Nirvana at the highest spiritual place on the planet!

शिवधाम की राह हुई आसान

Kailash Manasarovar Yatra 2015

To apply online, go to: http://www.mea.gov.in

Applications – Entire application process has been made online only. Paper applications will NOT be accepted.

Last date to apply online: 10 April, 2015

Eligibility – 18 yrs – 70 yrs/ Indian Passport holder

Yatra period – Between 08 June and 09 September (Old route – 22 days, New route – 20 days)

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Yam Dwar, starting point of Kailas circuit

कैलास-मानसरोवर के पावन धाम तक पहुंचने का अपेक्षाकृत आसान और हर मौसम में आवागमन के उपयुक्त मोटरमार्ग खोलने की वर्षों पुरानी मांग के चलते एक नया मार्ग भारत-चीन सरकार ने खोलने की  घोषणा कर दी है। सिक्किम में नाथूला से शिगात्से (तिब्बत) होते हुए जाने वाले तीर्थयात्रियों को तिब्बत के एक ऐसे बड़े भू-भाग को भी नजदीक से देखने-समझने का अवसर मिलेगा जो इस भूगोल से वाकिफ नहीं हैं। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कैलास-मानवरोवर की पारंपरिक प्राचीन यात्रा के संदर्भ में इस मार्ग का पहले से कोई महत्व नहीं है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने जो यात्राएं की हैं वे ज्यादातर उत्तराखंड – तिब्बत सीमा पर हिमालयी दर्रों को पार कर की जाती थीं। नाथूला के रास्ते व्यापार तो तिब्बत के साथ बरसों से होता आया है लेकिन तीर्थयात्रियों के कदम इस ओर शायद ही उठे हैं।

“आकाश में अपने श्वेत शिखरों को फैलाए खड़े श्री कैलास को देखकर ऐसा बोध होता है मानो  शिव के प्रतिदिन का अट्टहास एक स्थान पर एकत्र हो गया हो!” यह मेघदूत में कालिदास की निरी कल्पना नहीं थी बल्कि सच तो यह है कि कश्मीर से लेकर भूटान तक विस्तृत भूभाग में फैली कैलास पर्वत-श्रेणी के बीच आकाश को छूते शिवलिंग आकार वाले कैलास पर्वत के ‘शुभ्र -रजत ’ शिखर को देखकर किसी के भी मन में ऐसे ही भाव उपजते हैं। तिब्बती पुराण में वर्णित है कि कैलास की एक परिक्रमा एक जन्म में किए समस्त पापों को और इसकी 10 परिक्रमाएं एक कल्प में किए हुए पापों को नष्ट करती है। पाप-पुण्य का यह लेखा-जोखा तो जाने कहां तय होता है, लेकिन तिब्बती, हिंदू, जैनी और बौद्ध धर्मावलंबी सदियों से पूरे श्रद्धाभाव से कैलास-मानसरोवर की परिक्रमाएं करते आ रहे हैं। कभी पचास-पचपन दिन की दुरूह, चुनौतीपूर्ण और यहां तक कि कई बार जानलेवा साबित होने वाली इस तीर्थयात्रा के तौर-तरीके बीते वर्षों में मार्ग के भूगोल से प्रभावित होते रहे हैं। पचास साल पहले तक जो यात्रा सिर्फ पैदल मार्गों से हुआ करती थी वो पिछले तीन दशकों से भारत के विदेश मंत्रालय की देखरेख में व्यवस्थित तरीके से होने लगी है, हालांकि वो भी दिल्ली से पिथौरागढ़ तक सड़क मार्ग के बाद आगे पहाड़ी रास्तों पर पैदल ही की जाती है। कई निजी टूर आॅपरेटर नेपाल और ल्हासा के रास्ते भी इस तीर्थयात्रा का आयोजन हर साल करते हैं। अलबत्ता, ये सभी मार्ग काफी हद तक कठिन हैं, लंबे हैं और इनसे होकर की जाने वाली यात्राएं भी बेहद मंहगी साबित होती हैं। उत्तराखंड से होकर गुजरने वाले प्राचीन और पारंपरिक तीर्थयात्रा मार्ग की दुरूहता किसी से छिपी नहीं है, सिर्फ शारीरिक रूप से चुस्त और स्वस्थ लोग ही इसे कर सकते हैं। ऐसे में मोटरमार्ग से तीर्थयात्रा का वैकल्पिक मार्ग तलाशने की मांग लंबे समय से बनी हुई थी।

Route 1: Lipulekh Pass (Uttarakhand)

  • 18 batches of 60 members each with total duration of about 25 days per batch.
  • Estimated cost per person: Rs.1.5 Lakh.

