Dharamsala – On the footsteps of Buddha, In Dalai Lama’s abode

धर्मशाला – जहां गढ़ा जा सकता है पर्यटन का नया मुहावरा!

धर्मशाला का रोमांस शुरू होने से पहले ही जैसे छिटक रहा था ! मन उलझन में था, जाऊं या न जाऊं, जब दलाई लामा ही नहीं वहां तो कैसा सफर …. दरअसल, इधर हमने धर्मशाला की राह पकड़ी और उधर तिब्बती धर्मगुरु लेह में कुछ रोज़ मेडिटेशन रिट्रीट के लिए रवाना हुए। बहरहाल, मन को किसी तरह सांत्वना दी, समझाया कि दलाई लामा के दर्शन का संयोग बनना इतना आसान नहीं होता। लिहाजा, खुद को मना-बुझाकर हम मिनी ल्हासा के तिलिस्म को समझने के लिए तैयार हुए।राजधानी दिल्ली से सिर्फ पिचहत्तर मिनट की उड़ान भरकर हमारा नन्हा-सा जहाज़, जिसे देखकर एक बार यह धोखा तक हुआ कि यह कमर्शियल उड़ान के लिए नहीं हो सकता बल्कि किसी अमीरजादे की निजी एयर टैक्सी है, गग्गल (कांगड़ा या धर्मशाला हवाईअड्डा भी इसे कहते हैं) हवाईअड्डे पर उतर चुका था। धर्मशाला तक सड़कों को कारों और रेल की पटरियों से नापना भी यों कतई मुश्किल नहीं है। दिल्ली से मुश्किल से 600 किलोमीटर दूर धौलाधार पहाडि़यों की बांहों में लिपटे इस रोमांच तक पहुंचने की बेचैनी हो तो हवाई सफर अच्छा इलाज है।

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अगले रोज़ हमने अपने टूरिस्टी एजेंडा के मुताबिक मैकलोडगंज की राह पकड़ी। धर्मशाला से करीब 13 किलोमीटर दूर दलाई लामा मंदिर तक के पहाड़ी रास्ते में धुंध और बारिश के छींटों ने रूमानियत को बढ़ा दिया था और पूरा सफर गुनगुनाते हुए बीता। पलक झपकते ही यह भ्रम हो जाना स्वाभाविक था कि हम तिब्बत के ही किसी कोने में खड़े हैं। ल्हासा के पोटला पैलेस की तर्ज पर मैकलोडगंज में इस मंदिर के सामने पहुंचकर कदम कुछ ठिठके, चटख रंगों से सजी, किसी पहाड़ी पर टंगी और बौद्ध आर्किटैक्चर की अनुपम मिसाल पेश करती मोनेस्ट्री की जो तस्वीर आंखों में सजाए हम आए थे, वो कहीं नहीं दिखी। हमारे सामने कंक्रीट और स्टील की एक विशाल इमारत जरूर थी, बेतरतीबी और अफरा-तफरी का आलम बयान से परे था। मैरून चोगे में लिपटे यहां से वहां, जाने कहां-कहां को दौड़ते बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियां देखकर आप हैरत में पड़ सकते हैं कि अध्यात्म का यह कौन-सा फलसफा आपके सामने है। मंदिर के दरवाजे पर भाप के बादलों के बीच मोमोज+ बेचते युवक से तसल्ली कर ली कि हम बिल्कुल सही जगह पर ही थे। तिब्बत की स्वाधीनता के लिए आत्मोत्सर्ग कर चुके तिब्बतियों का एक विशाल पोस्टर दायीं तरफ चिपका था, सामने ही म्युजियम और मंदिर के लिए दायां मोड़ काटने पर सीढि़यों पर एक बार फिर भीड़-भाड़ देखकर मन में उलझन महसूस हुई। बौद्ध मठों-मंदिरों की पिछली तमाम तस्वीरों, कल्पनाओं से अलग दृश्य देखकर चैंकना बनता है।

