Kashmir Railway – whistling beyond Pir Panjal !

कश्‍मीर घाटी में  दिलों की दूरियों को पाटती रिश्‍तों की रेल 

जम्‍मू डिवीज़न में बनिहाल की उलफत और बारामूला के मलिक शाहनावाज़ के बीच रिश्‍ते का एक सिरा डोगरा महाराजा प्रताप सिंह से जुड़ा है। है न हैरत की बात कि महाराजा प्रताप सिंह ने जम्‍मू से श्रीनगर तक रेल लाइन बिछाने का जो ख्‍वाब 1889 में बुना था उसकी तामील भले ही यही कोई सवा सौ साल बाद जाकर हुई लेकिन आज दूरियों के कई दरियाओं पर यह रिश्‍तों के नायाब पुल बांध रही है। और उलफत की शाहनवाबज़ से सगाई का पैगाम भी इसी जम्‍मू-उधमपुर-कटरा-काज़ीगुंड-बारामुला रेल संपर्क के सहारे अपनी मंजि़ल पर पहुंचा। वरना कहां उत्‍तरी कश्‍मीर में सोपोर और कहां पीर पंजाल के उस पार बसा बनिहाल ! कश्‍मीर वादी में आमतौर पर रिश्‍तों की बात चलती है तो दूर-दराज के इलाकों के पैगाम सबसे पहले दरकिनार किए जाते रहे हैं। लेकिन अब इस रेल लाइन की पटरियां सिर्फ दूरियां नहीं नापतीं बल्कि शादी-ब्‍याह जैसे रिश्‍तों को सहेजने का काम भी कर रही हैं।

हालांकि आज भी कश्‍मीर रेल किसी टापू की तरह है जिसका कोई सिरा देश की किसी दूसरी रेल लाइन से नहीं जुड़ता लेकिन यह घाटी को जम्‍मू यानी शेष देश से पूरे सालभर जोड़ने का पैगाम जरूर देती है। यह भी अजब इत्‍तफाक है कि कभी डोगरा महाराजा ने इस संपर्क को साकार करने का सपना देखा तो 1902 में अंग्रेज़ों ने भी कश्‍मीर घाटी को रावलपिंडी से झेलम के किनारे-किनारे रेलवे लाइन के सहारे जोड़ना चाहा। लेकिन 1983 में इंदिरा गांधी ने इतिहास के गर्त में खो चुकी इस परियोजना को न सिर्फ पुनर्जीवित किया बल्कि इसके लिए 50 करोड़ रु का बजट और एक निश्चित समय-सीमा भी तय की।Image

खर्रामा-खर्रामा पटरियां जुड़ती गईं और टुकड़ों-टुकड़ों में शहर-दर-शहर एक-दूसरे के नज़दीक आते रहे। 2005 में जम्‍मू से उधमपुर के बीच 53 किलोमीटर लंबी पटरियों पर पहली बार रेल दौड़ी जिसमें करीब 10 किलोमीटर लंबी सुरंगें और 36 बड़े तथा 122 छोटे पुलों का जाल बिछाया गया था। और फिर 2008 में इस रेल लिंक के पहले चरण में श्रीनगर के दक्षिण-पूर्व में अनंतनाग और मध्‍य कश्‍मीर के बडगाम जिले के बीच 68 किलोमीटर लंबा रेल संपर्क कायम हुआ। और तब तक इस परियोजना की लागत भी कई गुना बढ़ चुकी थी ! 2009 में अनंतनाग और काज़ीगुंड के बीच 18 किलोमीटर रेल लिंक तैयार हो गया और इस साल जून में काज़ीगुंड-बनिहाल के बीच 17.68 किलोमीटर लंबा रेल लिंक भी चालू हो गया है जो किसी इंजीनियरिंग चमत्‍कार से कम नहीं था। कश्‍मीर घाटी से पहली बार कोई रेल पीर पंजाल की दुर्गम पहाड़ि‍यों को चीरकर जम्‍मू क्षेत्र में पहुंची थी। और इन दोनों हिस्‍सों को जोड़ा था टी-80 यानी पीर पंजाल सुरंग ने।

