Chhattisgarh – celebration of art and Culture छत्तीसगढ़ – लीक से हटकर पर्यटन

बर्तोलिन ने एक दफा कहा था, जो सहज उपलब्ध है, वही बिकता है। शायद यही वजह रही होगी कि गोवा, मुंबई, राजस्थान जैसे ठौर—ठिकाने ट्रैवल जगत का हिस्सा कभी का बन चुके हैं जबकि सुदूर में सजी पूर्वोत्तर राज्यों की मणियां हों या लद्दाख का दुर्गम इलाका अथवा छत्तीसगढ़ जैसा ट्राइबल आबादी की पारंपरिक सुगंध से महकता राज्य, लंबे समय तक टूरिस्टी राडार से छिटका रहा है।

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लेकिन बीते वर्षों में एक अलग किस्म का पर्यटन अनुभव, रटी—रटायी लीक से कुछ अलग हटकर राह तलाशने की सैलानियों की जिद, अनदेखे—अनजाने अनुभवों को हासिल करने की ललक ने ट्रैवल समीकरणों को बदला है। छत्तीसगढ़ भी ऐसे ही अजब—गजब अनुभवों को साकार करने वाली टूरिस्टी मंजिल है जहां परंपरा, संस्कृति और मिथकों का घटाटोप हर तरफ दिख जाता है .. और सच पूछो तो यह जनजातीय बहुल राज्य नए दौर में नए आयाम तलाशने वाले किसी आधुनिक ह्वेन सांग की ही बाट जोह रहा है!

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Young tribal tattooed mother out for shopping in Haat bazaar

छत्तीसगढ़ के ट्राइबल समाज ने बरसों से, पीढ़ी—दर—पीढ़ी शेष दुनिया से कटकर जीवन बिताया है और आज भी राज्य का एक बड़ा जनजातीय समाज अपने सांस्कृतिक खोलमें ही सिमटा हुआ है। मज़े की बात है कि किसी भी दिशा में निकलने पर इस ट्राइबल समाज की झलक मिल ही जाती है।

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tribal lass in weekly Haat near Pachrahi, Dist Kabirdham, Chhattisgarh

 

पचराही से लौटते हुए हाट बाज़ार की रौनक की अनदेखी करने का साहस मुझमें नहीं हुआ और करीब चालीस डिग्री सेल्सियस तापमान में तपती उस दोपहरी में मैं अपनी एयरकंडीशन्ड टै​क्सी से झटपट बाहर निकल आयी। गोदना गुदवाए आदिवासी औरतों की झलक पाने को बेताब मेरे पैर तेजी से हाट में सजी दुकानों की तरफ बढ़ रहे थे।

 

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कैमरे पर जिस फुर्ती से मेरी उंगलियां दब रही थीं उसी तेजी से उन शर्मीली युवतियों के तन—बदन सिमट रहे थे। कुछ तो लगभग भाग ही गई थीं। कमोबेश हर पीठ पर शिशु बंधा था, हर बदन गोदना गुदवाए सजा था, चटख रंगों की पोशाक में सिमटी औरतें शर्मीली जरूर थीं, लेकिन आत्मविश्वास से लबरेज़ उनकी काया समाज में उनकी बराबरी का बयान थी।

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मैं देखकर हैरान थी कि हर औरत, किशोरी, वृद्धा अकेले ही हाट बाजारी के लिए आयी थी। महुआ, तेल, कंघी, प्लास्टिक रस्सियां, गुड़, साग—सब्जी की खरीदारी में जुटे बैगा जनजाति के स्त्री-पुरुष धीरे-धीरे मेरी मौजूदगी से सहज होने लगे थे। कुछ तो बाकायदा पोज़ भी देने लगे थे।

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भाषायी दीवार भले ही थी, लेकिन नज़रों ही नज़रों में हो रहे संवाद और मुस्कराहटों ने एक सेतु भी बनाना शुरू कर दिया था। अब मुझे उनकी बोली समझने की ज़रा भी जरूरत महसूस नहीं हो रही थी, मौन का भी तो एक संवाद होता है, न!

 

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