Khajuraho – Beyond Erotic

खजुराहो – भारतीय सभ्यता का प्रेम गान

खजुराहो में अब वक्त सरकता नहीं है, लगता है जैसे चंदेल राजाओं के जमाने से ही दिन और रात यहां बस यूं ही टिके हैं, वहीं रुके हैं जहां पत्थरों पर छैनी की अंतिम चोट पड़ी थी।

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इन पत्थरों में शिल्प की बुलंदियां दिखायी देती हैं और साथ ही सुनायी देती है वो समूची लय-तान जो करीब ग्यारह सौ बरस पहले बुंदेलखंड की इस जमीन पर गुंजायमान थी।

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वक्त जैसे खुद ही सरमायादार है खजुराहो के विश्वप्रसिद्ध मंदिरों का, और समय के अदृश्य आवरण में लिपटे-सहेजे खड़े ये स्मारक भारतीय सभ्यता के समृद्ध यु्ग के गान की तरह सुनाई-दिखाई देते हैं।

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लगभग नवीं सदी से अगले सौ-डेढ़ सौ बरस खजुराहो में पत्थरों पर उकेरा जाता रहा था आम जन-जीवन, कभी जीवन का उत्सव इनकी दीवारों पर खिला तो कभी प्रेमगान करतीं सुरसुंदरियों की मनमोहक मुद्राओं ने पत्थरों में जान डाल दी। इन स्मारकों के निर्माताओं ने किस मकसद से ये मंदिर बनवाए थे, यह आज भी पहेली है।

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खजुराहो मंदिर उस दौर से हिंदुस्तान में पर्यटन का आमंत्रण देते आए हैं जब शायद घुमक्कड़ी ने आधुनिक अर्थ में टूरिज़्म  शब्द को नहीं अपनाया था। इब्न बतूता ने 13वीं सदी में बुंदेलखंड में इन स्मारकों का उल्‍लेख किया है। और संभवत: लगभग उसी दौर से ये मंदिर अदृश्य होने लगे। बुंदेलखंडी राजाओं ने मुस्लिम आक्रमणकारियों से इन भव्य मंदिरों को सुरक्षित रखने के लिए इस इलाके को ही छोड़कर कहीं दूर निकल जाने का फैसला लिया। धीरे-धीरे वक्त और धूल की चादर में ये मंदिर कहीं खो गए। या शायद बच गए इसी कारण से।

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समय चक्र एक बार फिर घूमा और अठारहवीं सदी में ब्रिटिश इंजीनियर टी एस बर्ट ने गर्त में नहाए इन मंदिरों को  देखा। दरअसल, इस इलाके से गुजरते हुए उनके कहारों ने उन्‍हें कुछ अनूठे मंदिर दिखाने  की बात कही, और खजुराहो  में उग आए जंगल के बीच कहीं ठिठके खड़े ये मंदिर दुनिया के सामने एक बार फिर लौटे। तबसे  इन मंदिरों की ख्याति लगातार बढ़ती रही है।

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खजुराहो समूह के मंदिरों को पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी समूहों में बांटा गया है। पश्चिमी समूह में खड़े मंदिर सबसे अधिक समृद्ध और बेहतर हालत में हैं। इनमें ही लक्ष्‍मण मंदिर, जिसमें सर्वाधिक मैथुनरत प्रतिमाएं हैं, अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़ा है। प्रवेश द्वार के बराबर में ही महादेव मंदिर है जो खजुराहो का इकलौता ऐसा मंदिर है जिसमें आज भी पूजा-अर्चना होती है। कंदरिया महादेव, सूर्य मंदिर, विश्वनाथ मंदिर आदि इसी समूह का हिस्सा हैं।

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