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कश्‍मीर घाटी में दौड़ रही ऐतिहासिक रेलगाड़ी आज सिर्फ रेल-संपर्क नहीं है बल्कि यह कश्‍मीर को देश के बाकी हिस्‍सों से जोड़ने का पैगाम भी है। बारामूला से करीब 50 किलोमीटर दूर श्रीनगर के नौगांव स्‍टेशन को हमने इस रेल सफर की अपनी पहली मंजिल के तौर पर चुना था। स्‍टेशन की भव्‍यता देखकर आप राजधानी के पुरानी दिल्‍ली स्‍टेशन की चिल्‍ल-पौं और गंदगी के आलम से इसकी तुलना करने का मोह संवरण नहीं कर पाएंगे। कश्‍मीरी काष्‍ठकला की चमक-दमक से लैस स्‍टेशन की विशाल इमारत दूर से ही प्रभावित करती है। स्‍टेशन को जोड़ने वाली सड़क पर सेना की कड़ी निगरानी और फिर पुलिस की पैनी निगाहों से आसपास का चप्‍पा-चप्‍पा महफूज़ जान पड़ता है। गेट पर फ्रिस्किंग और एक्‍स-रे मशीन से सामान की तलाशी भरोसा दिलाती है कि आप सुरक्षित हैं। तभी एक कोने से लाउडस्‍पीकर पर सूचना सुनाई देती है कि कुछ ही देर में ट्रेन प्‍लेटफार्म पर पहुंच रही है। टिकट काउंटर पर यात्रियों की लाइनों में थोड़ी बेचैनियां बढ़ गई हैं, लेकिन चुस्‍त क्‍लर्क ने झटपट यात्रियों को टिकट थमा दिए हैं। हमने भी बनिहाल तक 20 रु का टिकट कटा लिया है और प्‍लेटफार्म की राह पकड़ ली। दूर तक पटरियों और प्‍लेटफार्म पर सरपट निगाह दौड़ायी तो वहां की साफ-सफाई देखकर लंदन के स्‍टेशनों की बरबस याद हो आयी। मन में सवाल कौंधा कि 2008 से जिस स्‍टेशन पर गाड़ि‍यों और यात्रियों का सिलसिला जारी है वो इतना साफ कैसे हो सकता है, खासतौर पर तब जबकि वो हिंदुस्‍तान का हिस्‍सा है ! बहरहाल, कुछ ही देर में हम एक खूबसूरत ट्रेन के डिब्‍बे में सवार हो चुके थे।

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नौगांव से ठुमक-ठुमककर निकली रेल ने अभी रफ्तार पकड़ी ही थी कि करीब दस मिनट में अगला स्‍टेशन – पाम्‍पोर आ गया। स्‍टेशन पर भीड़ अपेक्षाकृत काफी कम थी और मुश्किल से मिनट भर रुकने के बाद गाड़ी ने अब अगली मंजिल के लिए एक बार फिर गति पकड़ ली थी। बड़े-बड़े आकार की खिड़कियों के बाहर हैरत भरी निगाहों से देखने के उस सिलसिले में हम शायद पलक झपकना भी बार-बार भूल रहे थे।