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Dalai Lama Temple, Macleodganj

एयरपोर्ट जैसी सुरक्षा जांच के दायरे को लांघकर अब हम मंदिर के प्रागंण की ओर बढ़ रहे थे। बुद्ध की विशाल प्रतिमा के सामने पहुंचकर सुकून मिला और हम अपने सफर की सार्थकता के आंनदरस में खो गए। मेरे नज़दीक ही एक तिब्बती वृद्धा जमीन पर नतमस्तक होकर अपने प्रार्थना गीत गुनगुना रही थी। करीब ही एक युवा भिक्षु के हाथ में झूलती पिटारी में एकाएक मोबाइल की घंटी ने ध्यान तोड़ा। मंत्रोच्चार से बुदबुदाते उसके होंठ ठिठके। एक हाथ में माला के मनके और दूसरे में चमचमाते स्मार्टफोन की वो तस्वीर मेरे ज़ेहन में आज भी एकदम ताज़ा है। इसी बीच, नन्हे बालक भिक्षुओं का एक रेला मेरे सामने से गुजरा, हंसी-ठिठोली करते वो अबोध बच्चे कहीं से बिल्ली का एक मरियल-सा बच्चा पकड़ लाए थे और उसके साथ मस्त थे। मैंने महसूस किया कि तिब्बत की निर्वासित सरकार के कर्ता-धर्ताओं और सर्वोच्च धर्मगुरु की छाया ने पूरे माहौल को एक खास रंग दिया है, या शायद एक अनौपचारिकता दी है। हमने भी बौद्ध होने का सबक सीखा और प्रार्थना चक्रों को घुमाते हुए, ऊ मणि पद्मे हुम्म … के जाप के साथ अपनी अगली मंजिल की ओर निकल पड़े।

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Norbulingka Institute, Dharamsala

नॉरबुलिंग्का इंस्टीट्यूट जाने के लिए एक बार फिर हम पहाड़ी ढलानों से उतर रहे थे। बादलों की घेराबंदी अभी टूटी नहीं है, लिहाजा एक बार फिर हम धौलाधार की श्रृंखलाओं को देखने से वंचित रह गए। मानसूनी फुहारों ने रास्तों की फिसलन बढ़ा दी है, किनारे के पत्थरों पर सीलन और काई का संसार फैला है और बीच-बीच में फर्न की पत्तियां आते-जाते राहगीर को जैसे छूने के लिए मचल उठी हैं। सड़क वाकई संकरी है और कहीं-कहीं तो एक बार में सिर्फ एक गाड़ी के गुजरने की पिद्दी-सी जगह ही बची है। लेकिन यह ऊंचाई डराती नहीं है। घाटी में देवदार, चीड़ और बांज-बुरांश की शाखाओं की मस्ती है और कहीं कोई मोड़ काटते ही किसी पहाड़ी झरने की गुनगुनाहट दूर से सुनाई देती है। करीब पंद्रह मिनट में हम तिब्बती जीवन की झलक देखने नॉरबुलिंग्का पहुंच गए, यहां तिब्बती कला, ’शिल्प, संस्कृति, कौशल को संजोकर रखने का एक व्यवस्थित सिलसिला दिखायी देता है। एक छोटे-से हॉलनुमा कमरे में डॉल्स म्युजि़यम है जो तिब्बती जीवन की झलक दिखाता है। एक विशाल अहाते को पार कर हम एक मंडप के सामने खड़े हैं। इसके अंदर बौद्ध अपनी चिर-परिचत शांत मुद्रा में विराजमान हैं और बाहर दो भिक्षुणियां गपशप में डूबी हैं। क्या जीवन ऐसे ही विरोधाभासों से मिलकर नहीं बना ?

