In the land of Mt Khangchendzonga

कंचनजंगा और आर्किड के देश में

सिक्किम में वो मेरा पहला दिन था और दीवार पर परम शांत-सौम्य मुद्रा में दिखे बुद्ध जैसे कह रहे थे कि अगले कुछ दिन परम शांति में बीतेंगे। राजधानी गैंगटोक की सड़कों पर ट्रैफिक की अफरातफरी तो यों भी नहीं थी और उस सड़क किनारे खड़ी किसी दीवार पर बौद्ध भिक्षुओं की ग्राफिति, इमारत की बाहरी सज्जा में कांच की जगह मुस्कान बिखेरते बुद्ध की ​तस्वीर जैसे अगले कुछ दिनों की लय-ताल को तय कर रही थी।

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यह गैंगटोक की नई छवि थी। मेरी एक दशक पुरानी स्मृतियों में बसे शहर से खासी जुदा। शहर की सबसे मुख्य एम.जी.रोड पर दिनभर चहलकदमी में बिताने का फैसला जैसे मन ने खुद ही कर लिया। इस पर अब जगह-जगह बैठने की बेंच लगी हैं, बीच में फूलों के गलियारे हैं, फैशनेबल सिक्किमी युवतियों की रौनक है, बेंचों पर गपियाते बुजुर्ग हैं या फिर कोई यों ही बिना किसी एजेंडे के बैठा है। इतनी फुर्सत के लम्हे और उन लम्हों को गुजारने के लिए ऐसी सुकून की जगह किस शहर के बीचों-बीच मिलती है? लेकिन सिक्किम में मुमकिन है सुकून, सौंदर्य और सहजता का यह मेल जो आमतौर पर हमारे महानगरों में मायावी लगता है।

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मार्च की धुली-धुली सी उस सुबह कंचनजंगा के देश में खुद के होने के अहसास से इतरायी थी मैं। बारिश के शोर से अलस्सुबह जब आंख खुली तो होटल के कमरे की खिड़की पर बारिश देखने लपकी। सामने घाटी में शहर और शहर का पूरा मिजाज़ पसरा था, नीचे एक कोने में एक छत पर बड़ी सी फुटबॉल देखकर चौंकी थी। यह पालजोर स्टेडियम था जिसकी हरी बिसात पर रंगीन जैकेटों में सिक्किमी युवकों के दौड़ते बदन थे जो उस मूसलाधार बारिश को ठेंगा दिखाते हुए फुटबॉल को किक जमाने में मग्न थे। इस तेज बारिश ने उनके भीतर के एथलीट को जैसे हवा दी थी, एक कोने से दूसरे कोने में भागते-दौड़ते वो फुटबॉलर अपनी दीवानगी से मेरा मन मोह गए थे।

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 गैंगटोक में दो दिन

अगला पड़ाव सिक्किम का पुराना राजमहल था। राजमहल की हमारी छवि से एकदम अलग। एक छोटी-सी पहाड़ी पर खड़ी नन्ही-सी उस इमारत ने मुझे राजस्थानी महलों की याद ताजा करा दी। भव्य और महाकाय महलों से उलट इस सादगी में लिपटे त्सुक्लखांग मठ में बारिश की बूंदाबांदी के बीच पहुंचने के लिए कोई ज्यादा जद्दोजहद नहीं करनी पड़ी थी। एम जी रोड के कोने से टैक्सी पकड़ी और शहर की सैर करते हुए बस कुछ दस-पंद्रह मिनटों में यहां पहुंच गए। मठ के प्रार्थना कक्ष में घुसते हुए सीलन की एक हल्की गंध जैसे धीमे से कह गई हो कि बहुत ज्यादा लोगों का आना-जाना यहां नहीं होता। हल्की रोशनी में नहाए उस हॉल की दीवारों में कांच के खोल के पीछे अनगिनत पोथियां अंटी थी। सामने गुरु पद्मसंभव की विशाल मूर्ति अपनी भव्यता के साथ विराजमान थी। भिक्षुओं के बैठने के बेंच पता नहीं कबसे खाली थी।