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केसर की क्‍यारियों के लिए विख्‍यात पाम्‍पोर में रेल की पटरियों के दोनों तरफ खेत थे जिनमें केसर की बुवाई की तैयारी चल रही थी, उफ्फ ..  केसर के बैंगनी फूलों की छटा नवंबर के बाद ही दिखायी देती है और हम ऐसे वक्‍त में घाटी में आए थे जब मौसम धीमे-धीमे करवट ले रहा था। शरद ऋतु के शुरूआती चिह्न खेतों में दिखने लगे थे जो हरियाली को समेटकर सुनहरे होने की बेताबी अब छिपा नहीं पा रहे थे। कुछ ही देर में काकपोरा स्‍टेशन को पार करते हुए रेलगाड़ी कश्‍मीर के ऐतिहासिक शहर अवन्‍तीपुरा स्‍टेशन पर जा लगी। यह वही अवन्‍तीपुरा है जिसे 9वीं शताब्‍दी में राजा अवन्‍ती वर्मन ने बसाया था और जहां आज भी उस जमाने के मंदिरों के भग्‍नावशेष मौजूद हैं। कुछ यात्री यहां उतरे मगर यह कहना मुश्किल है कि वो इतिहास की सुध लेने के लिए यहां आए या फिर कोई और वजह उन्‍हें यहां खींच लायी है। हम कब और कैसे राजा अवन्‍ती वर्मन के बनवाए विष्‍णु मंदिर और अवंतीस्‍वामी मंदिर को देखेंगे इसी सोच में खोए रह गए कि ट्रेन अपनी अगली मंजिल यानी पंजगोम की तरफ बढ़ चली। हमने साथ बैठे एक दंपत्ति से पंजगोम का तर्जुमा जानना चाहा तो चहककर उस कश्मीरी युवक ने बताया कि पंजगोम यानी पांच गांवों से बना हुआ ठौर। शुरूआती संकोच का झीना परदा अब हमारे और हमारे सहयात्री के बीच से उठ चुका था, आगे के सफर के लिए वही हमारे नि:शुल्‍क गाइड भी बन चुके हैं। इस बीच, इंजन की दहाड़ कई बार सुन चुकी है, पटरी सपाट सड़क की बजाय जाने कितने ही छोटे-मोटे नदी-नालों को पार करती हुई गुजर गई है। दोनों तरफ अब विलो के ऊंचे दरख्‍़तों के सिलसिले हैं। विलो वृक्ष से ही क्रिकेट के बैट बनते हैं, और याद आया कि कश्‍मीर में अच्‍छी-खासी बैट इंडस्‍ट्री है। विलो जब गर्व से आसमान की ओर सिर उठाते हैं तो लगता है कि उन्‍हें अपनी साख से बने सचिन तेंदुलकर के बल्‍ले और उससे जडे गए छक्‍कों की याद आ गई होगी।

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फिर सेब और बादाम के बागीचे सरपट दौड़ते दिखने लगे। बगीचों को विराम देने के लिए धान के हरे खेत जब-तब उभर आते हैं जो दूर तक किसी हरी नदी की तरह विस्‍तार लिए हैं। इस बीच, एक और सहयात्री भी हमारे साथ है – दायीं तरफ पीर पंजाल की पहाड़ी जाने कब से साथ चली आ रही है। चीड़ और सदाबहार पेड़ों की हरियाली से ढकी यह पर्वत श्रृंखला अब बनिहाल तक हमारे साथ बनी रहेगी। रेल की सर्पीली पटरियां पल-पल नज़ारे बदल रही हैं, खेत कभी बगीचों में तो कभी दूर तक बहती पानी की एक धार की शक्‍ल ले रहे हैं। अगला स्‍टेशन बिजबिहाड़ा है, पूर्व गृहमंत्री पी एम सईद का चुनाव क्षेत्र। हमारे कश्‍मीरी सहयात्री ने गाइड की अपनी भूमिका जारी रखते हुए हमारी जानकारी में इजाफ़ा किया। अब पटरी के दोनों ओर मक्‍के के लहलहाते खेत दिखने लगे हैं। ”यह मेज़ बेल्‍ट है और चरस-गांजा पट्टी भी। मकई की बालियों के बीच ही नशे की खेती भी लहलहाती है इस इलाके में। नारकोटिक्‍स विभाग के जब तब छापे पड़ते रहे हैं यहां।” रेल का सफर ज्‍यॉग्राफिया की समझ बेहतर बनाता है, यह तो पता था मगर स्‍थानीय बिसात पर कैसे-कैसे रंग बिखरे होते हैं, उनकी भी इतनी अच्‍छी जानकारी दे सकता है, यह आज ही समझ में आ रहा है।

