Ranthambore – Where the Wild Cats Are

टाइगर सफारी का रोमांचकारी फलसफा बुनता है रणथंभोर पार्क

रणथंभोर पूर्वी राजस्थान में अरावली पर्वतमाला और विंध्य के पठार के जोड़ पर खड़े ’द्वीप‘ की तरह है जिसमें सुनहरी घास के मैदान और कीकर, बबूल, खैर, इमली के पेड़ों की विरल वनस्पति कई जंगली जीव-जंतुओं की शरणस्थली है। करीब 1334 वर्ग किलोमीटर में फैला यह अभयारण्य रॉयल बंगाल टाइगर की पनाहगाह होने की वजह से बीते वर्षों में वन्यजीव प्रेमियों और सैलानियों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया है लेकिन अब यह तय कर पाना थोड़ा मुश्किल है कि इस लोकप्रियता ने टूरिज़्म को फायदा दिलाया या वन्य जन-जीवन को आहत किया है। बाघों को देखने, कैमरों-वीडियो में इस शही जीव को कैद करने और फिर लौटकर ’टाइगर साइटिंग‘ के अनुभवों को किसी उपलब्धि की तरह बघारने वाले वाइल्डलाइफ शौकीनों के काफिले अब सवाई माधोपुर जैसे सुस्त-शांत से कस्बे की रौनक बन चुके हैं।

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अलस्सुबह जब यह शहर मिचमिचाती आंखों से अंगड़ाई ले रहा होता है तो उसकी सड़कों पर कैंटर और जीपों के कारवां फर्राटा भरने लगते हैं। नवंबर से फरवरी तक के सर्दीले महीनों में तो जैसे यहां बाघ प्रेमियों का मेला-सा लगा होता है। अकबर, हमीर, बाबर, चंगेज़, कुबलाई, पद्मिनी, लक्ष्मी, टी16, टी17 जैसे अनगिनत नाम कोने-कोने से कानों में घुसने लगते हैं। कस्बे में दिखने वाला हर देसी-विदेशी सैलानी जैसे सिर्फ और सिर्फ बाघ प्रेमी होता है। उसके पास डिस्कवरी पर देखी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के कई नायक-नायिकाओं के नाम होते हैं जिन्हें वह जब-तब उछालता रहता है और आप या तो उन्हें अवाक देखते रह जाते हैं या थोड़ी देर में खुद भी उनके जैसे ही जुमलों को वापस उछालने लगते हैं।

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Safari Booking Office @Sawai Madhopur

रणथंभोर में टाइगर सफारी के लिए कैंटर कमोबेश आसानी से मिल जाते हैं लेकिन करीब 24 सवारी वाला यह वाहन बाघ के दिखाई देने की संभावना को उतना ही कम भी करता है। गपियाते, शोर मचाते टूरिस्टों से आप वाकई चिढ़ सकते हैं और उस पर ड्राइवर और गाइड की बेरूखी भी सफारी का मज़ा किरकिरा कर सकती है। इसका इलाज है सफारी के लिए जीप को चुनना जिसमें एक वक्त में सिर्फ पांच सवार ही बैठ सकते हैं। लेकिन जीप का मिलना आसान नहीं होता। अच्छा होगा आप हमारी तरह ’स्पॉन्टेनियस‘ टूरिस्ट बनने की बजाय पहले से होमवर्क करके जाएं, राजस्थान सरकार की साइट rajasthanwildlife.in पर अममून साठ दिन पहले बुकिंग करवा लें।

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रणथंभोर पार्क को कुल दस ज़ोन में बांटा गया है, दसवां ज़ोन हाल फिलहाल जनवरी 2014 में ही खोला गया है ताकि यहां पर्यटकों का दबाव कुछ कम किया जा सके। यों ज्यादा लोकप्रिय 1 से 5 तक के ज़ोन हैं जो कोर एरिया में हैं और बाघों के दिखने की सबसे ज्यादा संभावना भी यहीं होती है। लेकिन बाघ को इस बंटवारे से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, न ही वो ऐसी सीमाओं को तरजीह देता है। उसके लिए कोर एरिया और बफर एरिया कोई खास मायने नहीं रखता। मगर, आम टूरिस्ट तो पर्यटन की रटी-रटाए लीक पर ही गुजरना चाहता है, लिहाजा ज़ोन 1 से 5 की मांग ज्यादा रहती है।

