Traffic woes – even Everest is not spared!

एवरेस्‍ट पर जुड़ने लगा है सैलानियों का मेला  

एक समय था कि एवरेस्‍ट फतह करने पर लोग इतिहास में नाम दर्ज कराया करते थे। आज स्थिति यह है कि एवरेस्‍ट पर चढ़ने पर आप हद-से-हद आंकड़ों में शुमार हो सकते हैं। इस साल पंद्रह साल के किशोर से लेकर अस्‍सी साल के वृद्ध ने और अपना पैर गवां चुकी महिला से लेकर दो जुड़वा बहनों तक ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी जीतने का गर्व हासिल कर लिया। ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि क्‍या एवरेस्‍ट पर पहुंचना सिर्फ मज़ाक बनकर रह गया है ? क्‍या सचमुच एवरेस्‍ट की चुनौती भोंथरा गई है या पर्वतारोहण की तकनीकों ने इस ‘अल्‍टीमेट चैलेन्‍ज’ को लजा दिया है ? और ऐसा क्‍या हुआ कि धरती का यह सबसे ऊंचा स्‍थान आम जनता की पहुंच के भीतर आ गया है ? एवरेस्‍ट अब एक दुर्लभ उपलब्धि नहीं बल्कि एडवेंचर खेल कैसे बन गया है। इसकी सैर पर जाना जुनून नहीं रह गया बल्कि मन में जज्‍बा है तो आप भी अगले सीज़न में एवरेस्‍ट के लिए अपना बैकपैक तैयार कर सकते हैं। वाकई, 2014 के लिए बुकिंग और तैयारियों का बाज़ार चालू है!

Image

Climbers atop Everest – Who says it is lonely at the top!
Photo courtesy – Percy Fernandez

चोमुलंगमा सगरमाथा (नेपाल में एवरेस्‍ट को इसी नाम से पुकारा जाता है) ने इस साल लगातार खबरों में बने रहने की जैसे ठान रखी थी। हर साल की तरह मई में हिमालयी बसंत का एक छोटा-सा झोंका आया और 10 मई से 24 मई के पखवाड़े में एवरेस्‍ट बेस कैंप का नज़ारा देखते ही देखते किसी महानगर के बस अड्डे जैसा हो गया। लगभग छह सौ पर्वतारोहियों की महत्‍वाकांक्षाओं को अंजाम तक ले जाने के लिए बेस कैंप में उनके कोच, गाइड और शेरपाओं के अलावा बेस कैंप समेत अगले शिविरों में तैनात होने वाले सपोर्ट स्‍टाफ की रेल-पेल देखकर कौन कह सकता था कि वो भीड़ एवरेस्‍ट जैसी दुर्गम ऊंचाई पर पहुंचने का सपना लेकर वहां जमा हुए नए, पुराने, अनगढ़, हुनरमंद, शौकिया, पेशेवर, अनुभवी पर्वतारोहियों की ही थी। भारत से एनसीसी कैडेटों के आधिकारिक फोटोग्राफर के तौर पर इस साल एवरेस्‍ट अभियान के लिए गए पर्सी फर्नांडीज़ बेस कैंप को किसी ऐसे अड्डे के रूप में याद करते हैं जहां इस ‘हिमालयी बसंत’ के दिनों अलस्‍सुबह ही जैसे कोई मेला जुड़ जाया करता था। काठमांडू से हेलिकॉप्‍टर सुबह-सवेरे ही पर्वतारोहियों की ‘खेप’ बेस कैंप पहुंचाने में जुट जाते। कितने ही पर्वतारोही ऐसे भी थे जो ऊपरी शिविरों तक हो आए थे और एक्‍लीमटाइज़ भी हो चुके थे, लेकिन ऑक्‍सीजन की अतिरिक्‍त खुराक शरीर में उतारने की खातिर हेलिकॉप्‍टरों से काठमांडू और यहां तक कि एक दल तो बैंकाक तक की सैर करने भी लौट आया। एवरेस्‍ट पर फतह अभियानों में यह नया अध्‍याय जुड़ रहा था और दुनियाभर से आए एडवेंचर प्रेमियों ने ‘चॉपर्ड क्‍लाइंबिंग’ की नई इबारत लिखी।