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अब हम अपने ड्रीम स्‍टेशन यानी बिचलेरी घाटी में बनिहाल से बस तीन स्‍टेशन दूर हैं – अनंतनाग, सदुरा और कश्‍मीर घाटी के धुर दक्षिण में काज़ीगुंड। काज़ीगुंड से ही दूर पीर पंजाल की बुलंदी पर बर्फ की एक लकीर टंगी दिखती है, यह कोलाहोइ ग्‍लेशियर है। और हमने रोमांच की एक लहर को अपने भीतर तक महसूस किया। लेकिन इस लाइन का सबसे बड़ा रोमांच अभी बाकी है। काज़ीगुंड स्‍टेशन से ट्रेन के निकलते ही डिब्‍बे में यात्रियों के चेहरों के भाव बदलने लगे थे, कोई झटपट अपना मोबाइल निकाल रहा है तो किसी ने खिड़की पर निगाह टिका ली है। हालांकि हिल्‍लड़ शाह आबाद नाम का एक छोटा-सा हॉल्‍ट स्‍टेशन अभी आना बाकी है, लेकिन किसी को उसके आने और बीत जाने से जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा। कश्‍मीर रेल के मूल नक्‍शे में इस स्‍टेशन की कोई योजना नहीं थी लेकिन दिसंबर 2012 में ट्रेन के ट्रायल रन के दौरान स्‍थानीय लोगों के भारी प्रदर्शन और मांग को देखते हुए इस शहर पर भी स्‍टेशन बनाना पड़ा। और तब कहीं जाकर बनिहाल सुरंग में प्रवेश कर पायी थी कश्‍मीर ट्रेन! मिनट भर गाड़ी ने इस हॉल्‍ट स्‍टेशन पर अंगड़ाई ली और आखिरी पड़ाव की ओर बढ़ चली। जैसे ही ट्रेन ने पीर पंजाल सुरंग में प्रवेश किया एक शोर की लहर पूरे डिब्‍बे में एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैल गई। एक स्‍वर उसमें मेरा भी रहा होगा … सुरंग जो कभी खत्‍म होने का नाम ही नहीं लेती। पेईचिंग से चीन की ऐतिहासिक दीवार के जाने के रास्‍ते में एक सुरंग पड़ती है जो देर तक लोगों को चकित करती है। काज़ीगुंड से बनिहाल की सुरंग ने उसे भी पीछे छोड़ दिया है। हर मायने में यह उस सुरंग से आगे निकल गई है।

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एशिया की दूसरी सबसे लंबी तथा भारत की सबसे लंबी (11 किलोमीटर) इस सुरंग में रेल के प्रवेश से पहले ही हर कोच में बत्तियां जगमगा उठी, लोगों की जेबों से मोबाइल बाहर खिड़कियों पर लहराने लगे, हर कोई जैसे रोशनी से नहायी उस सुरंग में बिताए उन दस मिनटों को जैसे अपनी स्‍मृति के साथ-साथ फोन की मेमोरी में भी कैद कर लेने को उतारू था। दोनों तरफ दीवारों पर रंगीन साइनेज चस्‍पां थे जो किसी भी इमरजेंसी में यात्रियों के लिए सुरंग से बाहर निकलने के नज़दीकी रास्‍ते की ओर इशारा कर रहे थे, पल-पल पर दीवार पर टंगे सीसीटीवी कैमरे थे जो रेल की हर गतिविधि को रिकार्ड कर रहे थे और विशालकाय जैट पंखे लगे थे जो किसी विषाक्‍त गैस के सुरंग में फैलने पर उन्‍हें उसे सोख लेने के लिए लगाए गए हैं। यहां तक कि पूरी सुरंग में जगह-जगह इमरजेंसी फोन भी पटरी के दोनों ओर लगे हैं। कुल 1,691 करोड़ रु की लागत से बनी टी-80 सुरंग इंजीनियरिंग और आधुनिकतम सुविधाओं का अद्भुत नमूना है। बनिहाल रेलवे स्‍टेशन पर इस सुरंग के रिमोट संचालन के लिए नियंत्रण कक्ष बनाया गया है।

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”हम पहली बार सोपोर से इतनी दूर (बनिहाल) वॉलीबॉल मैच खेलकर लौट रहे हैं। आज हम मैच में जीत दर्ज कराकर लौटे हैं, लेकिन हमारे लिए इससे भी बड़ी बात यह है कि पहली बार हम जम्‍मू के किसी शहर की टीम के आमने-सामने थे, इस ट्रेन की वजह से हम ऐसा कर पाए हैं।” 21 साल के अकरम की आंखों में जो चमक थी वो वाकई सिर्फ वॉलीबाल के पाले में लूटी गई जीत की नहीं थी बल्कि रेल की पटरियों से दूरियों को समेटने की हसरत के पूरा होने की भी थी। बनिहाल से वापसी की ट्रेन में हमें अकरम और उसके साथियों की एक पूरी टीम मिल गई है। शाम के 5 बज चुके हैं और ऑफिस से घर लौटने वाले कर्मचारियों के थके चेहरे भी इस डिब्‍बे में दिख रहे हैं।