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त्सुक्लखांग मठ

पूर्वोत्तर के सबसे खूबसूरत और खास राज्यों में से एक है सिक्किम। यहां 1975 तक राजशाही कायम थी और चोग्याल (मूल रूप से तिब्बती) वंश के राजा सत्ता पर काबिज़ थे। यह वंश सत्रहवीं शताब्दी से सिक्किम पर राज करता आया था। आज भले ही लोकतंत्र ने सिक्किम में अपनी जड़ें बना ली हैं तो भी राजसी संस्कारों की झलक यहां के बाशिन्दों में दिख जाती है। सहजता और संस्कारशीलता सिक्किमी समाज का गुण बना हुआ है।

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इस बीच, परंपराओं में कुछ ढील दिखने लगी है। अपने पिछले सफर में शहरभर में एक कोने से दूसरे कोने में घूम आने पर पारंपरिक परिधान बख्खू में लिपटी युवतियों को ही देखा था और इस बार पश्चिमी असर के अलावा साड़ियों तक में लिपटे बदन आम दिखे।

फ्लावर एग्ज़ीबिशन सेंटर

गैंगटोक में बहुत कुछ है सैलानियों के लिए। रिज के एक कोने पर विधानसभा से कुछ आगे निकलने पर फूलों की प्रदर्शनी लगी थी। आर्किड समेत तरह-तरह के फूलों के उस मायाजाल में सिर्फ पर्यटकों के कैमरों की चकाचौंध थी। सिक्किम का यह बॉटेनिकल पक्ष था जो सभी को लुभा रहा था।

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इस तरफ दिलचस्पी बढ़ चली हमारी और अगले कुछ घंटे हिमालयन जूलॉजिकल पार्क में बीते। इलायची के पौधों से लेकर आर्किड और कैक्टस की वैरायटी के लिए ग्रीन हाउस और हिमालयन वनस्पति का एक पूरा संसार यहां सजा है। अलबत्ता, जूलॉजिकल नामकरण पर मुझे एतराज था। इसका नाम बदलकर वनस्पति संसार से जुड़ा होगा तो शायद यहां आने वाले सैलानियों को वैसी गफलत नहीं महसूस होगी जैसी मुझे हुई थी!

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हिमालयन जूलॉजिकल पार्क

नामग्याल इंस्टीट्यूट आफ तिब्बतोलॉजी – तिब्बती संस्कृति का संसार

हिमालयन जूलॉजिकल पार्क से टहलते हुए कुछ दूर चले आने पर नाग्याल इंस्टीट्यूट आफ तिब्बतोलॉजी है जहां पुरानी कितनी ही पांडुलिपियां, गहने, औजार, पेंटिंग, मूर्तियां और ऐसी ही कई कलाकृतियां हैं। अगर अपनी विरासत को लेकर आज ज़रा भी सजग हैं तो इस म्युज़ियम में जरूर चले आएं। कहते हैं तिब्बत से बाहर शायद दुनिया में इतना बड़ा तिब्बती कलाकृतियों का संसार दूसरा नहीं है। 1958 में इसे खोला गया था और इसमें से गुजरते हुए तिब्बती गलियारों में घूमने का अहसास होना लाज़िम है।

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बुद्धं शरणम् गच्छामि

इंस्टीट्यूट आफ तिब्बतोलॉजी से सौ मीटर दूर एक हल्की चढ़ाई के बाद स्तूप का सुनहरा शीर्ष आपको चकाचौंध कर सकता है। किसी कोने के कमरे से आध्यात्मिक स्वरलहरियों ने मेरा ध्यान खींच लिया था। उस तरफ कदम बढ़े चले और भिक्षुओं की एक और संगत में वक़्त बिताने का अदद बहाना भी। यहां पुराने वाद्यों को बजा रहे भिक्षुओं ने मुझे बैठने का इशारा किया और फिर अगले कुछ पल सिर्फ कानों में घुलती आवाज़ों के नाम हो गए।