Image

Mount Makalu as seen from Everest top
Photo courtesy – Percy Fernandez

इस बीच, एवरेस्‍ट की बेरहम बुलंदी ने 2013 में पिछली कितनी ही उपलब्धियों को ध्‍वस्‍त किया और कई नए रिकार्ड भी रचे। 23 मई को 80 साल के जापानी युचिरो मियूरा एवरेस्‍ट की चोटी पर पहुंचने वाले सबसे बुजुर्ग पर्वतारोही बने तो 81 साल के नेपाली शेरपा मिन बहादुर शेरचन ने एक ही हफ्ते बाद मियूरा के इस भगीरथ प्रयास को इतिहास के गर्त में मिला देने का हौंसला दिखाया। लेकिन मौसम को यह मंजूर नहीं हुआ और 29 मई तक आते-आते हिमालय के शिखर पर मौसम ने ऐसी करवट ली कि शेरचन को अपना इरादा छोड़ना पड़ा। और इस तरह 2008 में 76 साल की उम्र में सबसे उम्रदराज एवरेस्‍ट विजेता के जिस रिकार्ड का ताज इस शेरपा के माथे पर सजा था वो इस साल जापानी पर्वतारोही ने झटक लिया। इससे पहले खबर आयी कि भारत से पहली ऐसी महिला पर्वतारोही ने एवरेस्‍ट पर विजय पताका फहरा दी है जो दो साल पहले एक हादसे में अपना बायां पैर गंवा चुकी थी। कृत्रिम पैर के सहारे उन बर्फीली ऊंचाइयों को नापना वाकई अरुणिमा के हौंसलों की उड़ान ही था जो एक से एक हुनरमंद पर्वतारोहियों को गच्‍चा देने के लिए मशहूर रही है। और इसी सीज़न में सनावर में दसवीं क्‍लास में पढ़ रहा पन्‍द्रह साल का राघव जुनेजा भी एवरेस्‍ट की चोटी पर पहुंचकर सबसे युवा भारतीय एवेरस्‍टर बन गया। मई में ही देहरादून की जुड़वां बहनों, 21 साल की नुंग्‍शी और ताशी मलिक ने दुनिया की पहली ऐसी जुड़वां बहनों के तौर पर मिसाल कायम की जो हिमालय की इस सबसे ऊंची सरजमीं को छूकर आयीं।

Image

way to go, man!
Photo courtesy – Percy Fernandez

ट्रैकर, पर्वतारोही और मैराथन धावक माला होन्‍नति मानती हैं कि बेशक, बेहतर तकनीकों, पहले से कहीं अधिक दमदार संचार प्रणालियों, शानदार माउंटेन गीयर, उम्‍दा उपकरणों और एडवेंचर पाठशालाओं से पर्वतोरोहण के समीकरण सीखकर निकले नवयुवक अब पहले के मुकाबले कहीं अधिक संख्‍या में एवरेस्‍ट अभियानों पर निकलने लगे हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि एवेरस्‍ट की चुनौती कम हुई है। इस शिखर की ऊंचाई, उस तक पहुंचने की कठिन राह, दुर्गम ऊंचाइयों से होकर गुजरने वाले मार्गों की परेशानियां, ऑक्‍सीजन के स्‍तर में भारी गिरावट के चलते एक्‍यूट माउंटेन सिकनेस, जो कई बार जानलेवा भी साबित हो सकती है, जैसी भारी चुनौतियां जस-की-तस हैं। बेशक, सुरक्षा के इंतजाम बढ़े हैं, हेलिकॉप्‍टरों और विमानों की उड़ानों ने ट्रेक के जोखिम और थकावट को कम कर दिया है, मौसम विज्ञान ने भी प्रगति की है और अब पहले से ही मौसम संबंधी पूर्वानुमान उपलब्‍ध होने से अभियान की तैयारियों को अधिक पुख्‍ता बनाया जा सकता है। लेकिन तो भी पर्वतारोहण की अपनी अपेक्षाएं तो हैं ही, फिटनैस और सेहत के साथ-साथ आसमान छूते शिखर पर पहुंचने का जुनून भी होना जरूरी है।