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मोमोज़, तिब्बती कला-संस्कृति और भिक्षु-भिक्षुणियां धर्मशाला की पहचान बेशक हैं, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं हैं। तस्वीर का दूसरा पक्ष जानने-समझने के लिए हम यहां रटे-रटाए टूरिज्म के मुहावरे से अलग निकल जाने को आतुर हैं इस बार! और अगले ही रोज़ मलहा से पालमपुर तक की टॉय ट्रेन में सवार हो गए। कांगड़ा रेलवे यानी हमारी टॉय ट्रेन पंजाब में पठानकोट से, जो कि धर्मशाला से लगभग 80 किलोमीटर दूर है, मंथर चाल चलती हुई, घाटियों-वादियों और पुलों को पार करती हुई हिमाचल में जोगिंदरनगर तक चली जाती है। रेलगाडि़यों का सफर बेशक कितना किया हो आपने मगर माउंटेन रेलवे की यात्रा के रोमांच के आगे वो फीका ही साबित होगा। हिमाचल में ऐसी ही एक और टॉय ट्रेन कालका से शिमला तक ठुमकती हुई जाती है। इन दोनों में एक बड़ा फर्क यह है कि  शिमला तक की ट्रेन आपको बार-बार सुरंगों में घुसाती है जबकि कांगड़ा रेलवे के रूट पर ज्यादातर सफर वादियों के नज़रों और पहाड़ी मंज़रों को देखते हुए बीतता है। इंजीनियरों ने पहाड़ों के सीने पर कम-से-कम सुर्राख कर कांगड़ा घाटी में इस नैरो गेज को साकार किया था।

धर्मशाला के दक्षिण-पूर्व में करीब 38 किलोमीटर दूर पालमपुर में उतरकर हमने यहां के चाय बागानों की सैर की और विश्‍वप्रसिद्ध कांगड़ा चाय को यादों के पिटारे के तौर पर चुन लाए। कांगड़ा घाटी के प्रमुख आकर्षणों में से एक है पालमपुर। ट्रैकिंग, पैराग्लाइडिंग और कैम्पिंग के लिए भी यह अच्छा अड्डा है और धौलाधार की पहाडि़यों पर ट्रैक के लिए कई एडवेंचर ग्रुप इसे अपना बेस चुनते हैं।

कांगड़ा घाटी में प्रकृति से गुफ्तगू और अध्यात्म की खुराक के अलावा इतिहास के पन्नों को भी टटोला हमने। हमारी अगली मंजिल बना कांगड़ा का किला। धर्मशाला से कुल जमा 23 किलोमीटर दूर खड़ा है इतिहास का वो अलबेला किला जो हिंदुस्तान की सरजमीं पर आए लगभग हर विदेशी हमलावर की आंखों में ख्वाब बनकर सजा रहा था।

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kangra Fort

बाण गंगा नदी के किनारे, जंगलों से घिरे और पहाड़ी ढलान पर खड़े कांगड़ा किले को नहीं देखा तो आपका यह सफर अधूरा ही है। कहते हैं संपूर्ण हिमालय क्षेत्र में यह सबसे पुराना और सबसे बड़ा किला है जिसकी दीवारों ने महमूद गज़नी से लेकर गज़नवी तक, अकबर-जहांगीर से लेकर शेरे-पंजाब रणजीत सिंह तक को कई-कई बार निराश-हताश किया था।

इसके सीने में आज भले ही कई राज़ दफन हैं मगर एक जमाना हुआ करता था जब इसकी ऊंची दीवारों से घिरे इसके कुंओं में पानी की कलकल की बजाय बेशकीमती हीरों-जवाहरातों की चमक-दमक थी। कटोच वंशी राजाओं के इन खजानों की गूंज दूर-दूर तक सुनी गई और उसके लालच में जाने कितने ही राजे-महाराजे बरसों तक इसकी दीवारों-खाइयों को घेरे खड़े रहे। महमूद गज़नी के इतिहासकार ने जिक्र किया है कि कैसे लूटपाट के बाद जब गज़नी का कारवां लौट रहा था तो ऊंटों पर उस खजाने को लदवाना किसी आफत से कम नहीं था!उस लूटपाट में गज़नी अपने साथ लेता गया था कटोच राजाओं की कुलदेवी अंबिका की मूर्ति पर लगी सोने की छतरी जिसे उस क्रूर ने गलवाकर अपने लिए नहाने का सोने का टब बनवाया था। इतिहास ने अकबर को इस किले से महरूम रखा तो जहांगीर अपनी चतुराई से इसमें घुसने में कामयाब रहा था। लेकिन उसे भी अपनी सेना के साथ पूरे चैदह महीने तक इसके गिर्द घेराबंदी करनी पड़ी थी और तब कहीं जाकर इसे भेदा जा सका था।