शमायला श्रीनगर में रहती है, लाल चौक से नौगांव स्‍टेशन तक सुमो की सवारी और फिर नौगांव से काज़ीगुंड तक रेल से वह अपने ऑफिस आना-जाना करती है। वह कहती है कि नौगांव स्‍टेशन पर सवेरे 9 बजे के बाद दूसरी ट्रेन करीब 11.15 बजे आती है, लेकिन ऐसा निश्चित नहीं है, रेल हर दिन ही 15-20 मिनट देरी से आती है और वह ऑफिस के लिए लेट हो जाती है। उधर, सड़क से जाने में रास्‍ते भर ट्रैफिक जाम से जूझना पड़ता है, इसलिए वह रेल को ही तरजीह देती है। मगर ऑफिस जाने वाले यात्रियों, खरीदारों और यहां तक कि मरीज़ों की भारी भीड़ के चलते किसी भी डिब्‍बे में चढ़ना सवेरे के समय आसान नहीं होता। यहां तक महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्‍बा भी ठसाठस भरा रहता है। अमूमन 600 सीटों वाली ट्रेन में सवेरे के वक्‍त करीब 2000 यात्री होते हैं, जो और कुछ नहीं तो इस बात का गवाह तो है ही कि यह रेल लिंक कश्‍मीर घाटी में स्‍थानीय बाशिन्‍दों के लिए आवागमन का बढ़ि‍या जरिया साबित हो रही है।

अमूमन रेलगाड़ि‍यां मंजिलों को नापने का काम करती हैं लेकिन कश्‍मीर रेल लोगों के लिए आज तक पिकनिक का भी बहाना बनी हुई है। पिछले दिनों ईद के अगले दिन घाटी भर से तमाम लोग इसकी सवारी के लिए इसमें लद गए, यहां तक कि कुछ उत्‍साही तो छतों पर भी जा चढ़े और नतीजा यह हुआ कि बनिहाल सुरंग से पहले ही ट्रेन को रोक देना पड़ा। हम ईद के चंद रोज़ बाद नौगांव स्‍टेशन से इस रेल पर सवार हुए तो भी लोगों के उत्‍साह में कोई कमी दिखायी नहीं दी। रजि़या, माहज़बीन और तराना अपनी मौसी की शादी के लिए खरीदारी करने इस्‍लामाबाद (अनंतनाग) जा रही थीं। खुशी से चहक रही रजि़या ने बताया कि श्रीनगर की बजाय खरीदारी इस्‍लामाबाद से करने का कारण है वहां थोक रेट में सामान मिलना। और रेलगाड़ी से सफर का मज़ा अलग-से। ऊपर से खर्च भी कम। सड़क से जाते तो सूमो का मालिक पैसे भी ज्‍यादा ऐंठता और जहां-तहां ट्रैफिक जाम में फंसते-फंसाते कहीं ज्‍यादा समय भी खराब होता। यानी, रेल के सफर ने एक तरफ दूरियों को कम किया है तो दूसरी ओर कम खर्च में अधिक सहूलियत भी दी है।

कश्‍मीरवासियों को यह समीकरण जल्‍द ही रास आ गया और ट्रेन अपनी पूरी क्षमता से दौड़ने लगी है। आज उत्‍तरी कश्‍मीर के बारामूला से जम्‍मू के बनिहाल तक कुल 137 किलोमीटर तक की ब्रॉड गेज पर 80 से 100 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ती रेल सेवा सामाजिक बदलाव भी ला रही है। हर दिन यह ट्रेन पांच फेरे लगाती है। वेरिनाग में बसे सरकारी कर्मचारी परवेज़ आलम का कहना है – ”पहले हमारे घरों से जो लड़कियां पढ़ने के लिए श्रीगनर जाती थीं उन्‍हें आने-जाने में काफी दिक्‍कतें पेश आती थीं और अक्‍सर घर लौटने में देरी के चलते उन्‍हें वहीं रुकना पड़ता था जिसकी इजाज़त बहुत से परिवार नहीं देते थे। यानी, आगे पढ़ने का सपना परवान चढ़ने से पहले ही चटक जाया करता था। लेकिन अब इस रेल से वे हर दिन शाम को सुरक्षित घरों को लौट आती हैं। हमने उनके लिए एमएसटी यानी मंथली सीज़न टिकट बनवा दिए हैं जो बहुत सस्‍ते भी पड़ते हैं। इस तरह हर महीने किराए में भी बचत होने लगी है।”

