Dholavira – Harappan heritage in Gujarat धौलावीरा में सुनें बीते युग की आहट

समंदर का कलरव और रेगिस्तान का मौन हमें अपने आपसे मिलवाता है और इसी अहसास को साक्षात् अनुभव करने के लिए गुजरात के रन में चले आइये। कच्छ के रन में सुदूर क्षितिज तक फैली नमकीन सफेदी के बीच उग आए बेट (रेतीली जमीन पर टीलेनुमा ऊंचे इलाके) अतीत में अगर सभ्यता के पालने रहे थे तो आज उसी सभ्यता के अवशेषों को अपने गर्भ में छिपाए-संजोए खड़े हैं। खादिर बेट में कच्छ की सभ्यता के बीज छिपे होंगे यह अब से कुछ दशक पहले किसी को मालूम नहीं था। बीसवीं सदी के शुरू में हड़प्पा-मोहनजोदड़ो ने जब अपनी बस्तियों को उघाड़ा तो भारत के उस दावे को पुष्ट किया था जिसके दम पर वह खुद को प्राचीनतम सभ्यता-संस्कृति वाला महान देश बताता आया था। और इतिहास के जर्द पन्नों ने जिस हड़प्पा सभ्यता को बरसों संभाले रखा था वे तेजी से उलटने-पलटने लगे। लेकिन इसके बाद करीब आधी सदी तक हड़प्पाकालीन ठिकानों पर मौन पसरा रहा। बंटवारे के बाद हमने अपनी इस ऐतिहासिक धरोहर को पाकिस्तान को सौंप दिया। इस बीच, साठ के दशक में देश के पश्चिम में हमारी सीमाओं के भीतर भी जैसे ज़मीन ने विरासत को उगलने का दौर शुरू किया। गुजरात में धौलावीरा और लोथल की शक्ल में करीब तीन-चार हजार बरस पुरानी बस्तियों ने करवट ली और एक बार फिर सिंधु घाटी की सभ्यता के अंश उभर आए। यों धौलावीरा में विधिवत खुदाई नब्बे के दशक में चालू हुई और लगभग बीस बरस जारी रही।

134

इतिहास और बीते दौर में दिलचस्पी रखने वालों के लिए कच्छ के रन में धौलावीरा की बस्ती आज एक अहम् मुकाम बन चुकी है। कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में भुज से लगभग 250 किलोमीटर दूर इस हड़प्पाकालीन बस्ती की ढहती दीवारों से पीठ टिकाकर खड़े होने का अहसास जुदा है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में मिले बीते कालखंडों के अवशेषों की ही तरह यह प्राचीन बस्ती भी एक टीले पर खड़ी है। पुराने दुर्ग की जर्जर दीवारें, सीढ़ियां, पानी के कुंड, नालियों से निकासी का इंतजाम और पश्चिम में दूर हरहराता रन का विस्तार जैसे किसी पुरानी एलबम के सिलसिलेवार पन्नों की तरह खुलता है। और हड़प्पाकालीन इस दुर्ग की दीवारों के गिर्द सिर्फ हवा की सांय-सांय सुनाई देती है या मौन का अट्टहास। बहुत मुमकिन है कि जब आप यहां इतिहास से गुफ्तगू करने पहुंचते हैं तो आपके सिवाय सिर्फ आपका साया साथ होता है।

यों तो कच्छ का रन ही अपने आप में किसी वीराने से कम नहीं लेकिन धौलावीरा तक पहुंचते-पहुंचते खामोशी और भी शिद्दत से महसूसी जा सकती है।

