Rann Utsav – an evening in Kachchh

कच्छ की रूह से रूबरू होने की उम्मीद

शाम-ए-सरहद बीतने को थी। रन पर बिखरी झिलमिलाती सफेदी अब धीरे-धीरे और भी चटख होने लगी थी। सूरज का वो विशालकाय गोला पानी में छपाक से गिरा और डूबता रहा, देर तलक … दूर क्षितिज उसे अपनी गोद में समोता रहा था। हिंदुस्तान के धुर पश्चिम में कच्छ के रन पर फैले नमक ने जैसे अब बर्फ में बदलना शुरू कर दिया था। हवा में ठंडक घुल रही थी और पैरों तले पसरी सफेदी को देखकर यह भ्रम होना लाज़िम था कि हम हीरों की एक चादर पर से गुजर रहे थे। आकाश में भी पूरा चांद टंगा था। सुना था चांदनी रात में कच्छ के रन का नज़ारा किसी स्वप्नलोक से कम नहीं होता, उसी नज़ारे ने हमारी स्मृतियों में उस रोज़ घुसपैठ शुरू कर दी थी!

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गुजरात के उत्तर-पश्चिम में कछुए के आकार का यह टापू एकदम सपाट रेगिस्तान है, लेकिन किसी भी दूसरे मरुस्थल की आपके दिलो-दिमाग पर खुदी छवि से एकदम फर्क भी है। न रेत है न रेत के टीले, बस नमकीन सफेद नमक है जो उस रोज़ दूधिया चांदनी में नहाकर और भी निखर गया था। नमक के उस सैलाब को मैंने अपनी मुट्ठी में भरना चाहा, यह देखने के लिए कि क्या सचमुच नमक ही था वो जो मेरे इर्द-गिर्द, पैरों तले फैला था, जो निगाहों की हदों तक पसरा था और जिसने इस बियाबान को अलहदा बना दिया था।

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कहते हैं एक ज़माने में हिमालय से उतरी सिंधु नदी इसी ज़मीन पर बहती थी, उसका पाट आसपास इतना चौड़ा था कि नज़दीक ही बंदरगाह भी था जिस पर जहाज़ों की आवाजाही से यह इलाका आबाद था। फिर 1819 में ज़मीन के नीचे कुछ ऐसी हलचल हुई कि सिंधु का रुख मुड़ गया और तबसे आज तक वो पाकिस्तान के सिंध में बह रही है। नदियों का यों रूठना अपने पीछे सिर्फ रेगिस्तान छोड़ जाता है, कच्छ का यह इलाका भी इस नियम से जुदा कहां रहा! सुनते तो हैं कि कभी सरस्वती भी इसी ज़मीन को दुलराती थी, फिर वो भी कब, कैसे गुम हो गई इसकी पड़ताल आज तक जारी है।

रन उत्सव में शिरकत के बहाने गुजरात की ज़मीन से नाता जुड़ रहा था। महसाणा स्टेशन पर उतरकर रावजीभाय की इनोवा की सवारी तय की और दौड़ चले एनएच15 पर। राधनपुर होते हुए यह फर्राटा हाइवे अंजार पहुंचा तो 2001 में आए भूकंप की तबाही का मंज़र फिर याद दिला गया। भचाउु जिले का अंजार ही तो था जो उस भूकंप में जमींदोज़ हो गया था। अबकी बार नई इमारतों के सिलसिले यहां दिखे। सुना चांदी के गहनों का गढ़ भी है अंजार, आंखों में एक चमक उठी लेकिन दिन चढ़ने से पहले भुज पहुंचने की जल्दी थी। इसलिए अंजार में रुके बिना आगे बढ़ गए। जनवरी में जिस ठंडक के आदी होते हैं हमारे तन-बदन उसकी याद यहां धूमिल पड़  रही थी। आसमान में चढ़ता सूरज लगातार ताकीद कर रहा था कि दोपहर होते-होते गर्मी बढ़ जाएगी। लिहाजा उस फर्राटा हाइवे पर लगातार भागते रहे हमारे बदन।

कच्छ जिले की राजधानी है भुज, प्रशासनिक ठिकाना कह लो, बस उसी तक पहुंचना था जल्द-से-जल्द। भुज से लगभग 80 किलोमीटर दूर सजती है रन उत्सव नगरी। कच्छ के रन में बसे आखिरी गांव धोरडो में रन महोत्सव हर साल दिसंबर की पहली पूर्णिमा से शुरू होता है। भारत में शायद सबसे लम्बे समय तक चलने वाले इस रन उत्सव में गुजराती संस्कृति हिलोरें लेती है। गुजरात की बेदाग सड़कों पर सैंकड़ों किलोमीटरों का सफर तय करते हुए जब आप देश के पश्चिमी किनारे पर पहुंचते हैं तो भव्य टैंट नगरी कुछ इस तरह आपके सामने सजधज कर खड़ी नजर आती है जैसे किसी बादशाह ने जंग में फतह हासिल कर उल्लास भरा लंगर डाल दिया हो।