Image

a scene from Everest ultra marathon
Photo courtesy – Mala Honnati

लेकिन पारंपरिक सोच रखने वाले पर्वतोराही एवरेस्‍ट पर बढ़ रहे इन ‘हमलों’ से कतई खुश नहीं हैं। 1984 में इंडियन माउंटेनियरिंग फेडरेशन (आईएमएफ) द्वारा प्रयोजित एवरेस्‍ट अभियान दल (इसी अभियान का हिस्‍सा रहीं बछेन्‍द्री पाल एवरेस्‍ट पर तिरंगा फहराने वाली पहली भारतीय महिला बनने का गौरव हासिल कर लौटी थीं ) के सदस्‍य रहे अनुभवी पर्वतारोही विंग कमांडर श्रीधरण, जो खुद हाल में एवरेस्‍ट बेस कैंप से लौटे हैं, कहते हैं कि ”एवरेस्‍ट अभियान अब पर्वतारोहण नहीं रहा बल्कि शेरपाओं द्वारा बर्फीली ऊंचाइयों पर रस्सियों का जाल बुनने, खतरनाक खाइयों पर एल्‍युमिनियम की सीढि़यां बिछाने और तमाम इंतजाम के चलते जोशीले नौजवानों के लिए ‘इवेंट मैनेजमेंट’ बनकर रह गया है। कोई भी, 15-20 लाख रु में एवरेस्‍ट विजेता बनने के अपने सपने को पूरा कर सकता है। पहले की तरह, अभियानों के लिए ढेर सारे अनुभव, धैर्य, कड़ी मेहनत, और किस्‍मत जैसे समीकरणों को पूरा करने का हौंसला आज किसी के पास नहीं है। इस बार भी ऐसे ‘कार्पोरेट’ किस्‍म के अमीर एनआरआई एवरेस्‍ट की ‘उड़ान’ पर पहुंचे थे। काठमांडू तक हवाई यात्रा, फिर वहां से आधे घंटे की एक और उड़ान से लुकला हवाईअड्डे तक या कई बार तो सीधे बेस कैंप तक हेलिकॉप्‍टरों से पहुंचने के खेल इस बार भी खूब दिखे। इस तरह के जांबाज एवरेस्‍ट जैसी चोटी तक पहुंचने में पर्वतारोहण के बुनियादी सिद्धांतों को पूरी तरह अनदेखा करते हैं। वे भूल जाते हैं कि शरीर को ऊंचाई के हिसाब से ढालना सबसे पहली शर्त है। टूर ऑपरेटरों के रेडीमेड एवरेस्‍ट पैकेज उन्‍हें लुभाने के लिए काफी होते हैं।”

Image

Scene at base camp
Photo courtesy – Mala Honnati

महज़ साठ साल पहले जिस शिखर पर पहली दफा इंसानी कदम पहुंचे थे वहां अब एक ही सीज़न में लगभग छह सौ लोगों के सपने साकार होने लगे हैं। 29 मई, 1953 को हिलेरी और तेनजिंग ने जब सगरमाथा को छूआ था तो यह तेनजिंग का सातवां प्रयास था और उससे पहले छह बार इस बुलंदी ने उन्‍हें सिर्फ भरमाया था। न्‍यूज़ीलैंड में मधुमक्खियों को पालने वाले व्‍यवसायी एडमंड हिलैरी भी एक बार हताशा मिलने के बाद दूसरी बार यहां आ रहे थे। और जिस ब्रिटिश एवरेस्‍ट अभियान का वो हिस्‍सा थे, वो भी 1921 के बाद नवां अभियान था।

