Andamans archipelago charms History buffs and nature lover alike How about spending New Year in the strings of Andamanese islands ?

अंडमान – इतिहास की गलियों से प्रकृति के नज़ारों तक का सफर

राधानगर बीच पर समंदर अपने विराट अस्तित्व को पसारकर चुपचाप हिलोरें लेता रहता है। पश्चिम में सूरज का गोला लगभग पिघलकर जब आसमान में गुलाबी-बैंजनी और न जाने कितने रंगों की छटा बिखेरता है तो कैमरों की जलती-बुझती बत्तियां गवाह होती हैं
इस बात की कि वो एक नायाब पल कइयों की यादों में कैद हो रहा होता है। 

नए साल की छुट्टियां कहां बितायी जाएं इसका फैसला लेने का समय बस अब निकला जा रहा है। आनन-फानन में किसी ट्रैवल पैकेज में फंसने या मसूरी-नैनीताल- शिमला के जोड़-घटा में उलझने की बजाय आज ही अपनी छुट्टियों का भाग्य तय कर डालें। एडवेंचर प्रेमी हैं या इतिहास पसंद, देश-प्रेम की खुराक को वैकेशन में उड़ेलना चाहते हैं या फिर प्रकृति के साथ जी-भरकर अठखेलियां करने का इरादा है तो बिना कुछ ज्यादा विचार किए अंडमान का टिकट आज ही कटा लें।

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बच्चों के संग जा रहे हैं तो स्नाॅर्कलिंग-स्कूबा-कयाकिंग जैसी गतिविधियों को चुनें। तैरना आता है या नहीं, पहले वाॅटर स्पोर्ट्स का अनुभव लिया है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बस इतनी तसल्ली कर लें कि जिस भी एजेंसी को चुनें उसके पास योग्य ट्रेनर, इंस्ट्रक्टर जरूर हों, सेफ्टी जैकेट का इस्तेमाल करें और बस अंडमान के टापुओं से समंदर में डुबकी लगाने उतर जाएं।

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स्नाॅर्कलिंग-स्कूबा डाइविंग के लिए हैवलाॅक और नील टापुओं पर अड्डा जमाना सही होगा। यों भी करीब 536 द्वीपों वाले अंडमान-निकोबार में बमुश्किल तीन दर्जन टापू ही हैं जिन पर बसावट है और उनमें भी उन टापुओं को उंगलियों पर गिना जा सकता है जिन पर जाने की इजाज़त सैलानियों को है। हिंदुस्तानी पर्यटकों के लिए किसी परमिट की जरूरत नहीं है और कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली से सीधी उड़ान सेवाएं पोर्टब्लेयर तक यात्रियों को हर दिन पहुंचाती हैं। अगर समय की किल्लत नहीं है और अनूठे अंदाज में अंडमान द्वीपों को खंगालने का मन है तो समुद्री जहाज़ का सफर भी कम रोमांचक नहीं होता। शिपिंग कार्पोरेशन आॅफ इंडिया कोलकाता, कोच्चि और विशाखापत्तनम से जहाज़ों का संचालन करता है जो करीब 60 घंटे के सफर के बाद पोर्टब्लेयर पहुंचाते हैं। लेकिन समुद्र के मिजाज़ पर काफी कुछ निर्भर होता है इसलिए जहाज़ की सवारी का फैसला उसी सूरत में करें जब हाथ में समय हो, और एकाध दिन जहाज़ सेवा के रद्द होने से आपका ब्लड प्रेशर बढ़ने की नौबत न आ जाए!

हैवलाॅक द्वीप

स्कूबा डाइविंग की बेहतरीन मंजिलों में से एक है हैवलाॅक आइलैंड और इसकी शोहरत की इंतिहा तो देखिए कि कइयों के लिए हैवलाॅक ही जैसे अंडमान है! कितने ही विदेशी टूरिस्ट यहां आते हैं, महीनों यहीं टिक जाते हैं और स्कूबा के हुनर सीखकर या फिर खर्रामा-खर्रामा वक़्त बिताकर यहीं से लौट जाते हैं। हैवलाॅक में ही है विश्वप्रसिद्ध राधानगर तट जिसकी बारीक, सफेद रेत का सानी मिलना आसान नहीं! यों तो इस तट पर कोई टूरिस्टी गतिविधि नहीं है लेकिन इसकी महीन रेत पर अलसायी शामों को बिताना अलहदा अनुभव होता है। यों भी वक़्त को बस ऐसे ही फिसलते देखना क्या कम आसान है भागमभाग से भरी इस दुनिया में! राधानगर के समुद्रतट पर सुकून को पसरे हुए देखा जा सकता है, दूर तक फैली इसकी रेत पर अपने पैरों के निशान छोड़कर चले आइये इस बार!

