Siamese towns sitting cosily in the far end of the North East region

मोरेह (http://en.wikipedia.org/wiki/Moreh,_India) से तामू 

इम्‍फाल से गुजरते हुए कुछ ठहरे-ठहरे लम्‍हों को अपनी यादों में कैद कर लेने के बाद हमने करीब 100 किलोमीटर दूर मोरे की खाक छानने का मन बनाया। इम्‍फाल से एनएच 39 पर पालेन तक करीब पहले एक घंटे का सफर इम्‍फाल घाटी की सीधी-सपाट सड़क पर से होकर गुजरता है, नज़ारों को आंखों में बंद कर लेने की कवायद फि‍जूल है क्‍योंकि अभी अगले करीब तीन घंटे तक एक से बढ़कर एक दृश्‍यों की कतार आपके इंतज़ार में है।

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घाटी के दोनों तरफ अभी धान की हरियाली टिकी है, आसमान में बादल हैं कि तरह-तरह की बतरस में उलझना-उलझाना चाहते हैं और एक यह पागल मन है जो आकाश में उड़ते-तिरते कपासी गुच्‍छों को देखकर बदहवास हुआ जाता है …..

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भारत से बर्मा और उससे आगे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की सरहदों को सड़क मार्ग से पार करने का ख्‍वाब इस बेकाबू मन ने पिरो लिया है। आज उसी की पहली कड़ी पर दौड़ पड़ा है।

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मोरे की हद पार कर हम बर्मा की गलियों में घुस गए हैं, फ्रैंडशिप ब्रिज के उस पार बसे बर्मा की फि‍तरत बदली-बदली सी है, हवाओं में नमी है, बारिश बस अभी होकर गुजरी है यहां से। कुछ आगे बढ़ने पर तामू की दुकानों से घिर गए हैं हम। शॉपिंग का इरादा तो नहीं था लेकिन बांस की बनी टोकरियों, टोपियों और पता नहीं किस-किसने मन पर जैसे डोरे डाल दिए हैं। छोटी-बड़ी यही कोई चार-पांच टोकरियां और एक अदद हिप्‍पीनुमा हैट अब मेरी हो चुकी है। 

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नुक्‍कड़ वाली पान की दुकान पर खूबसूरत मुस्‍कुराहटों की ओट में एक बर्मी युवती पान बनाने में मशगूल है, यों उसके कत्‍थई रंग में रंगे दांतों को देखकर लगता नहीं कि वो कुछ बेच भी पाती होगी !

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अपनी ही धुन में खोया-खोया सा दिखा तामू। हालांकि बाजार नरम था, खरीदारों की चहल-पहल शुरू नहीं हुई थी, सो हमने एक-एक दुकान पर खरीदारी कम और गपशप ज्‍यादा की और वो भी एक ऐसी जुबान में जो शब्‍दविहीन थी। इशारा भी कुछ “इवॉल्‍व्‍ड” भाषा लगी क्‍योंकि हमारा सारा कारोबार सिर्फ मुस्‍कुराहटों के सहारे बढ़ा था।

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अमूमन अक्‍टूबर तक बारिश लौट जाती है अपने देश लेकिन इस बार महीने के अंत तक अटककर रह गई थी। सोया-खोया सा, कुछ गीला-गीला-सा यह बर्मी कस्‍बा दिन के दो बजे भी ऊंघ रहा था।

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नज़दीक ही पैगोडा है, वहां भी मुस्‍कुराहटों का खेल जारी था।

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इस बीच, घड़ी ने तकाज़ा सुनाया है। हम रुकने के इरादे से नहीं आए थे तामू, वापस इम्‍फाल लौटना है आज ही, यानी करीब तीन-साढ़े तीन घंटे का वापसी सफर करना है। पूर्वोत्‍तर में दोपहरी में दो-ढाई बजते ही सूरज बाबा लौटने की तैयारी करने लगते हैं, चार बजते-बजते तो शाम एकदम गहरा जाती है और पांच बजे तक अंधेरा पूरी कनात टांग देता है। हमारे सामने पूरब के इस सूरज की आखिरी रोशनी के सिमटने से पहले पहाड़ी रास्‍तों को पार कर लेने की चुनौती है। एक बार फि‍र फ्रैंडशिप ब्रिज को पार कर मणिपुर के चांदेल जिले में लौट आए हैं। सीमा पर वाहनों का एक पूरा कारवां खड़ा है, जांच की रस्‍मो-अदायगी है, असम राइफल्‍स के जवान हैं जो एक-एक वाहनों की पड़ताल कर रहे हैं। उधर, सूरज की किरणों का कोण तेजी से नीचे झुकता जा रहा है, मन कुछ सहमा है कि कहीं अंधेरा घिरने से पहले चांदेल की हद से गुजरकर पालेल तक नहीं पहुंचे तो ? अंधेरे, सड़क और दौड़ते वाहनों का गणित कभी-कभी दिनभर की घुमक्‍कड़ी को बड़े ही खुरदुरे धरातल पर ला पटकता है, कहीं आज ऐसा ही तो नहीं हो रहा ?

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