where stones are waiting to stun you #Bhojpur #Shiva Temple

एक अधूरे मंदिर की दास्तान

दोपहर बाद भोपाल के बड़ा तालाब की हदों को पीछे छोड़कर हमारी कार रायसेन जिले की गोहरगंज तहसील में दाखिल हो चुकी थी। होशंगाबाद रोड पर भोपाल से यही कोई 30-32 किलोमीटर की दूरी पर था यह भोजेश्वर मंदिर यानी वास्तुशिल्प का वो अद्भुत नमूना जो अपने अधूरेपन की वजह से जग-प्रसिद्ध है। चुपचाप बहती बेतवा के दाहिने किनारे पर खड़ा यह शिव मंदिर मुझे अपने मोहपाश में फंसा चुका था। और ​मैं एक बार फिर लौट रही थी उन पत्थरों के बीच एक इतिहास पारखी की उंगलियां थामे जो बीते डेढ़ दशक से इसी मंदिर के रखरखाव के अलग-अलग पड़ावों से जुड़ी रही थीं।

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Bhojpur Temple/ Image courtesy – Pooja Saxena

अचानक उन्होंने ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा और अगले ही पल मैं उन गेरूआ चट्टानों पर खड़ी थी जहां से भोजपुर का विशाल शिव मंदिर अपनी पूरी भव्यता के साथ दिख रहा था। मुझे लगा जरूर यह ‘व्यूप्वाइंट’ रहा होगा, मंदिर को कैमरे में समेटने का इशारा समझा था मुझ नासमझ ने! लेकिन अब तक उनकी कमेंट्री मेरे रौंगटे खड़े कर चुकी थी। सड़क किनारे बस आठ-दस कदम बढ़ाते ही मेरे सामने जो दृश्य था उस पर एकाएक यकीन नहीं हो रहा था। उन चट्टानों पर मेरे दाएं-बाएं, यहां-वहां, पास में, दूर तक सिर्फ शिवलिंग बिखरे पड़े थे, कुछ आधे, कुछ अधूरे .. किसी कारीगर के लौटने की आस लगाए हुए, कि वो लौटेगा अपने हथौड़े-छैनी के संग, उन्हें तराशेगा और फिर किसी गर्भगृह में सिमटकर पूजे जाने लगेंगे।

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shivling strewn all around some 5 kms before Bhojpur temple

पिछले एक हजार बरस से इसी आस में मालवा की उस लाल धरती पर वो शिवलिंग पड़े हैं। इस बीच, सैंकड़ों—हजारों बार बरस गया है मालवा का आसमान, अनगिनत गरम हवाओं के थपेड़ों ने उन्हें झकझोरा है, बदलते मौसम के कई-कई मिजाज़ों को झेलने के बावजूद वो शिवलिंग वैसे ही रखे हैं मालवी पठारों पर जैसे कोई रख गया था, अगले दिन लौट आने के लिए .. बस वो लौटा नहीं! और इंतज़ार में रह गए वो शिवलिंग!

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मैं पिछली बार जब इस राह गुजरी थी तो खुले आसमान तले बिखरे इस खजाने से अनजान थी, लिहाज़ा गुजर गई थी मंजिल की तरफ। मगर इस बार उस चूक को दोहराने से बच गई, मंजिल अब दूर थी और उससे पहले ही अपने इर्द-गिर्द मालवा के परमार वंशी राजा भोज के चमत्कारों को देख-समझ रही थी। ठीक उस वक़्त मैंने खुद को इस अहसास से लिपटा पाया कि इतिहास के गलियारों से किसी जौहरी के साथ गुजरते हुए ही हीरे हाथ लगते हैं, वरना तो सब सिर्फ पत्थर है!

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किंवदंतियों से घिरा अधूरा मंदिर — भोजेश्वर

”आगे 5-7 किलोमीटर तक भोज की यह कार्यशाला खुले में आज तक मौजूद है। इतिहासकार सिर्फ अटकलें लगाते रह गए हैं कि आखिर कितने बड़े पैमाने पर और कितने मंदिरों को बनाने की योजना राजा भोज (1010—1045) की थी। और यह भी एक सवाल हमेशा से उठता रहा कि आखिर यह महत्वाकांक्षी योजना अधूरी क्यों रह गई? ​वो क्या वजह होगी कि एक भव्य मंदिर की दीवारें अपनी उत्कृष्टता को हासिल करने से पहले ही चुप हो गईं? … ” आर्कियोलॉजिस्ट पूजा सक्सेना के सवालों के साथ मेरे कदमों की टहलकदमी जारी थी। हम अभी भी मंदिर से दूर थे, लेकिन भोज की महत्वाकांक्षी योजनाओं के सिरे मेरे हाथ आने शुरू हो गए थे।

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Incomplete Bhojpur Shiva Temple/ Image courtesy – Pooja Saxena

