम्पल मेल, सचखंड एक्सप्रेस, छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस समेत अन्य कई रेलगाड़ियां भी हैं
हवाई मार्ग : दिल्ली से अमृतसर के राजा सांसी हवाईअड्डे तक दैनिक उड़ानें भी हैं

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3 thoughts on “When my journey to the border town of #Amritsar led me to the most famous stone in the history of humanity!

  1. Was Koh-i-noor the diamond that once formed the eye of the Devi of Warangal?The kings of Warangal left for Chhattisgarh (Dantewada) after being uprooted by Mohammed bin Tughlaq and took along with them goddess Danteshwari.
    Amazing post Alka ji.

    Like

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