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Inside Kangra Fort

1786 में यह किला एक बार फिर उसके असली वारिस कटोच वंश के राजा संसार चंद द्वितीय के हाथों में आया लेकिन 1846 में रणजीत सिंह ने इसे हड़प लिया और फिर अंग्रेज़ों ने इस पर कब्जा किया।

कांगड़ा किले की जिन बुलंद दीवारों को बरसों तक जारी रही लूटमार और घेराबंदी भी नहीं हिला पायी थी, उन्हें 1905 में आए महाविनाशकारी भूकंप में धराशायी कर दिया। किले का एक बड़ा हिस्सा इस भूकंप से गिर गया और देखते ही देखते खंडहर में बदल गया। 1924 में अंग्रेज़ों ने यह किला कटोच राजशाही के वारिसों को सौंप दिया और आज तक यह उनके संरक्षण में है। रणजीत सिंह द्वार से किले में प्रवेश करते हुए इसकी सीढि़यों को नापते हुए जब आप आगे बढ़ेंगे तो दोनों तरफ इसकी ऊंची दीवार में बंदूक दागने और तीर-कमानधारी हमलावरों के लिए बनाए गए ’स्ट्रैटेजिक‘ ठिकानों को देखकर ही समझ जाएंगे कि कांगड़ा किला बरसों तक अपने दु’मनों को दूर रखने में कैसे कामयाब रहा। कांगड़ा घाटी में एक मशहूर कहावत है कि ’किले पर जिसका कब्जा, पहाडि़यों पर ‘शासन उसका‘ और इस किले की छत पर पहुंचकर दूर तक फैली कांगड़ा घाटी को निहारते हुए इस कहावत पर बरबस यकीन हो जाता है।

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Ruins inside kangra Fort after earthquake in 1905

कांगड़ा किले की ध्वस्त दीवारों, क्षीण महराबों और वक्त की पदचाप से लगातार घिस रही सीढि़यों पर से गुजरते हुए ऑडियो गाइड का साथ जरूर चुनें। महारभारत काल में भी कांगड़ा राजशाही का जिक्र हुआ है और तबसे आज तक के उसके घटनाक्रमों को इस ऑडियो गाइड में समेटा गया है। अंग्रेज़ी में रोशन सेठ तथा हिंदी में शम्मी नारंग की दमदार आवाज़ में कमेन्ट्री सुनते हुए इतिहास के गलियारों से गुजरना वाकई खास अनुभव है!

कांगड़ा घाटी के इस टूर को अध्यात्म का रंग चढ़ाना हो तो देवियों, ज्योतिर्लिंगों के दर्शन भी करते चलें। बैजनाथ धाम, चामुण्डा देवी, ज्वाला जी, चिंतपूर्णी और भगसूनाथ मंदिर जैसे पवित्र स्थल आसपास ही हैं।

धर्मशाला यानी बौद्ध सर्किट की एक अहम् मंजिल, धर्मशाला यानी तिब्बत की निर्वासित सरकार का ठिकाना, धर्मशाला यानी हॉलीवुड की हस्तियों जैसे रिचर्ड गेर, पियर्स ब्रॉस्नन के अलावा देशी-विदेशी टूरिस्टों से इठलाता शहर …. इस सफर ने हमारे इस सीमित समीकरण को तोड़ा और कांगड़ा घाटी को एक नए रंग में पेश किया।

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