मालवी किस्से-कहानियों में यह मंदिर पांडवकालीन है जिसके शिवलिंग पर कभी कुंती जल चढ़ाया करती थी। मंदिर की विशालता के चलते यह भी कहा जाता है कि वनवास के दौरान भीम ने इसे बनवाया था। मंदिर के अधूरे रह जाने के पीछे किंवदंती है कि एक रात में मंदिर का निर्माण किया जाना था, जैसे ही अगले दिन सूर्योदय हुआ निर्माण रोक दिया गया और तभी से मंदिर अपूर्ण खड़ा है। बहरहाल, इन दंतकथाओं के समानांतर भारतीय सर्वेक्षण विभाग के विश्लेषण है जो अपने तर्कों के साथ ज्यादा विश्वसनीय लगते हैं। पत्थर के एक विशाल चबूतरे पर खड़ा शिवमंदिर पश्चिममुखी है और यहां एक ही पत्थर से निर्मित विशालकाय शिवलिंग भी है जो संभवत: हिंदुस्तान के सबसे बड़े शिवलिंगों में से है।

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One of the largest shivlings stands in Bhijpur Shiva temple/ Image courtesy – Pooja Saxena

एक अन्य दंतकथा के अनुसार राजा भोज असाध्य कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। उन्हें किसी महात्मा ने सलाह दी कि 365 नदियों, सरोवरों/तालों का पानी एकत्र कर उसमें स्नान करने से उन्हें रोग मुक्ति मिल सकती है। तब राजा भोज ने इस इलाके को ऐसा विशाल सरोवर तैयार करने के लिए चुना जिसमें इतने अलग-अलग स्रोतों का पानी लाया जा सके। भोज के इंजीनियरों को विंघ्य पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा यह घाटीनुमा इलाका सबसे उपयुक्त लगा जिसे बेतवा और उसकी सहायक नदियां-धाराएं सींचती थी। लेकिन पानी के उन तमाम स्रोतों की गणना 359 पर जाकर अटक गई थी। तब इलाके के एक गोंड प्रधान ने इन परेशान-हलकान इंजीनियरों को भोपाल की तरफ से बहती उस नदी और इसकी सहायक धाराओं के बारे में बताया जिससे वे अनजान थे। इन धाराओं की दिशा भीमकुंड की तरफ मोड़ने पर 365 धाराओं का योग पूरा हो गया। गोंड प्रमुख के इस योगदान को अमर बनाते हुए इस नदी का नाम कलिया या कलियासोत रखा गया।

कोलांस, कलियासोत, बेतवा नदियों और इनकी सहायक नदी-धाराओं से निर्मित हुआ भीमकुंड या भीमताल लगभग 650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पानी को समेट सकता था। कहते हैं इस विशाल जलाशय ने मालवा की जलवायु तक को बदल डाला था। उस दौर में जलाशय ने सिहोर से भोजपुर तक लोगों के मानस में जगह बना ली थी। साहिब हाकिम के मासिरमहबूब शाही से पता चलता है कि परमार वंश के बाद मालवा के सुल्तान होशंग शाह 1405—34 ई ने बेतवा पर बंधे बांध को नष्ट करवाया ताकि यह पूरा जलाशय जलविहीन हो जाए। गोंड जनजाति की जनश्रुतियों में आज भी यह आख्यान मिलता है कि कैसे इस जलाशय को नष्ट करने में सुल्तान की सेना को तीन महीने लगे और इसके पानी को बहाने में अगले तीन साल का समय लगा जबकि अगले तीस साल इसकी जमीन को सूखने में निकल गए। यह जमीन आज बेहद उपजाऊ भूमि में बदल चुकी है और भोजपुर के आसपास बसे गांव यहां खेती करने लगे हैं। कलियासोत का बांध विध्वंस से बचा रह गया था जो आज भी इस नदी की जलधारा को बेतवा की धार में समोता है।

कहते हैं, भीमकुंड के जल में स्नान करने पर भोज ने रोग मुक्ति के बाद नज़दीक ही एक भव्य शिव मंदिर बनवाया। मंदिर के अधूरे रह जाने के पीछे कहा गया कि संभवत: अपने शासनकाल के अंतिम वर्षों में राजा ने यह निर्माण शुरू करवाया था और परियोजना के बीच में ही उनकी मृत्यु हो जाने के बाद यह निर्माण रुक गया।

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the open dome shaped shikhar before restoration / Image – ASI

कुछ विद्वान इसके अधूरेपन के सूत्र गुजरात से जोड़ते हैं। दरअसल, 1026 के आसपास महमूद गज़नी के सोमनाथ पर बार-बार आक्रमण हो रहे थे और उस वक़्त गुजरात के राजा सोलंकी देव को राजा भोज भारी आर्थिक मदद दे रहे थे। यह मदद इतनी अधिक हो गई थी उनके खजाने खाली हो गए और मंदिर की योजना पैसों के अभाव में अधूरी छूट गई। एक और अनुमान यह भी कि उस दौर में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से मंदिर को अपूर्ण रह जाना पड़ा था।

