An evening at Atari – Wagah border

 Having witnessed glorious and romantic sunsets from different corners and terrains so far,
I used to recommend Himalayan sunset anyone for that special moment until now.
But an evening at Atari border spent listening to the drum beats and war cries of the jawans of the largest border force in the world ‪#‎BSF‬ I will recommend a sunset at sarhad any day.
Recently witnessed the most memorable and the most special sundown ceremony in my life. Here is my account …
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वाघा पर वतनपरस्ती के जुनून में लिपटी शाम

दुनिया के सबसे बड़े सीमा प्रहरी — बीएसएफ की निगहबानी में देशभक्ति का एक नया अजब मंज़र हर शाम घिरते सूरज की आखिरी रोशनी के साथ हिंदुस्तान—पाकिस्तान सरहद पर दिखायी देता है। इधर सूरज ढलता है और उधर सरहद के दोनों ओर जमा आवाम का आह्लाद लगातार उंचा होता जाता है।

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हर शाम ठीक सूर्यास्त के वक़्त दोनों देशों के झंडे रात भर के लिए उतार लिए जाते हैं और इस परंपरा का निर्वाह एक अच्छा-खासा आयोजन बन जाता है। सीमा के दोनों तरफ लोगों के हुजूम इसे देखने पहुंचते हैं।

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अमृतसर शहर से यही करीब एक घंटे के सफर के बाद हम भी उन लंबी कतारों में शामिल हो गए थे जिन्हें एक-एक कर कितनी ही सुरक्षा की दीवारें लांघनी होती हैं। सुरक्षा जांच के लिए पहली मर्तबा रुकते वक़्त हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गए थे वो बच्चे और जवान जो आपके गालों पर तिरंगा पेंट करने के हुनर में इतने माहिर हो चुके हैं कि बस कुछ सेकंड भर में इसे अंजाम दे डालते हैं। वतन के नाम होने जा रही उस जुनूनी शाम को दीवानगी में बदलने के लिए मैंने अपना गाल आगे किया। फिर दूसरा भी रंगवा लिया और तिरंगे से सजकर मैं तैयार थी एक ऐतिहासिक शाम के लिए।

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घंटे भर तक सरहद का सफर और इससे आगे दो सौ मीटर का फासला पार करने में एक और घंटा बीत गया। आखिरी चौकी तक आते—आते खीझ बढ़ने लगी थी। कतारें थीं कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। आखिरकार हम वाघा सीमा पर बने मिनी स्टेडियम में दाखिल हो चुके थे। हमारी सीटें रिज़र्व थीं और तब जाकर उन कतारों के मायने समझ में आए।

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स्टेडियम की हवा में देशभक्ति के तराने तैर रहे थे। कितने ही जुनूनी थे जो तिरंगे हाथ में उठाए नाच-गा भी रहे थे। और फिर दो महिला जवानों की बूटों की ठक-ठक ने ध्यान अपनी ओर खींच लिया था।

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चुस्त और तेज रफ्तार इन महिला जवानों ने सीमा पर गेट तक मार्च किया। उन्हें देखकर गुरूर का एक झोंका मुझे छूकर गुजर गया। फिर आए ब्लैक कमांडो जिन्होंने सीमा द्वार पर जाकर अपने कुछ ‘जौहर’ भी प्रदर्शित किए। फिर कुछ और सैनिक, कुछ और तने हुए बदन, चौड़े सीने, गर्व से अकड़े कंधे और वतन के नाम सब कुछ कुर्बान कर देने का संदेश सुनाते कुछ और गीत।

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हवाओं में देशभक्ति का सैलाब था और इधर मेरी आंखे डबडबाने लगी थी। अटारी-वाघा सीमा पर भावनाओं का अतिरेक मुझे इस तरह घेर लेगा, यह भी कब सोचा था। आंसुओं ने बहना शुरू किया तो बस बहते ही रहे। समझ से परे था वो भावातिरेक। जुनूनी हूं, मगर वतन के नाम इतनी भावनाएं कब-कहां से इकट्ठी हो गई थीं, मालूम ही नहीं पड़ा। सरहद पर उस सैलाब से निपटने की कोई कोशिश नहीं की मैंने। करीब छब्बीस मिनट के उस समारोह के बाद हम लौट रहे थे और सामने भीड़ को चीरता बीएसएफ का बांका जवान मेरी तरफ बढ़ रहा था। अगले ही पल मुझसे मुखातिब था वो चेहरा — ”आप रो क्यों रही थी? मैं देख रहा था आपको …”

”नहीं कुछ नहीं, वो ऐसे ही …. ”

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पता नहीं वो समझा कि नहीं मेरे ‘ऐसे ही’ के मायने, लेकिन मैंने खुद को और करीब से जाना था उस रोज़। यह भी समझा कि जिंदगी के जमा-खर्च में मेरे पास खर्च करने के लिए भावनाओं का ढेर सारा बैलेंस बकाया है!

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