119 (2)
गुजरात पर्यटन ने यहां की चुप्पी को कुछ तोड़ने की पहल करते हुए एक छोटा-सा, मामूली ठौर ’’तोरण‘‘ के नाम से बसाया है। इस सुदूरवर्ती रेसोर्ट में ठहरने के लिए एडवांस बुकिंग करा लें क्योंकि यह इलाका सभ्यता से इतना कटा हुआ है कि आसपास सिवाय इको-टूरिज़्म की आठ-दस रिहाइशी यूनिटों के अलावा यात्रियों के लिए रुकने का और कोई ठिकाना नहीं है। हमारे प्रवास के दौरान, सर्द रातों में साफ आसमान पर बिखरे ग्रह-नक्षत्रों की चाल देखने के लिए यहां मुंबई से स्कूली बच्चों का एक हुजूम भी उतरा, लिहाजा, तोरण के अमूमन खामोश रहने वाले गलियारों में रौनक है। रेसोर्ट एकदम बुनियादी सुविधाएं ही मुहैया कराता है, इसलिए ज्यादा अपेक्षाएं लेकर इस ओर न आएं। और जहां से, जिस भी दिशा से आएं अपने वाहन का टैंक जरूर भरवा लें क्योंकि इस 3500-4000 साल पुरानी बस्ती तक बेशक, तराशी हुई सड़क तो पहुंच गई है लेकिन आसपास न तो ज्यादा आबादी है और न ही इतने सुदूर बियाबान तक बहुत लोग पहुंचते हैं, सो आखिरी पेट्रोल पंप धौलावीरा से करीब साठ किलोमीटर पीछे छूट जाता है।

धौलावीरा में बीत चुके पलों की आहट सुनने के लिए हमने एक लोकल गाइड को साथ ले लिया। हमारे गाइड रावजीभाय इसी पुरातत्वीय साइट पर चली खुदाई के काम से लंबे समय तक जुड़ा रहे थे और जब 2005 में पैसों की कमी के चलते खुदाई रोक दी गई तो वह पार्ट टाइम गाइड के रोल में आ गए। अपने हाथों से, महीन ब्रशों से, ज़र्रा-ज़र्रा परतों को उघाड़ने का रोमांच उनकी आंखों में आज भी बसा है। या शायद रोमांच से ज्यादा एक गर्वबोध है कि उनके गांव धौलावीरा ने दुनिया की प्राचीनतम और आधुनिकतम सभ्यता के अवशेषों को आज तक संभाला हुआ है।

करीब 100 एकड़ में फैली है धौलावीरा की प्राचीन नगरी और इसमें एक गढ़/कोट की दोहरी दीवारें, कुछ जलाशय और बांध, ऊंची ज़मीन पर समाज के उच्च तबके की बस्ती, निचले इलाके में कामगारों की बस्ती और इन सबकी हद से बाहर एक बड़े इलाके में फैला कब्रिस्तान भी मिला है। पुरातत्व विभाग को खुदाई के दौरान यहां उस युग के बर्तन-भांडे, माप-तौल की इकाइयां और बाट, आभूषणों से छिटके मोती-नग से लेकर सिंधु लिपि के वो चित्राक्षर भी मिले हैं जिन्हें आज तक पढ़ा नहीं जा सका है। कहते हैं करीब दस अक्षरों वाली यह पट्टी दुनिया का पहला साइनबोर्ड है। धौलावीरा ने ऐतिहासिक गलियारों में कुछ बाद में दस्तक दी वरना हड़प्पा सभ्यता संभवतः ’कच्छी सभ्यता‘ के नाम से जानी जाती।

धौलावीरा के खंडहरों में इतिहासकारों ने सात अलग-अलग सांस्कृतिक युगों की पहचान की है। यानी, यह इलाका प्राचीनकाल में सात बार सजा-बसा और हर काल वक्त की माटी के तले दबता चला गया। ये युग करीब साढ़े तीन हजार से लेकर सत्रह सौ ईसा पूर्व तक बसते-उजड़ते रहे। कुछ रन की रेत के नीचे संभला रहा तो बहुत कुछ नदियों के बदलते मार्गों की भेंट भी चढ़ता रहा। सिंधु नदी, जो कभी कच्छ के लखपत बंदरगाह के नज़दीक से होकर गुजरती थी, 1819 में भुज में आए भूकंप के बाद राह बदलकर कराची की तरफ मुड़ गई। इतिहासकार तो लुप्त सरस्वती के चिह्न भी रन की परतों के नीचे खोज रहे हैं। क्या मालूम, इन नदियों के मुंह मोड़ने की वजह से ही हड़प्पा सभ्यता नष्ट हुई हो!