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स्नाॅर्कलिंग और ग्लास बाॅटम बोट राइड के लिए नज़दीकी हाथी बीच की सैर मुफीद है। समंदर के इस वाले हिस्से पर सैलानियों की रेल-पेल कुछ ज्यादा रहती है। सालों पहले आयी सूनामी से उखड़े पेड़ों की शाखें आज भी वक़्त की उस शय को थामे खड़ी दिखती हैं।

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और उस पर स्पीड बोट की फर्राटा सैर, कोरल लाइफ देखने को उतावले सैलानियों की चहल-पहल जैसे चुपचाप कह जाती है – ‘लाइफ मूव्स आॅन’!

अंडमान की गोद में छिपा मोती – नील द्वीप

हैवलाॅक की लोकप्रियता जैसे नील आइलैंड की ओट बन गई है। पोर्टब्लेयर की फिनिक्स बे जेटी से हैवलाॅक के लिए टिकट खरीदते समय नील की ओर बढ़ते विदे’ाी कदम एक बार फिर यही कह गए कि हमारी अपनी जमीन को हमसे ज्यादा जानते-समझते हैं ये विदेशी बैकपैकर जो भरपूर जानकारी लेकर पहुंचते हैं। अब तो नील आइलैंड देखने की जिद भी मेरे घुमक्कड़ी कंधों पर सवार हो गई थी, लिहाजा हैवलाॅक में दो दिन गुजारकर नील का रुख किया। लगभग डेढ़ घंटे की फेरी की सवारी ने हमें अंडमान के इस ’वेजीटेबल बोल‘ यानी सब्जी का कटोरा कहलाने वाले द्वीप पर उतारा। मुश्किल से उन्नीस किलोमीटर की जमीन को कब्जाए खड़ा नील द्वीप पूरे अंडमान के लिए सब्जियां उगाता है।

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यही कोई पांच-छह किलोमीटर चैड़ाई वाले इस टापू का ओर-छोर एकाध घंटे में नापा जा सकता है। द्वीप पर सिर्फ टुक-टुक यानी आॅटो की सवारी है जो हवा से बातें करते हुए आपको सीतापुर बीच से लेकर दूसरे कोने में लक्ष्मणपुर बीच तक का यादगार सफर कराती है।

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हिस्ट्री और हेरिटेज

हिंदुस्तानी सरजमीं से करीब 1300 किलोमीटर समुद्र में बसे अंडमान टापुओं पर जगह-जगह इतिहास की पदचाप आज भी सुनी जा सकती है।

सैलुलर जेल –  शुरूआत पोर्टब्लेयर में बनी सैलुलर जेल से करें। कभी अंग्रेज़ हुक्मरानों को नाकों चने चबा देने वाले घनघोर देशभक्तों की काल कोठरी रह चुकी यह जेल आज सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है।

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टिकट – 10/रु, सोमवार बंद, हर दिन सवेरे 9 बजे से शाम 4 बजे तक खुली। साउंड एंड लाइट शो शाम साढ़े पांच बजे से हिंदी तथा अंग्रेज़ी भाषाओं में आयोजित किए जाते हैं। अंडमान का सफर पोर्टब्लेयर में गर्व से सीना ताने खड़ी सैलुलर जेल को देखे बगैर सचमुच अधूरा है और इस साउंड एंड लाइट शो को सुने बगैर जेल को देखा न देखा लगभग एक बराबर ही है। अगर बच्चों के साथ अंडमान के सफर पर जा रहे हैं तो इतिहास के इस हिस्से पर से होकर गुजरने से कतई न चूकें। एनसीईआरटी की किताबों से कहीं ज्यादा रोचक अंदाज़ में यहां इतिहास टहलकदमी करता मिलेगा। सैलुलर जेल के आंगन में आजादी के साठ बरस बीतने के बाद भी ब्रिटिश दौर की गुलामी के भयावह दिनों को महसूस किया जा सकता है, जेल की कोठरियों और उसके गलियारों से गुजरते हुए आजादी के मतवालों की ‘इंकलाब-जिंदाबाद’ की गूंज जैसे आज भी सुनायी देती है। जेल में ही एक नन्हा म्युज़ियम है जहां इतिहास की परत-दर-परत उठाते हुए आप अंग्रेज़ों की बर्बरता का खुद अंदाज़ा लगा सकते हैं।

राॅस द्वीप – और अगर इतिहास तक को जर्जर होते देखना है तो राॅस आइलैंड चले आइये। पोर्टब्लेयर की अबरदीन जेटी से सिर्फ 15 मिनट की फेरी राइड से यहां पहुंचा जा सकता है। ले-देकर 0.6 वर्ग किलोमीटर में फैला यह नन्हा टापू 1858 से 1941 तक जापान के कब्जे में रहा था और तब इसे युद्ध बंदियों के गढ़ में तब्दील किया गया था। राॅस आइलैंड में आज उस दौर का अगर कुछ बाकी है तो एक खंडहरनुमा चर्च और चीफ कमि’नर के घर की खस्ताहाल दीवारें जिन पर लताओं और पेड़ों का कब्ज़ा तेजी से चल रहा है।

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इसी द्वीप के किसी कोने में बीते जमाने के पानी के बाॅयलर भी रखे हैं जिन्हें जंग ने जैसे खाक बना लेने की ठानी हुई है। दीवारों-दालानों का अहसास कराते खंडहरों से कुछ आगे निकलते ही समंदर के हंसी-ठट्टे हैं और किनारे उगे, हवाओं के संग पींगे लेते नारियल के पेड़ हैं।