पहले तीन एवरेस्‍ट अभियानों में शामिल रहे विख्‍यात अंग्रेज़ पर्वतरोही जॉर्ज मेलोरी की दीवानगी से कौन वाकिफ नहीं है। हिमालय के दुर्गम, बर्फीले और खतरनाक मार्ग उन्‍हें एक के बाद एक सिर्फ असफलताएं सौंपते रहे और आखिरकार 1924 में जब तीसरे अभियान दल के सदस्‍य के रूप में अपने साथी एंड्रयू इरविन के साथ मेलोरी ने एवरेस्‍ट की ओर कदम बढ़ाए तो बादलों की सफेद धुंध में ये दोनों हमेशा के लिए गुम हो गए। 8 या 9 जून, 1924 को मेलोरी और इरविन को आखिरी बार अपनी मंजिल से कुछ सौ मीटर की दूरी पर देखा गया था। 9028 मीटर (29,029 फुट) पर एवरेस्‍ट शिखर शान से सिर उठाए खड़ा था और मेलोरी-इरविन की जोड़ी 8170 मीटर पर कैंप 6 को पार कर चुकी थी। दल के एक अन्‍य सदस्‍य नोएल ओडेल ने कैंप 5 (7600 मीटर) से उन दोनों को आगे बढ़ते हुए देखा लेकिन फिर बादलों की ओट में वो ओझल हो गए। उनका गायब होना पर्वतारोहण के इतिहास का सबसे बड़ा रहस्‍य बन गया जिस पर से हिमालयी श्रृंखलाओं ने आज तक भी परदा नहीं उठाया है। 1933 में इरविन की आइस ऍक्‍स और फिर 1999 में एक खोजी दल को 8200 मीटर की ऊंचाई पर मेलोरी का ममीफाइड शव भी मिल गया। लेकिन बेजुबान इतिहास यह राज़ नहीं उगला कि यह जोड़ी एवरेस्‍ट शिखर पर पहुंची थी या नहीं ?

अलबत्‍ता, एवरेस्‍ट का आकर्षण और खिंचाव इस दुर्घटना के बाद भी कायम रहा। इस क्रम में एक के बाद एक कई हिमालयी चोटियों पर इंसानी कदम पहुंचे और नए-नए मार्ग सामने आते रहे। लेकिन एवरेस्‍ट शिखर अगले तीन दशकों तक इंसानी आंखों में सिर्फ सपना बनकर तैरता रहा। 1953 में यह तिलिस्‍म भी टूटा और फिर अगले तीन दशक पर्वतारोहण के इतिहास में कई सफल गाथाओं के तार बुनते रहे। लेकिन नब्‍बे का दशक नेपाल में माउंटेनियरिंग, ट्रैकिंग, क्‍लाइंबिंग, हाइकिंग जैसी एडवेंचर गतिविधियों के लिहाज से एक नए युग का सूत्रपात करने वाला साबित हुआ। लगभग इन्‍हीं दिनों एवरेस्‍ट के व्‍यावसायिकरण की शुरूआत हुई। काठमांडू से लेकर नामचे बाजार तक में जगह-जगह उग आयी एडवेंचर एजेंसियों और टूर ऑपरेटरों की भीड़ ने कइयों के दिलों में एवरेस्‍ट का ख्‍वाब बो दिया। पर्सी फर्नांडीज़ तो यहां तक कहने से नहीं चूकते कि पर्वतारोहण के व्‍यावसायिक हितों से जुड़ने के बाद एवरेस्‍ट, एडवेंचर प्रेमियों की ‘बकेट लिस्‍ट’ या ‘विश लिस्‍ट’ में शुमार हो गया। वे कहते हैं कि बीस साल के लंबे ट्रैकिंग अनुभव के बावजूद एवरेस्‍ट मेरी ‘आकांक्षा सूची’ में शामिल नहीं हुआ था वो सिर्फ इसलिए कि धरती के सीने पर सर्वाधिक ऊंचाई पर खड़ा यह शिखर सिर्फ एडवेंचर की घुट्टी की दरकार नहीं रखता। लंबी तैयारियों, शारीरिक और मानसिक बल, अनुभव, पर्वतारोहण की तकनीकों और हुनर से लैस इंसान को ही एवरेस्‍ट पर जाने के बारे में सोचना चाहिए। लेकिन इस बार तो नौसिखियों से लेकर अधकचरा हुनर लिए एडवेंचरिस्‍ट और ‘कार्पोरेट’ किस्‍म के कुछ मालामाल कथित माउंटेनियर भी सीधे एवरेस्‍ट को छूने चले आए थे। और इस हड़बड़ी के नतीजे भी सभी के सामने हैं। अगर एवरेस्‍ट पर पहुंचने के सफलता के ग्राफ ऊंचे हुए हैं तो बहुत-सी ऐसी दुर्घटनाएं भी सामने आयीं जो सिर्फ अनुभवहीनता या पर्वतों का सम्‍मान न करने की जिद का नतीजा थीं। ऐसी दुर्घटनाएं बेशक, टाली जा सकती हैं। 2013 के सीज़न में एक दक्षिण कोरियाई और एक बांग्‍लादेशी पर्वतारोही को एवरेस्‍ट से लौटते हुए सिर्फ इस वजह से जान से हाथ धोना पड़ा कि वे बुरी तरह से थक चुके थे और अपनी पूरी ऊर्जा गंवाने के बाद नीचे आ रहे थे। अनुभवी कोच और गाइड मानते हैं कि एवरेस्‍ट फतह का जुनून मन में संजोए बहुत से एडवेंचरिस्‍ट जीवित लौट आए तो सिर्फ इस वजह से कि मौसम और भाग्‍य ने उनका साथ दिया। वरना लापरवाह किस्‍म के जिस जोखिम के सहारे एडवेंचर प्रेमियों की नई जमात एवरेस्‍ट को छूने निकलने लगी है उनके साथ कोई भी हादसा घट सकता है।