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inside shikhar after restoration by ASI/ Image – ASI

अधूरेपन से जुड़ रही हैं पूर्णता की कड़ियां

आर्कियोलॉजिस्ट पूजा मुझे मंदिर की पहली सीढ़ी पर रोके खड़ी थी, चंद्रशिला दिखाने के लिए। इसी चंद्रशिला के ठीक सामने बिछे पत्थर पर मंदिर के शिखर की योजना उकेरी गई है जिसे अब सुरक्षित रखने के लिए रेलिंग से घेरा गया है। इसके अलावा भी मंदिर के आसपास स्तंभों, शिखरों, मंडप, महामंडप, अंतराल आदि की पूरी ड्राइंग चट्टानों पर किसी इंजीनियर के नक्शे की तरह खुदी हैं।

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rock engravings to split it into two

एएसआई ने इस “मुक्तांगन कार्यशाला” के इन नमूनों के इर्द—गिर्द रेलिंग खड़ी कर दी है ताकि इतिहास की उस अधूरी परियोजना का ब्योरा देने वाले इन संकेतों-चिह्नों को जितना हो, जब तक हो सहेजकर रखा जा सके। मंदिर के दाहिने भाग में पीछे की तरफ एक मिट्टीनुमा ढलवा रैंप भी आज तक खड़ी है जिसका इस्तेमाल विशालकाय शिलाओं को ढोने के लिए किया गया था। और आपको अचरज होगा यह जानकर कि इस रैंप की लंबाई-उंचाई का अनुपात उस दौर में भी वही रखा गया जो आज की इंजीनियरिंग का मानक है! अमूमन इस तरह की संरचनाओं को मुख्य परियोजना का काम पूरा होने के बाद हटा लिया जाता है, लेकिन भोजपुर में इस ढलान को हटाने का समय अब तक नहीं आया है!

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The mound behind archeologist Ms Pooja is ‘the ramp’ still in waiting to be removed!

पुरातत्ववेत्ता मानते हैं कि मंदिर के अधूरेपन से वे वास्तव में, मंदिर शिल्प को बेहतर तरीके से समझ पाए हैं। मंदिर निर्माण के अलग-अलग चरणों को समझने में यह अधूरापन काफी उपयोगी साबित हुआ है।

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an incomplete and unrecognised statue lying some 100 metres from the temple

नज़दीक ही इंटरप्रेटेशन सेंटर है जिसमें मंदिर के निर्माण के संभावित चरणों की कड़ियां प्रदर्शित हैं, एक आडियोविजुअल रिसोर्स सेंटर है जिसमें फिल्म के जरिए इस मंदिर पर हर संभव जानकारी दी जाती है।

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कुल-मिलाकर, यह स्मारक अपूर्ण रूप में जितना बोलता है शायद पूर्ण होने पर इतना न बोल पाता!

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घाटी के बीच उगे मंडी द्वीप के पीछे कितनी ही बार सूरज देवता की सवारी उतर चुकी है और अपनी तमाम अपूर्णता को समेटे भोजपुर का शिव मंदिर अपनी निर्माण प्रक्रिया की इन कड़ियों के साथ आज भी ​खड़ा है।

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sunset over Mandi-dweep (island) as seen from the Bhojpur Shiva temple

भोजपुर की इस मुक्तांगन कार्यशाला में वक़्त भले ही गुजर रहा हो लेकिन वो आज भी बीता नहीं है। उसे आज भी किसी राजा भोज का इंतज़ार है जो लौटेंगे अपने अधूरे सपने को पूरा करने, शिव मंदिर के अधूरे शिखर को पूरा करवाने, इस घाटी में दूर तक बिखरे उन शिवलिंगों की स्थापना करवाने जो कहां लगने थे इसका सूत्र उनके साथ ही गुम हो चुका था!

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कैसे पहुंचे भोजपुर शिव मंदिर ?

भोपाल से दूरी — 32 किलोमीटर, जिला रायसेन, ​तहसील गोहरगंज, ​होशंगाबाद रोड पर

भोपाल — देश के प्रमुख हवाईअड्डों और रेल लाइन से संपर्क

सार्वजनिक परिवहन — इसकी उम्मीद न रखकर निजी टैक्सी कर लें, भोपाल से आने-जाने और तसल्ली से सैर के लिए लगभग 4 घंटे और 1200/ रु का खर्च

Acknowledgements – 

# I shall remain indebted to archaeologist Ms Pooja Saxena associated with an NGO called Dharohar engaged in heritage conservation and awareness for agreeing to accompany me on a guided heritage walk of the world famous Shiva temple of Bhojpur, Dist Raisen, Near Bhopal, Madhya Pradesh (India)

# the study tour of Shiva temple of Bhojpur was undertaken during Madhya Pradesh Tourism Mart 2015 (#MPTM2015) organised from 16 to 18 Oct 2015 in Bhopal for which MP Tourism hosted me.

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