दक्षिण एशिया में ‘ाहरीकरण के सजने और उजड़ने के ऐतिहासिक दस्तावेजों को धौलावीरा के इन भग्नावशेषों ने खूबसूरती से संभाला हुआ है। यों पिछले सात-आठ साल से यहां पुरातत्व विभाग ने खुदाई बंद कर रखी है लेकिन जो कुछ खुदा, उभरा और सामने आया वो इतिहास के छात्रों से लेकर पुरातन में दिलचस्पी रखने वालों के लिए किसी अद्भुत खजाने से कम नहीं है।

धौलावीरा के खंडहरों में पानी के भंडारण की लाजवाब व्यवस्था देखकर आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे। इस रेगिस्तान में उस ज़माने में जल-कुंडों का इंतजाम और बरसाती पानी के संग्रहण की तमाम संभावनाओं को धौलावीरा में साकार होते हुए देखा जा सकता है। आज के दौर में अगर सभ्यता के उन्नत होने की निशानी इंटरनेट-मोबाइल टैक्नोलॉजी है तो हड़प्पाकाल में जलाशयों का पुख्ता इंतज़ाम संभवतः सभ्यता के चरम विकास पर पहुंच जाने की निशानी रहा होगा। रावजीभाय ने हमें धौलावीरा में पानी की निकासी के लिए ढकी नालियों, वक़्त की मिट्टी से पटी पड़ी खाइयों, कुछ उज़ड़े ठिकानों को दिखाते हुए इस बस्ती के कई बार उजड़ने, और कई बार बसने की कहानी को बताने की बजाय दिखाया। जी हां, यहां की दीवारें भले ही रेगिस्तान में उबलते तापमान से दरकती-चटकती आयी हैं, तो भी कच्छ के रन ने बहुत कुछ बाकी रख छोड़ा है।

बस्ती की दीवारों-खाइयों को लांघकर थोड़ा पश्चिम की ओर निकल जाएं तो रन की नीली-सफेदी का सम्मोहक संसार सामने पसरा दिखता है। रन में झिलमिलाते उस नमकीन पानी से पहले एक विशाल कब्रिस्तान भी है। इतिहास की लकीरें यहां पुराने युग की कहानी को ऐसे बयान करती हैं जैसे कल ही की बात थी जब हड़प्पा सभ्यता यहां हुंकार भरा करती थी।

धौलावीरा संग्रहालय

पुरातत्व विभाग ने धौलावीरा की खुदाई के दौरान मिली वस्तुओं को सहेजने के लिए एक स्थानीय संग्रहालय खोला है। प्राचीन बस्तियों में जीवन कैसा रहा होगा, इसकी झलक यहां देखी जा सकती है। मिट्टी के भांडे, पत्थरों के बाट, पशुओं की आकृतियां, गहनों की कुछ टूटी-छिटकी लड़ियां और ओखली-मर्तबान इस म्युज़ियम में संभले हैं। अपने अतीत के उन हिस्सों को देखना भावुक करता है। सदियों पूर्व हमारे पुरखे क्या करते रहे होंगे, कैसे वक्त बिताया करते थे, उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी कैसे बसर होती थी, इसका ब्योरा इन पुरातात्विक अंशों को देखकर मिलता है।

123

स्थानीय बाशिंदों को शिकायत है कि उनके पुरखों की इस बस्ती की कीमती और महत्वपूर्ण विरासत को दिल्लीवालों ने हथिया लिया है, लेकिन सच्चाई यह है कि नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय की हड़प्पा दीर्घा में वे तमाम सुरक्षित हैं। अब पसंद आपकी है कि अपने गौरवशाली अतीत से संवाद करने के लिए आप धौलावीरा के खंडहरों में वक्त बिताएंगे या नेशनल म्युज़ियम की हड़प्पा गैलरी में।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s