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गुजरात टूरिज़्म ने सैलानियों के लिए रेगिस्तानी बियाबान में पांच सितारा सुविधाओं से लैस टैंट नगरी यहां बसायी है। रन के रेतीले दरिया पर रंग-बिरंगे टैंट कई एकड़ में फैले हैं और यहां तक कि स्थानीय लोगों के माटीघरों की ही तर्ज पर बने ‘भुंगा’ में भी आप ठहर सकते हैं। इस नगरी में ठहरना ऐसा था मानो किसी पेंटिंग में रहना हो। टैंट नगरी के डाइनिंग हाल में बाजरे के रोटले और ’चास‘ (छाछ) के साथ थेपला, फाफड़ा, खम्मण से लेकर ओंधिया, कच्छी कढ़ी, गुजराती थाली जैसे ढेरों वेजीटेरियन व्यंजनों का लुत्फ लिया जा सकता है। सवेरे करीब छह बजे जब सूरज बिस्तर में करवट ले रहा होता है उस वक्त इस टैंट नगरी में योग, ध्यान का सत्र शुरू हो जाता है। स्पा, मसाज, नेचरोपैथी जैसी सुविधाओं को उपलब्ध कराने वाले काउंटर भी हैं।

कच्छ के धुपीले आसमान पर अजब-गजब आकारों के परिंदों का कब्ज़ा था। सूरज की सवारी उत्तरायण का रुख कर रही थी और मकर संक्रांति के पर्व का उल्लास उस पूरी दोपहर रन के आकाश में तिरता दिखा। सरहद के आकाश पर जैसे पतंगों का कब्ज़ा हो गया था। सैलानियों ने अपने तंबुओं को अलविदा कहा और टैंट नगरी के आंगन में उमड़ पड़े। यों तो पतंगबाजी हमने कई बार देखी है मगर रन के आसमान में उड़ती पतंगों का वो नज़ारा कुछ खास ही था। और टैंट नगरी के भीतर यात्रियों को यहां से वहां सैर कराते छकड़ा की सवारी भी तो अभी बाकी थी। रन उत्सव होगा गुजरात टूरिज़्म का आयोजन.. मेरे लिए तो मेरे भीतर के बच्चे के चहकने का सबब बन गया था !

शाम को सितारों से ढके आसमान तले मेघवाल गायकों की महफिल जमने लगी थी। दास्तानों और काफियों की उस शाम कितने ही राजकुमारों, रानियों के किस्सों से रन नगरी जगमगाने लगी, जाने कितने ही किलों की दीवारों के पीछे छिपा संसार उघड़ा था और मेघवालों की गायकी ने वक़्त में धुंधलाए संग्रामों-युद्धों के किस्सों को फिर ताज़ादम कर दिया था। उस रात कहीं सितारे उतरकर किसी कोने में टैंट नगरी के कंधे से झूल गए थे तो किसी नक्षत्र ने अपनी सवारी को जैसे नीचे ही उतार लाने की ठानी थी!

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मैंने सुन रखा था कि अंधेरी रातों में जब रन सोने चला जाता है तो उस पर कुछ बत्तियां ठुमकती हैं, यहां से वहां दौड़ती रोशनी की उन गेंदों का पीछा करो तो गायब हो जाती हैं और उनसे पीठ कर लो तो वो खुद आपका पीछा करती हैं। स्थानीय कच्छी आबादी के लिए ये चिर बत्तियां हैं, उनके पूर्वजों की रूहें, जो रातों में सफेद रन को जगमगाती हैं। इन्हें अक्सर देखा गया है लेकिन इनके रहस्य पर पड़ा परदा अभी उठा नहीं है। कच्छ ही क्या दुनिया के कुछ और रेगिस्तानों में भी ऐसी ही रोशनियां ​दिखती रही हैं – “घोस्ट लाइट”। रन की टैंट नगरी की हद को पीछे छोड़कर हम कुछ आगे चले आए थे, मन के किसी कोने में उम्मीद थी कि शायद हमारी मुलाकात भी किसी कच्छी रूह से हो जाए… शायद!

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