अंडमानी धरती पर प्रकृति से मिलन

पोर्टब्लेयर के वीर सारवरकर हवाईअड्डे पर उतरने से कुछ पहले जमीन के कुछ टुकड़े आपको अपनी तरफ आकर्षित कर ही लेते हैं। इनके चारों तरफ जैसे चांदी की लकीरों से घेराबंदी की गई है या फिर हरियाली का हार पहनाया गया है। एक्वा ग्रीन समंदर के अथाह विस्तार में ये जमीन के टुकड़े ही वो द्वीपमाला है जिसे अंडमान आर्किपिलेगो के नाम से जाना जाता है। हैवलाॅक, नील, पोर्टब्लेयर, बाराटांग, लाॅन्ग आइलैंड, लिटल अंडमान, डिगलीपुर, रंगत जैसे नाम टापुओं की इसी लड़ी में यहां-वहां बिखरे हैं। एक से दूसरे तक पहुंचने के लिए जहाजरानी सेवा निदेशालय की फेरी सेवा है और पोर्टब्लेयर से अंडमान ट्रंक रोड पर दौड़ती बसों-टैक्सियों से भी कुछ टापुओं तक पहुंचने का इंतज़ाम है।

Aberdeen Jetty @Portblair

Aberdeen Jetty @Portblair

चिडि़या टापू

सूर्यास्त के कुछ यादगार दृ’यों को अपनी यादों में समेटना चाहते हैं तो चिडि़या टापू जाना न भूलें। पोर्टब्लेयर से सिर्फ 30 किलोमीटर दक्षिण में खड़े इस टापू पर प्रकृति काफी मेहरबान है। समुद्रतट पर कोरल समेत मरीन लाइफ का अद्भुत संसार बिखरा हुआ है। यहां के मुंडे पहाड़ तट पर स्नाॅर्कलिंग और ग्लास बाॅटम बोट राइड से आप समुद्र के भीतर छिपे संसार का दीदार कर सकते हैं।

बाराटांग टापू

अंडमान में प्रकृति के विविध रंग मौजूद हैं। पोर्टब्लेयर से करीब 90 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में खड़े बाराटांग द्वीप पर आपको ऐसा नज़ारा दिखाई देता है जो दूसरी जगहों पर आसानी से नहीं मिलता। यहां कीचड़ उगलते ज्वालामुखी को देखने दूर-दूर से लोग चले आते हैं।

बाराटांग पहुंचना भी अपने आप में किसी अनुभव से कम नहीं होता। इस दूरी को तीन हिस्सों में बांटकर तय किया जाता है। पोर्टब्लेयर से 40 किलोमीटर दूर जिराकटांग पुलिस चेकपोस्ट तक पहला हिस्सा पूरा होता है। यहीं से शुरू होता है अगले 49 किलोमीटर तक का जंगल का वो इलाका जो जरावा वनवासियों के कारण वि’वविख्यात हो चुका है। इस हिस्से में यात्रियों को बसों के कारवां में जाना होता है जो निश्चित समय पर छूटते हैं और साथ में बंदूकधारी पुलिस कर्मी भी चलते हैं। सैलानियों को न तो अपने वाहनों से उतरने की इजाज़त होती है और न ही पैदल चलने की, फोटो-वीडियो की भी सख्त मनाही है। यही वो इलाका है जहां मुट्ठीभर जरावा ट्राइबल बसते हैं। उनके इस प्रदेश से गुजरते हुए आप खुद-ब-खुद रोमांच से रोंगटे खड़े पाएंगे। नाटे कद, काली चमड़ी और सुर्ख आंखों वाले जरावा वनवासी सभ्यता के स्पर्श से दूर इन जंगलों की ओट में आपको दिख जाएं तो उन्हें अजूबा समझकर चीखें-चिल्लाएं नहीं और न ही उनकी तस्वीरें अपने कैमरों में उतारने की भूल करें। प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर रह रहे प्रकृति के इन मूल बाशिन्दों को देखना बेशक एक यादगार अनुभव होता है, बस उन्हें यादों में समेटे रहने दें और आगे बढ़ जाएं।

जंगल का हिस्सा पार होते-होते मिडल स्ट्रेट जेटी पर पहुंचते हैं जहां से करीब 15 मिनट की फेरी की सवारी आपको बाराटांग टापू पर लाती है। इस निर्जन टापू पर सिर्फ ज्वालामुखी की कारस्तानी देखने ही सैलानी पहुंचते हैं। लगभग पूरे दिनभर का यह सफर आपसे समय के अनुशासन की मांग तो रखता ही है साथ ही सभ्यता की निशानियों से कोसों दूर बसे वनवासी समाज के प्रति जिम्मेदारी दिखाने का भी आग्रह करता है। अंडमान ऐसे ही कई रहस्यों को अपने टापुओं में सजाए खड़ा है, बस किसी रोज+ चुपचाप चले आइये और खंगालिए इसके मोतियों को।

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