Route 2: Nathu La (Sikkim)

  • 5 batches of 50 members each with total duration of about 23 days per batch.
  • Estimated cost per person: Rs.1.7 Lakh.

नाथूला दर्रे से होकर कैलास-मानसरोवर

पिछले साल चीनी रा”ट्रपति ली शीपिंग की भारत यात्रा के दौरान सिक्किम के रास्ते नाथूला दर्रे से होकर कैलास-मानसरोवर की तीर्थयात्रा का नया मार्ग जल्द खोलने की घोषणा की गई थी। बीते हफ्ते विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की चीन यात्रा ने भारतीय तीर्थयात्रियों की इस पुरानी मांग को अंजाम तक पहुंचा दिया। सर्वमंगलकारक शिव के निवास-स्थान श्री कैलास और इसी के दक्षिण  में स्थित पावन मानवरोवर झील के दर्शन की इच्छा रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए भारत-चीन सरकार ने मिलकर इसी साल से एक नई राह तीर्थयात्रा के लिए खोलने की घोषणा कर दी है। पूर्वोत्तर में सिक्क्मि से नाथूला होते हुए तिब्बत के दूसरे बड़े शहर शिगात्से से शिवभक्तों का पहला काफिला इस साल जून में कैलास-मानवरोवर के दर्शन को जाएगा। यह राह मौजूदा मार्ग से कहीं ज्यादा लंबी होगी लेकिन पूरा मोटरमार्ग होने की वजह से उन तीर्थयात्रियों को दर्शन का लाभ दिलाएगी जो उत्तराखंड के रास्ते होकर जाने वाले दुरूह पैदल मार्ग से यात्रा करने में असमर्थ हैं।

कहां से गुजरेगा तीर्थयात्रा का नया मार्ग

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विदेश मंत्रालय हर साल की तरह कैलास-मानसरोवर तीर्थयात्रा का प्रमुख सूत्रधार रहेगा। दिल्ली से बागडोगरा तक (1100 किलोमीटर) यात्रियों को हवाई जहाज से ले जाया जाएगा, यहां से गंगटोक (सिक्किम) तक 122 किलोमीटर का सफर सड़क मार्ग से होगा। अगला पड़ाव 55 किलोमीटर दूर नाथूला दर्रा होगा जो लगभग 14 हजार फुट की ऊंचाई पर है। लिहाजा, यहां तक आते-आते एक्टीमेलाइजेशन की जरूरत महसूस होने लगेगी। विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि यात्रियों को ऊंचाई पर यात्रा के लिए तैयार करने की प्रक्रिया गंगटोक से ही शुरू हो जाएगी, जो लगभग 5000 मीटर की ऊंचाई पर है और पहाड़ी आबो-हवा का अहसास कराने के लिहाज से भी उपयुक्त है। इसके आगे रास्ता अधिक ऊंचे पर्वतीय इलाकों से होकर गुजरेगा और नाथूला तक भारतीय सीमा में रहने के बाद यहां से आगे का बंदोबस्त चीनी अधिकारियों की देखरेख में होगा। नाथूला से 192 किलोमीटर दूर नग्मा, फिर 295 किलोमीटर आगे लाज़ी और यहां से 480 किलोमीटर बाद ज़ोंग्बा तक की सड़क यात्रा छोटी बसों से होगी। इसके आगे लगभग 465 किलोमीटर का लंबा सफर मानसरोवर के तट पर कुगू ले जाएगा। यानी लगभग 1400 किलोमीटर का यह सफर पश्चिमी तिब्बत में मोटरमार्ग से होते हुए परिक्रमा मार्ग तक यात्रियों को ले जाएगा। कैलास परिक्रमा के आरंभिक स्थल यमद्वार तक पहले से ही बस मार्ग मौजूद है जबकि लगभग 52 किलोमीटर की कैलास की परिक्रमा यात्री पैदल अथवा खच्चरों पर कर सकते हैं। मानसरोवर की 60 किलोमीटर परिक्रमा पहले से ही बस से करायी जाती है और नए वैकल्पिक मार्ग से आने वाले यात्रियों को भी यह सुविधा मिलेगी। इस तरह, राजधानी दिल्ली से यमद्वार तक लगभग 2700 किलोमीटर का लंबा एकतरफा सफर तय कर तीर्थयात्री शिवस्थली पहुंचेगे।