Image

Sherpas – the back bone of climbing
Photo courtesy – Mala Honnati

एवरेस्‍ट ही क्‍या हिमालय की दूसरी कई चोटियों और लगभग अठारह हजार फुट पर स्थित बेस कैंप पर भी इंसानी चहलकदमी बीते कुछ समय से काफी तेज हुई है। हिलेरी-तेनजिंग के विजयी अभियान की याद में हर साल 29 मई को आयोजित होने वाली एवरेस्‍ट अल्‍ट्रा मैराथन की लोकप्रियता साल-दर-साल बढ़ रही है। बेस कैंप से नामचे बाजार तक इस मैराथन में ट्रैकर्स, माउंटेनियर्स और मैराथन रनर्स के अलावा कुछ वो पर्वतारोही भी भाग लेते हैं जो एक्‍लीमटाइजेशन के लिए या फिर मौसम खुलने के इंतज़ार में बेस कैंप में रुके होते हैं। दुनिया में सबसे खतरनाक लैंडिंग वाले हवाईअड्डे के रूप में विख्‍यात होने के बावजूद लुकला हवाईअड्डे पर जमा भीड़ साफ संकेत है कि नेपाल की एडवेंचर इंडस्‍ट्री कितनी सक्रिय है। पर्वतारोही भी मानते हैं कि नेपाल में ट्रेकिंग रूट काफी अच्‍छे हैं, एडवेंचर गतिविधियों के लिए खास जैकेटों, जूतों और हैड लैंप, क्रैम्‍पॉन जैसे तमाम माउंटेन गीयर/उपकरण बढि़या हैं, खुद नेपाल सरकार ने इस पूरे कारोबार से होने वाली आय से उत्‍साहित होकर इसे काफी हद तक व्‍यवस्थित भी रखा है। हालांकि एवरेस्‍ट के लिए तिब्‍बत (चीन) से भी पर्वतारोहण के प्रयास होते हैं लेकिन नेपाल में इसका सफल रूप से व्‍यावसायिकरण हो चुका है।

इस सीज़न में मई में अनुकूल मौसम वाले दिनों में तो एवरेस्‍ट मार्ग पर ट्रैफिक जाम की स्थिति भी देखी गई। अनुभवी पर्वतारोहियों को घंटों उन एडवेंचर प्रेमियों की वजह से इंतजार करना पड़ा जो रस्सियों के सहारे उनके लिए ‘तैयार किए गए’ बर्फीले पर्वतीय रास्‍तों पर शेरपा गाइडों की मदद से आगे बढ़ रहे थे। कभी तेनजिंग-हिलेरी ने जिस शिखर पर एकदम एकांत में अपने अभियान की कामयाबी का जश्‍न मनाया था उसी चोटी पर इस साल एक बार में कई-कई विजेताओं ने कदम रखे। और तो और जिस वीराने में कभी दूर-दूर तक इंसानी चहल-पहल नहीं दिखती थी वहीं इस साल बेस कैंप में टेलीविजन सैटों से लेकर सूप-सुशी से लुभाते टूर ऑपरेटरों की सक्रियता गज़ब की थी। विंग कमांडर श्रीधरण कहते हैं ‘दुनिया को एक और एवरेस्‍ट की तलाश करनी होगी, और जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक सगरमाथा पर सैटलाइट फोन लेकर पहुंचने वाले नए, पुराने, अनुभवी, अनुभवहीन, उत्‍साही, जुनूनी पर्वतारोहियों और एडवेंचर प्रेमियों का रेला बढ़ता ही जाएगा।’

Advertisements