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स्तूप

रिज के उपर बढ़ चलें तो करीब पंद्रह बीस मिनट में एंछे मोनैस्ट्री पहुंचा जा सकता है। यहां  सवेरे के समय आएं, भिक्षुओं के सम्मोहक प्रार्थना गान सुनें, उनके सवेरे के रूटीन का हिस्सा बनें और एक शांत दिन की बेहतरीन शुरूआत करें।

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रूमटेक मोनैस्ट्री

शहर से बाहर करीब 24 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर रूमटेक मोनैस्ट्री हमारी अगली मंजिल था। यहां विदेशी टूरिस्ट भी थे और सैनिकों से चाक-चौबंद इंतज़ाम भी। बुद्ध के गलियारों में तनाव और असुरक्षा जैसे खुद-ब-खुद काफूर हो जाया करते हैं, लेकिन यहां हवा में कुछ और भी घुला था। रंगीत नदी के उस पार पहाड़ी पर बनी इस 300 साल पुरानी खूबसूरत मोनैस्ट्री को ही 26वें करमापा ने 1959 में तिब्बत से भाग निकलने के बाद अपनी शरणस्थली के तौर पर चुना और चीन सीमा से नज़दीकी के चलते सुरक्षा का यह पूरा इंतज़ाम यहां दिखता है। सिक्किम के इस सबसे बड़े मठ में कई लाजवाब थंग्का पेंटिंग्स हैं और अगर किस्मत से आप ऐसे वक़्त में वहां पहुंचते हैं जब भिक्षु प्रार्थना में होते हैं तो उनके मंत्रजाप आपको सम्माहित कर देंगे।

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रूमटेक मोनैस्ट्री की भीतरी दीवार

स्लो टूरिज़्म के लिए चले आएं सिक्किम

पूर्वोत्तर के राज्यों में कुदरती नज़ारे हैं और सिक्किम भी इसका अपवाद नहीं है। नए दौर का तकाज़ा है कि कुदरत के साथ भागमभाग में न उलझा जाए। धीमी रफ्तार से, धीरे-धीरे नज़ारों को जज़्ब करने के लिए उत्तरी सिक्कम को हमने अगले पड़ाव के रूप में चुना। यही कोई सवा सौ किलोमीटर दूर लाचुंग-लाचेन हैं और वहां से और पचास-एक किलोमीटर दूर गुरुरडोंगमार झील। सिक्किम की पवित्र झीलों में से एक है यह जो कंचनजंगा की गोद में है। यों तो झीलों का अद्भुत संसार है पूरी हिमालयी श्रृंखलाओं में लेकिन गुरुडोंगमार सरीखी झीलें अपने सौंदर्य के अलावा पवित्रता की वजह से भी खास दर्जा रखती हैं। सिक्किम की उत्तरी सीमाओं से सटे लाचेन ने तमाम होमस्टे, गेस्ट हाउसों की भीड़ के बीच भी अपनी कस्बाई पहचान को बचाकर रखा है। और यहां तक पहुंचने की राह भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। लेकिन गैंगटोक से करीब आठ-दस घंटे का यह लंबा सफर एक पल को भी उबाउ नहीं लगता। रास्ते भर पहाड़ियों की कतार, कभी फूलों की घाटियं, झरने और नदियों के मोड़ आपको अपने में उलझाते रहेंगे। हां, किसी लग्ज़री टूरिज़्म की तलाश में हों तो इधर का रुख भूल से भी न करें। वैसे भी गैंगटोक से बाहर निकलने के बाद शहरी सभ्यता से नाता टूटने लगता है, एकदम बुनियादी गेस्ट हाउसों में रुकने के लिए तैयार रहें। रास्ते में रुकते-रुकाते गरमागरम मोमोज़, चाय की चुस्कियां और कहीं घाटियों में टहलते याक आपके पर्यटन को एक नया अंदाज़ देंगे। एक के बाद एक नई मंजिलों पर भागने-लपकने की बजाय यहां ‘स्लो टूरिज़्म’ का मंत्र ज्यादा काम आता है। हो सके तो दो-तीन दिन यहीं ठहर जाएं, गुरुडोंगमार झील के सौंदर्य और उसकी परम शांति को अपने जीवन में उतारें और कंचनजंगा की बर्फीली सतह से टकराकर लौटती हवाओं को जज़्ब करें।