इतिहासकार और हिमालयी सरोकारों के विशेषज्ञ शेखर पाठक कहते हैं, “कैलास-मानसरोवर का नया मार्ग पश्चिमी तिब्बत में  शिगात्से होते हुए यात्रियों को सड़कमार्ग से सुविधाजनक तरीके से तीर्थ दर्शन कराएगा और भारत जैसे बड़े देश के लिए यह उचित भी है कि तीर्थयात्रियों को आने-जाने के एकाधिक विकल्प उपलब्ध होने चाहिए। लेकिन यह मोटरमार्ग काफी लंबा है और पहाड़ी रास्तों से होने वाली कई दिनों की इस यात्रा को आसान समझ लेने की भूल नहीं करनी चाहिए। लगभग डेढ़ हजार किलोमीटर का एकतरफा पहाड़ी रास्ता नापना भी बूढ़ी हड्डियों के लिए बहुत सहज नहीं होगा। हां, इतना जरूर है कि इस रास्ते से पैदल नहीं चलना पड़ेगा और तिब्बत के एक ऐसे बड़े भू-भाग को भी नजदीक से देखने-समझने का अवसर यात्रियों को मिलेगा जो इस भूगोल से वाकिफ नहीं हैं। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कैलास-मानवरोवर की पारंपरिक प्राचीन यात्रा के संदर्भ में इस मार्ग का कोई महत्व नहीं है। प्राचीन ऋषि- मुनियों ने जो यात्राएं की हैं वे ज्यादातर उत्तराखंड – तिब्बत सीमा पर हिमालयी दर्रों को पार कर की जाती थीं। नाथूला के रास्ते व्यापार तो तिब्बत के साथ बरसों से होता आया है लेकिन तीर्थयात्रियों के कदम इस ओर शायद ही उठे हैं। इस लिहाज से यह एकदम नया तीर्थयात्रा मार्ग होगा।”

कितना होगा नए मार्ग से यात्रा का खर्च

फिलहाल पारंपरिक मार्ग से यात्रा का खर्च लगभग सवा लाख रु आता है जिसमें करीब 50 हजार रु का भुगतान चीन को उसके क्षेत्र में यात्रियों की व्यवस्था, वीज़ा खर्च के रूप में किया जाता है और केएमवीएन (KMVN – http://www.kmvn.gov.in/) उत्तराखंड में यात्रा की व्यवस्था के लिए 32 हजार रु लेती है। कुलियों, घोड़ों, खच्चरों आदि का इंतज़ाम भी इसी सवा लाख रु में हो जाता है। ऊपर से हर यात्री ट्रैकिंग के लिए जूते-कपड़े-रेनकोट वगैरह पर भी बीस-पच्चीस हजार रु खर्च करता है। यानी प्रति यात्री करीब डेढ़ लाख रु खर्च होते हैं। नाथूला दर्रे से होकर खुला यात्रा मार्ग मौजूदा रास्ते से कहीं अधिक लंबा है और इसमें यात्री अधिक दिन चीनी क्षेत्र में गुजारेंगे। इस नए वैकल्पिक मार्ग को चुनने वाले यात्रियों को कुल-मिलाकर 1 लाख सत्तर हजार रु तक खर्च करने पड़ सकते हैं।

यात्रा की पूरी अवधि

जो लोग इस मुगालते में हैं कि नया वैकल्पिक मार्ग चीन के शासन वाले तिब्बत में फर्राटा हाइवे से होकर गुजरेगा और शायद कम समय में यात्रा पूरी हो जाएगी उन्हें यह खबर चौंका सकती है कि यात्रा पर अब भी करीब 20 दिन लगेंगे। फिलहाल उत्तराखंड में ट्रैकिंग रूट से गुजरने वाली तीर्थयात्रा 22 दिनों में पूरी होती है। विदेश मंत्रालय यात्रियों को सिक्किम में ही यात्रा समाप्त करने का विकल्प देने पर विचार कर रहा है ताकि जो लोग गंगटोक में रुकना चाहें वे रुककर आगे अपना सफर अपने हिसाब से कर लें। इसी तरह, पुराने उत्तराखंड मार्ग से यात्रा करने वाले यात्री भी इस साल से धारचूला में अपनी यात्रा समाप्त करने या दिल्ली तक लौटने का विकल्प चुन सकेंगे।