ज़ोन 6 हमें मिला और हम उत्साही जीव अगली सुबह 7 बजे की सफारी के लिए 6 बजे ही अपने होटल से बाहर निकल आए थे। यहीं हमें लेने कैंटर पहुंचने वाला था। एक तो सर्दी और ऊपर से खुले कैंटर में ढाई-तीन घंटे जंगल में घूमने का प्रोग्राम था, ऐसे में हम सभी मोटी जैकेटों और टोपियों में लिपटे-ढके होने के बावजूद ठिठुर रहे थे। और उस ठंडायी सुबह ने एक बार फिर ठंड से बचती-बचाती, गुफा में जा छिपी मछली की याद दिला दी!

मेरे घुमक्कड़ जीवन की पहली टाइगर सफारी का वक्त हो गया था। हमारे साथी टूरिस्टों में से कई तो पिछले कई दिनों से यहां डेरा डाले हुए थे और यह उनकी दूसरी-तीसरी सफारी थी। बाघ देखने का ऐसा जज़्बा, ऐसी मौहब्बत, ऐसी लगन … मैंने कल्पना नहीं की थी इस दीवानगी की लेकिन अब साक्षात देख रही थी। कैंटर के पहुंचते ही सफारी का इंतज़ार पूरा हुआ। हमें एक गाइड की सेवाएं ’मुफ्त‘ मिली थी, जो कैंटर के किराए में शामिल था, और उसी के किस्से सुनते-सुनाते हम कब ऊंची-ऊंची सूखी सुनहरी घास के मैदान में पहुंच चुके थे, पता ही नहीं चला। इस पार्क में हरियाली का नामो-निशान नहीं था, ऐसे में बाघ कहां घूमता होगा, कहां छिपता होगा!

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मगर जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गए, जंगल घना होने लगा था। अब पार्क की रंगत भी बदल रही थी, और तभी कुछ ही दूर घास में सरसराहट हुई तो वहां से गुजरता नीलगायों का एक हुजूम दिखायी दिया। हमारी नज़रें दो-चार होने की देर थी, ऊंची-लंबी कद-काठी की नीलगाय वहां से रफूचक्कर हो गईं। लेकिन अब तो जैसे पार्क ने अपने मोहरे फेंकने शुरू कर दिए थे। एक तरफ से चिंकारा की काया गुजरी तो सामने ही कुलांचे भरते हिरनों की धमाचैकड़ी अब तक कुछ निराश हो चले टूरिस्टों की आंखों में चमक भरने के लिए काफी थी। कुछ रंग-बिरंगी पंछियों की उड़ान भी आसमान में रंग भर रही थी।

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जंगल अब अपना पूरा समां बांध चुका था। पगडंडियां संकरी हो चली थीं, हवा की सांय-सांय कानों में घुसकर कोलाहल मचाते-मचाते अब ‘ाायद उकता गई थी और अपनी चिंघाड़ को उसने हल्का कर दिया था। अलबत्ता, हवा के थपेड़ों ने अब तक हमारे होंठों पर एक पपड़ी जमा दी थी और ठंड से तमाम चेहरे सफेद पड़ चुके थे। भूखे पेट सफारी पर निकले बदन कुछ थकान से घिर आए थे, मगर बाघ का दीदार अभी बाकी था।

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इस बीच, सफारी का समय भी लगभग पूरा होने को आया था। उम्मीद की लकीर हरेक के दिल में बाकी थी। जैसे क्रिकेट के मैदान में आखिरी गेंद फेंके जाने तक बाजी उलटने का रोमांच बना रहता है ठीक उसी तरह उस रोज़ उस कैंटर में सवार हरेक के मन का कोई कोना अचानक किसी कोने से नारंगी-काली धारियों से लिपटी काया के दिख जाने की उम्मीद पाले बैठा था। लेकिन जंगल में टाइगर सफारी का मतलब टाइगर का गारंटीशुदा दीदार नहीं होता, वो मस्त-मौला, मतवाला जीव कब किस ओर निकल जाए, इसका कोई ठीक-ठाक गणित भी नहीं होता। हां, उसे देखने के लिए आपके पास धैर्य जरूर होना चाहिए, यह सबक लेकर हमने रणथंभोर टाइगर पार्क को अलविदा कहा और अगली बार, कहीं किसी और मोड़ पर रॉयल बंगाल टाइगर से मुलाकात का वायदा मन ही मन दोहरा लिया।

 

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