उत्तरी सिक्किम का यह क्षेत्र राज्य के चारों जिलों में सबसे बड़ा है लेकिन सबसे कम आबादी वाला है। प्राकृतिक नज़ारों, संस्कृति और आध्यात्मिकता का खास समीकरण भी यहां दिखता है। और फोंदोंग तथा फेन्सांग मठों के रूप में सिक्किम की एक पुरानी-विशिष्ट विरासत को सहेजने वाला इलाका भी यही है। इसकी प्राकृतिक समृदि्ध का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि आप यहां 3894 फुट से लेकर 17,100 फुट तक की भौगोलिक विविधता से गुजरते हैं।

नाथूला और छुंगू झील

उत्तरी सिक्किम के इस सूदर सिरे में तीन रोज़ बिताकर हम लौट आए थे। इस बीच, टूर आपरेटर ने खबर दी कि नाथुला के लिए हमारे परमिट मंजूर हो गए हैं और अगले पूरे दिन का एजेंडा खुद ही तय हो गया। पिछले पांच दिनों से इसी परमिट के इंतज़ार में हमने सिक्किम के और कई अहम् पड़ाव पार कर लिए थे। दरअसल, लैंडस्लाइड ने नाथुला जाने की राह को बंद कर दिया था और सेना ने टूरिस्ट परमिटों पर रोक लगा दी थी। अगले दिन सड़क के साथ—साथ मौसम भी खुला था और हम गैंगटोक की हद छोड़कर करीब पचास किलोमीटर दूर इस ऐतिहासिक भारत—चीन सीमा की तरफ बढ़ चले। सिल्क रूट का हिस्सा रहा है नाथुला और किसी ज़माने में व्यापारियों के काफिलों के अलावा तीर्थयात्रियों, साधुओं—घुमक्कड़ों की टोलियां यहां से गुजरा करती थीं। फिर पचास के दशक में चीन से तनातनी के बाद इस मार्ग से कारोबारी रिश्तों में ठंडक पसर गई जो 2006 में पूरे 44 साल की चुप्पी के बाद टूटी। और इस साल तो जून से कैलास-मानसरोवर का नया वै​कल्पिक मार्ग भी इस 14,100 फुट उंचे दर्रे से होकर गुजरेगा।

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नाथुला से कुछ पहले छंगू झील पर रुकना बनता है। इस एक किलोमीटर लंबी झील को भी पवित्र झीलों में ही गिना जाता है। मार्च की उस सर्दी में झील के चारों तरफ बर्फ फैली थी और झील ने पिघलना शुरू कर दिया था। हां, वो गरम सूप और मोमोज़ बेचती दुकानें अभी बंद थीं जिनका स्वाद मेरे पिछले सफर से अभी तक जुबान पर छाया था!

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कुछ छोड़ आएं लौटने के लिए

सिक्किम में प्रवास के आठ दिन बीत गए थे और पेलिंग की पेमायांग्त्से मोनैस्ट्री हमें बुला रही थी। सिर्फ एक दिन हमारे हाथ में बचा था जो मेरे स्लो—टूरिज़्म के मुहावरे में ​कहीं फिट नहीं हो रहा था। हमने पेलिंग को अपने अगले सफर के लिए रख छोड़ने का फैसला लिया और वो खाली दिन फिर गैंगटोक की एम.जी.रोड के नाम हो गया। मुसाफिर मन जानता है कैसे अगली दफा लौट आने का इंतज़ाम करना जरूरी है! सफर को अधूरा छोड़ देना तो बस उस अगले सफर का बहाना है!

कैसे पहुंचे — सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में न्यू जलपाईगुड़ी (एनजेपी) है जहां से राजधानी गंगटोक की 120 किलोमीटर की दूरी प्राइवेट टैक्सी से करीब 4 घंटे में या राज्य परिवहन की बसों से नापी जा सकती है। नज़दीक हवाईअड्डा सिलीगुड़ी से 12 किलोमीटर दूर बागडोगरा है।

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