कितने यात्रियोंं को मिलेगी नए मार्ग से तीर्थयात्रा की मंजूरी

विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि इस बार ट्रायल यात्रा के तौर पर कुल पांच जत्थों में यात्रियों को भेजा जाएगा। प्रत्येक में अधिकतम 50 यात्री होंगे, यानी कुल ढाई सौ तीर्थयात्री सिक्किम से होकर तिब्बत जा सकेंगे। उधर, उत्तराखंड मार्ग से 18 जत्थों में 1080 यात्रियों को भेजने की मंजूरी चीन ने पहले ही दे रखी है। यात्रियों को पहले दिल्ली में और फिर गुंजी में कड़ी मेडिकल जांच के बाद ही आगे यात्रा जारी रखने की मंजूरी दी जाती है। पिछले साल कुल 18 जत्थों में 910 यात्रियों ने तिब्बत स्थित कैलास पर्वत तथा पावन मानस झील के दर्’ान किए थे जो कि अब तक का रिकार्ड है।

क्या हैं कैलास-मानसरोवर यात्रा के मौजूदा विकल्प

भारत से बाहर हिंदुओं के पवित्रतम तीर्थस्थल और एकमात्र ज्योतिर्लिंग श्री कैलास पश्चिमी तिब्बत में ट्रांस-हिमालय रेंज में समुद्रतल से 22028 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। फिलहाल यहां तक जाने के दो-तीन ही मार्ग खुले हैं, पहला मार्ग उत्तराखंड में अल्मोड़ा से धारचूला तक मोटरमार्ग तक और इसके आगे चुनौतीपूर्ण पहाड़ी रास्तों पर करीब 82 किलोमीटर ट्रैकिंग कर कुमाऊं-तिब्बत सीमा पर लिपुलेख दर्रे को पार कर कैलास-मानसरोवर पहुंचाता है। दिल्ली से अल्मोड़ा-धारचूला-लिपुलेख-दारचेन-यमद्वार-डेराफुक-डोल्मा ला-जुनझुइप होकर जाने वाला यह तीर्थयात्रा का मार्ग दुरूह भले ही सही लेकिन दुनिया के सुंदरतम ट्रैकिंग रूटों में शुमार है और काली नदी के किनारे-किनारे होते हुए यात्री प्रकृति का अनुपम सौंदर्य निहारते हुए आगे बढ़ते हैं। आगे तिब्बत में करनाली नदी के दर्शन यात्रियों को होते हैं।

उत्तराखंड से गुजरने वाला तीर्थयात्रा मार्ग यात्रा के प्राचीनतम मार्गों में से है और हजारों वर्षों से हमारे पूर्वज, साधु-संत इससे होकर तीर्थ करने के आते-जाते रहे हैं मगर यह उन यात्रियों के लिए अनुपयुक्त है जो अधिक चल नहीं सकते। इस मार्ग से वही जा सकते हैं जिनके लिए शारीरिक फिटनैस कोई समस्या नहीं है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और उत्तराखंड की पर्यटन एजेंसी कुमांऊ मंडल विकास निगम द्वारा इस यात्रा का संचालन किया जाता है जिसके लिए हर साल जनवरी-फरवरी में विज्ञापन जारी किए जाते हैं और अप्रैल में कंप्यूटर द्वारा ड्राॅ के आधार पर यात्रियों को चुना जाता है।

तथ्य सरसरी तौर पर

 यात्रा खर्च – लगभग 1 लाख 70 हजार रु
 दिन – 20 दिन
 रूट – दिल्ली-बागडोरा (हवाई यात्रा) 1100 किलोमीटर
बागडोगरा-गंगटोक-नाथूला (भारतीय सीमा) से नग्मा-लाज़ी+ज़ोंग्बा-कुगू (तिब्बती सीमा)
(सड़क मार्ग) 1600 किलोमीटर
 आवेदन – पूरी प्रक्रिया आॅनलाइन (यात्रा प्रक्रिया पहली बार पूरी तरह आॅनलाइन)
 यात्रियों को एसएमएस@आईवीआरएस@ईमेल के जरिए मिलेंगे चयन और यात्रा संबंधी अन्य अपडेट (यह पहली बार किया जाएगा)

सारी ज्यादा जानकारी विदेश मंत्रालय की वेबसाइट http://www.mea.gov.in/kmy.htm पर उपलब्ध है।

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