कश्‍मीर घाटी में कोई पहल हो और सुरक्षा के पहलू पर ध्‍यान न दिया जाए, ऐसा नामुमकिन है। यह ट्रेन भी इसका अपवाद नहीं है और इसमें सवारी के लिए स्‍टेशन में कदम रखने से लेकर पूरे रास्‍ते भर, रेल की पटरियों के इस और उस पार, एक-एक कोच में सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी भी सुकून का अहसास दिलाती है। पटरियों की सुरक्षा के लिए आरपीएफ (रेलवे प्रोटेक्‍शन फोर्स) के जवान मुस्‍तैद हैं तो कोच के भीतर जीआरपी यानी गवर्नमेंट रेलवे पुलिस कर्मी डटे हैं। पीर पंजाल सुरंग के भीतर तो सुरक्षा व्‍यवस्‍था किसी मिसाल से कम नहीं है।

इस रेलवे लाइन ने भले ही अपनी निर्धारित तारीखों को कई बार ठगा है, बहुत-सी डैडलाइन बिना किसी उपलब्धि के बीत गईं और यहां तक कि कितने ही लोगों को इस बात की कोई उम्‍मीद भी नहीं रह गई थी कि वे अपने जीवनकाल में इस रेल संपर्क को चालू होते हुए देख भी सकेंगे। लेकिन आज रेलवे के इंजीनियरों ने जिस रेल लिंक को साकार किया है उसे देखकर आप इतराए बगैर नहीं रह सकते। यह रेलवे लाइन हिमालयी श्रृंखलाओं के कुछ ऐसे दुर्गम इलाकों से भी गुजरती है जो भूवैज्ञानिक चमत्‍कारों से कम नहीं हैं। कभी सुरंगों की खुदाई के मार्ग में झरने फूटते रहे तो कभी किसी सुरंग को किसी ऐसी जगह से निकालने की चुनौती सामने आयी जहां पहले से गांव बसे थे। और कहीं-कहीं मीलों निर्जन बियाबान ऐसे भी थे जहां साल के छह महीने सिर्फ बर्फीला संसार दिखायी देता है। काज़ीगुंड से उधमपुर तक पटरियां बिछाने का काम संभवत: सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण है, फिलहाल बनिहाल तक पटरी और उन पर रेल की रेलम-पेल दिखने लगी है। अब उधमपुर से कटरा तक 25 किलोमीटर के एक और मार्ग पर भी इस साल के अंत तक रेल दौड़ने लगेगी।

यानी अंतिम कड़ी के तौर पर कटरा से बनिहाल तक का रेल मार्ग बाकी रहेगा और संभवत: सबसे ज्‍यादा इंतज़ार भी कराएगा। फिलहाल 2017 तक इसके चालू होने का अनुमान है लेकिन इस परियोजना पर नज़दीकी निगाह रखते आ रहे कई इंजीनियरों को लगता है कि 2018 से पहले इसके चालू होने के आसार नहीं है। दरअसल, इसी मार्ग पर चनाब पर वो पुल बन रहा है जो दुनियाभर में सबसे ऊंचा रेलवे पुल होगा। कुल 523 करोड़ रु की लागत से 1315 मीटर लंबाई वाले इस पुल की ऊंचाई 359 मीटर होगी और इसके निर्माण पर 24630 मीट्रिक टन स्‍टील की खपत होगी। और एक नही, कई छोटे-बड़े पुलों, सुरंगों का निर्माण इस मार्ग पर होगा। चुनौतियां सिर्फ भूवैज्ञानिक ही नहीं हैं, दरअसल, उस रास्‍ते की निर्जनता भी है जहां सर्दियों में पारे के शून्‍य से नीचे गिर जाने पर पंछी भी नहीं दिखते।

जो हो, इतना तय है कि कश्‍मीर से जो रेल छूट चुकी है वो आज सिर्फ खबर नहीं रह गई है बल्कि कश्‍मीर घाटी और कश्‍मीरियों को देश के दूसरे भूभागों से जोड़ने का पैगाम भी बन गई है। और इस कश्‍मीर रेल लिंक ने पीर पंजाल से गुजरते हुए आज लोगों के दिलों तक में जगह बना ली है।

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