festivals hopping / lit-fests 2015-16

 

wanderlust and lit-fests complementing each other

 

घुमक्कड़ी सिर्फ घुमक्कड़ी के लिए शायद सभी को नहीं जंचती।

मैं भी इसी ‘प्रजाति’ की हूं, जिसे हर आवारागर्दी के पीछे एक बहाने की तलाश होती है। बहाना चाहे कितना भी कमज़ोर क्यों न हो! और यही वजह रही कि बीते दस सालों में सैर-सपाटे की मेरी तमाम मंजिलों में वो शहर शामिल होते रहे जिनमें लिट-फैस्ट आयोजित होते हैं। आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो जयपुर से कसौली, थिंपू, पुणे, बीकानेर, उदयपुर और अपनी दिल्ली के बैकयार्ड में नोएडा में आयोजित साहित्योत्सवों के बहाने इन जगहों की खाक छान मारने का सबब कतई बुरा नहीं लगता।

आपको भी मेरी तरह आवारगी के कुछ वाजिब बहानों की दरकार हो तो पढ़ जाइये इस पोस्ट को,

कोई नई-पुरानी मंजिल तो मिल ही जाएगी इनके बहाने! 

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lit-fest in my backyard where I shared the dais with fellow Hindi blogger Kaynat Kazi

फैशन से फिल्म तक सब कुछ दिखता है लिट-फेस्ट में!

साहित्य के आधुनिक मेले विशुद्ध तौर पर किताबों और लेखकों के इर्द-गिर्द ही नहीं सिमटे होते हैं। बीते सालों में इनमें फैशन, खान-पान, संगीत, नृत्य, फिल्म, नाटक और यहां तक कि कठपुतली शो जैसे रोचक तत्व भी जुड़े हैं।

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विशुद्धतावादियों को साहित्यिक मेलों में इस घालमेल से ​बेशक शिकायत रहती है लेकिन सच यह है कि जीवन के विभिन्न आयामों से जुड़ चुके ये मेले साहित्य को समाज के अलग-अलग तबकों तक पहुंचाने के बेहतरीन माध्यम बनते जा रहे हैं।

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Scene just before a literary session

यात्रा बुक्स की नीता गुप्ता कहती हैं, साहित्य मेले या ऐसी किसी भी प्रकार की सोशल गेदरिंग समाज का ही आईना होती है| उसमें आए वक्ता या श्रोता इसी समाज का हिस्सा हैं, हम तुम ही हैं। तो इस तरह साहित्यिक मेलों को एक अलग खांचे में बाँट देना सही नहीं होगा। साहित्य सिर्फ किताबों में लिखा-छिपा ही नहीं है, वह हमेशा से समाज के साथ सांस लेता आया है।”

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लिट-फेस्ट माने विशुद्ध साहित्य नहीं, और भी बहुत कुछ हो गया है इन दिनों!

अलबत्ता, आप लिट-फैस्ट के बहाने अपनी यायावरी को नया आयाम देने के लिए हो जाइये तैयार! अगले कुछ महीनों में आप घूम सकते हैं इन शहरों में –

# समन्वय भाषा उत्सव (नई दिल्ली) : 26 से 29 नवंबर, 2015 /IHC, Lodhi ( click here for more )

# दिल्ली लिटरेचर फेस्टिवल 28 से 30 नवंबर, 2015 /Maidens Hotel, 7, Sham Nath Marg, Civil Lines, Delhi  110054

                                                                                                                                                   (Click here for more)

# गोवा आर्ट्स एंड लिटरेचर फेस्टिवल : 10 से 13 दिसंबर, 2015 ( click here for more )

कोच्चि इंटरनेशनल बुक फेस्टिवल 2015 : 4 दिसंबर – 13 दिसंबर- 2015, कोच्चि केरल  ( click here for more )

# हैदराबाद लिटरेचर फेस्टिवल :  7 से 10 जनवरी, 2016 (Click here for more  )

# ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल : 21 से 25 जनवरी, 2016 ( click here for more )

# माउंटेन इकोज़ — 25 से 28 अगस्त, 2016 (थिंपू, भूटान) ( click here for more )

साहित्यिक मेले सिर्फ साहित्य को समर्पित रहेंगे ऐसा मानना बेमानी लगता है। इन दिनों साहित्यिक मेलों में किसी कोने में किताबों का संसार सजता है, कवियों और शायरों की महफिलें सजती हैं तो कोई एक कोना ऐसा भी होता है जो फिल्मी हस्तियों की चकाचौंध से चौंधिया रहा होता है।

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Script writer/Lyricist Javed Akhtar has been a crowd puller at #JLF in Jaipur

अगर महाश्वेता देवी किसी मंच की शोभा बढ़ा रही होती हैं तो दलाई लामा को देखने-सुनने भी अपार भीड़ उमड़ी होती है। गुलज़ार को सुनने कद्रदान दौड़े चले आते हैं तो शशि थरूर का आकर्षण भी कम नहीं होता।

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Here I am at Mountain Echoes in Thimpu sharing close space with my favourites

लिटरेचर/बुक फैस्ट के बहाने दूर के शहरों को देख आने, उनकी संस्कृतियों से रूबरू होने के बहाने मैंने हमेशा ही लपके हैं।

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In Thimpu, with a Bhutanese father-daughter at Mountain Echoes (lit) festival

अभिजात्य, सुसंस्कारी, अमीर, गरीब, मध्यम वर्गीय, पेशेवर, छात्र, नेता, अभिनेता, कवि, शायर, कहानीकार, पत्रकार, नौकरशाह, लेखक से लेकर जाने कितने ही किस्म के किरदार इन मेलों में दिखते हैं। कुछ वाकई साहित्य-रस को सोखने और कुछ सिर्फ इन मेलों में दिखने! जी हां, अब साहित्योत्सवों में शिरकत करना सिर्फ रसिकों का शगल भर जो नहीं रह गया है, ऐसे मेलों में हाजिरी देना समाज में आपकी हैसियत का सूचक भी माना जाने लगा है। और कुछ नहीं तो साहित्य रस प्रेमी होने की शान तो बघारी जा सकती है!

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Renowned poet Gulzar at MountainEchoes, Thimpu (Bhutan)

अलबत्ता, दिलचस्प गोष्ठियों और रोचक चर्चाओं के एक सेशन से दूसरे सेशन को पकड़ने की हड़बड़ी में दिखते दीवानों के साथ-साथ लॉन पर पसरी धूप और उस धूप के साथ-साथ वहां बिखरे जादुई संसार को सोखते साहित्यिक कद्रदानों को देखकर यह अहसास मज़बूत होता है कि आखर की दुनिया अभी इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं है। मंच बदल सकते हैं, माध्यम अलग हो सकते हैं लेकिन हर्फ और लफ्ज़ जिंदा हैं और रहेंगे।

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2 thoughts on “festivals hopping / lit-fests 2015-16

  1. Lovely compilation which will indeed make us travel more. Recently, I had a lovely time at Tata Lit fest, Mumbai and I can vouch that these festivals are a treat to the heart and soul. When you get to see and hear the authors in real, it not only inspires you to write your own masterpiece but also opens your mind to many other aspects of life.

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