Chhatisgarh – a treasure trove of rising travel destinations

छत्तीसगढ :जहां आत्मा पर ​छपा है संस्कृति का गोदना

छत्तीसगढ़ में हेरिटेज, इतिहास, संस्कृति, परंपरा, अध्यात्म, मिथक, वन्यजीवन, कुदरती नज़ारों से जब दिल भर जाए तो पश्चिम की ओर निकलना एक नए अनुभव को साकार करने जैसा होगा। यहां बैगा जनजाति अपने आराध्य भोरमदेव जो कि वास्तव में, शिव का ही जनजातीय स्वरूप हैं, को समर्पित भोरमदेव मंदिर में श्रद्धा से नतमस्तक दिखायी देगी। मंदिर की भीतरी और बाहरी दीवारों को देखकर आप ठगे रह जाएंगे। खजुराहो की याद सहज आ जाएगी और आपको महसूस होगा जैसे बुंदेलखंड में खड़े उन प्राचीन मंदिरों की परंपरा का विस्तार ही छत्तीसगढ़ के भोरमदेव मंदिर में हुआ है। भोरमदेव मंदिर का काल भी कमोबेश वही है जो खजुराहो के मंदिरों का है, और यहां-वहां थीम भी वही हैं। शैली भी वही, और तो और दोनों ही जगहों पर खड़े होकर कलाकृतियों को निहारने पर आपके ठिठके रह जाने का अंदाज़ भी वही होता है! कौन-सी प्रेरणा ने इस मंदिर को साकार किया होगा, आप सोचते रह जाएंगे।

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रतिमुद्राओं से सजी भोरमदेव मंदिर की दीवारों को काल ने अपने आगोश में लेने की अभी नहीं ठानी है, या फिर वक्त ने इसे कुछ इस तरह से सहेजा है कि आज करीब हजार साल बाद भी मंदिर प्रागंण में भक्तों की रेल-पेल बनी हुई है। हमने रात में बल्बों की रोशनी में नहाए भोरमदेव मंदिर में दर्शन किए और इसके पिछली ओर सजे मंच के सामने सीटों में धंस गए। अब अगले कई घंटे यहीं बीतेंगे, इसका अंदाजा तो था मगर यह इल्म नहीं था कि जब आधी रात भोरमदेव महोत्सव के संगीतय माहौल को अलविदा कहेंगे तो मन की मंजूरी साथ नहीं होगी! वड़ाली बंधुओं का सूफी गायन अपने शबाब पर था, झूमते रसिक श्रोताओं की कतारें दूर तक दिख रही थीं जो छत्तीसगढ़ी उत्सवधर्मी समाज की गवाह थीं।

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मगर लौटना था। रायपुर से करीब 130 किलोमीटर दूर कवर्धा में इस सांस्कृतिक उत्सव का आज पहला दिन था। कभी 1995 में महज़ एक दिन के सांस्कृतिक कार्यक्रम के तौर पर शुरू हुआ भोरमदेव महोत्सव बीते बरसों में लोकप्रियता के पायदानों को लांघता हुआ इस बार 3 दिन तक चलने वाला था। घड़ी की सुई ने आधी रात का वक्त बजाया तो अपने होटल से करीब-करीब 17 किलोमीटर दूर होने का ख्याल मुझे बेचैनी से भर गया। देश की राजधानी से इस सुदूर कस्बे में चली आयी हूं अपनी तमाम असहजताओं, असुरक्षा बोध और बेचैनियों को लेकर। लिहाजा, क्लासिकल संगीत की स्वर-लहरियों को लांघते-टापते हुए, भारी मन से लौट गई। तुझे तकया तो … एक पल में हजार हज हो गए, जो तेरा दीदार हो गया … तुझे तकया तो ..वड़ाली बंधुओं का सूफियाना कलाम देर तक दिमाग की दीवारों से टकराता रहा।

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अगले रोज़ फिर लौटने का वायदा कर वापस चली आयी हूं। फागुन की तेरस है और सड़क पर अगले एक-डेढ़ किलोमीटर तक चहल-पहल बनी हुई है, मेला भी रात को जैसे-तैसे थोड़ी-बहुत नींद लेने के लिए उठ गया है, अलबत्ता, गरमा—गरम जलेबियां अब भी कढ़ाहों में तैर रही हैं। स्थानीय आदिवासी युवकों का हूजूम मेले और उत्सव की रौनक में लिपटाहुआ टहलकदमी कर रहा है। शायद लौटने वाली मैं अकेली थी। टैक्सी ने भीड़-भाड़ को पार कर कुछ रफ्तार पकड़ी तो दृश्य तेजी से आंखों के आगे दौड़ने लगे – दोनों तरफ साल, बबूल, महुआ का जंगल है जो घना होता जा रहा है। सड़क पर दूर तक कोई नहीं है, मवेशी बाज़ार के सामने से गुजरते हुए उंघते गाय-बैल देखकर हंसी आ गयी। भोरमदेव महोत्सव से उन्हें कुछ लेना-देना नहीं था, अपने-अपने खूंटे से बंधे अगले दिन बाजार भरने पर अपने नए मालिक के साथ नई पनाह पाने की उम्मीद में रात के बचे-खुचे पल गिन रहे थे शायद।

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अगला मोड़ मुड़ते ही छत्तीसगढ़ टूरिज़्म का इको-रेसोर्ट ‘गोदना’ जैसे मेरी ही बाट जोह रहा था। गार्ड ने दौड़कर मेन गेट खोला, रिसेप्शन पर मैनेजर ने उनींदी आंखों से मुझे देखा और फिर भोजन करने का आग्रह करने लगा। अपने घर से दूर, रात की इस घड़ी ऐसा सुरक्षा बोध और ऐसा ख्याल … मैं खुद को छत्तीसगढ़ी आतिथ्य से सराबोर महसूस कर रही थी।

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