the homecoming!

 मैं बहुत दिनों बाद इतरायी थी उस रोज़ ..

क्या आपको घर के सपने आते हैं? मुझे अक्सर आते हैं, पुराने—पुराने घरों के, बहुत पुराने, नामालूम वो कबकी यादें होती हैं जो सपनों में घुसपैठ कर जाती हैं और फिर मुझे उन घरों में ले जाती हैं जिन्हें चेतन कभी का भुला चुका होता है। घरों को लेकर ये जो अजीब—सा घमासान रहता है उसी ने मुझे इस बार रानीखेत से करीब छह किलोमीटर दूर एक घाटी में उतरती इस पगडंडी पर पहुंचा दिया।

IMG_20140423_162355

काफल और बेड़ू के पेड़ों से घिरी यह छायादार राह एकदम किसी रूमानी सफर की तरह थी

 

IMG_20140423_152320

और कई मोड़ उतरने, पसीने की बूंदों के माथे पर उभर आने जैसी ‘परीक्षा’ से गुजरने के बाद वो पहला दृश्य दिखा जिसके लिए अपने शहरी घर से यहां करीब पौने—चार सौ किलोमीटर का फासला तय करने के बाद पहुंची थी।

गांव में सोलर पैनल पहुंच गए हैं, सड़क भी गांव में पहुंचाने की तैयारी हो गई है … काश ये सब ज़रा पहले हो गया होता, तो उत्तराखंड के पहाड़ी ढलान आज सुनसान नहीं पड़े होते!

IMG_20140423_162206

और ये रहा वो ‘घर’ जिसके किस्से सुनते—सुनते बड़ी हुई हूं .. मां—पिताजी से सुना था कि दादाजी ने अपने रिटायरमेंट की पूरी निधि से एक बड़ा घर बनवाया है पहाड़ में, शायद पहाड़ छोड़कर जाना होगा ऐसा ख्याल भी उन्हें नहीं आया था तब तक!

IMG_20140423_153914

मैंने इससे पहले ऐसे ‘घर’ भूटान में देखे थे, वो राजसी निवास थे, और अब ठीक वैसी ही एक इमारत सामने थी, जिसे ‘अपना’ कह सकती थी, यादों के रस से सराबोर ..

IMG_20140423_154304

भीतर आने के लिए आमंत्रित करती सीढ़ियां .. और शहरी घरों से तुलना करनी ही पड़ी ..बंद दरवाजों, सीलबंद खिड़कियों, ढकी बाल​कनियों और उतने ही बंद दिलों—दिमागों वाले शहरी लोगों के शहरी घर, उफ्फ कैसी घुटन का अहसास कराते हैं वो घर। और एक ये है, खुली बांहों से जल्दी से अंदर आने को न्योत रहा घर …. मेरे दादाजी का घर!

IMG_20140423_154656

दादाजी की रूह उस रोज़ मैंने अपने आसपास महसूस की थी, वो ही जैसे मुझे दिखा रहे थे कि उनके घर के आंगन से हिमालय का कैसा नज़ारा दिखता है। मैं बहुत दिनों बाद इतरायी थी उस रोज़ ..

IMG_20140423_154034

शहरों की अजनबीयत मुझे बहुत परेशान करती है। और ये देखों यहां हर दूसरा आपका अपना होता है, इन आमा ने मिलते ही गले लगाया और मालूम कौन—सा तोहफा दिया, वो बुआ थीं मेरी … वाह, कितने अरसे बाद यह कहने—सुनने का सौभाग्य हाथ आया था!

 

IMG_20140423_155550

और ये दादी का मंदिर का आला ….

IMG_20140423_170737

ये रहीं दादी की कन्टेम्परेरी, एक और दादी! गांव में हर कोई आपका अपना होता है, न!

पिताजी की चाची हैं ये, नब्बे बरस पार कर चुकी हैं, उनकी यादों का बक्सा अब घरघराने लगा है, हां कोई पुराना तार छेड़ दे तो सारी परत फिर—फिर खुल जाती है। मेरा आना ऐसा ही एक वाकया था। वो फिर बीते दौर में पहुंच गई थीं, जहां पिताजी की धमाचौकड़ी थी, पेड़ों से आड़ू—गलगल तोड़ने की शरारतें थीं, और फिर गांव से एक—एक कर लोगों का निकलना था, ‘जल्द लौटूंगा’ जैसे झूठे वायदों का शोर था, कभी न लौटने का सूनापन था …

IMG_20140423_165639

कहते हैं घरों के भी अहसास होते हैं, वो भी इंतज़ार करते हैं .. जैसे ये सीढ़ियां मेरे उस घर की, पता नहीं कबसे यों ही इंतज़ार में हैं

IMG_20140423_162303

घर को अलविदा कहने की घड़ी थी, भारी मन से वो भी किया ..

PANO_20140423_154722

Photo credits – https://www.facebook.com/pixelatedPN

 

Advertisements

7 thoughts on “the homecoming!

  1. There are end number of such old houses and memories around today’s Non-Resident Uttarakhandis or Pravasis. But, the very fact of life and reality is that, we have a very few, who can describe in such a heart warming manner. Truly nostalgic and mesmerizing!! Each sentence looks like the title of one book. Imagine how many books can be created on these distinctive issues!

    Like

    • अरमान तो है कभी वहां बसूंगी, तब आप खास मेहमान होंगे। ऐसा कर पायी तो मान लूंगी कि अपने बुजुर्गों को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि दे सकी हूं

      Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s