Kailash Mansarovar – the most arduous pilgrimage on earth! where catching a breath is an enormous task

कैलास-मानसरोवर यात्रा (9 जून से 9 सितंबर, 2013)

एक महायात्रा है तिब्‍बत में कैलास-मानसरोवर (http://www.mea.gov.in/in-focus-topic.htm?85/Kailash+Manasarovar+Yatra+2013) की यात्रा। इस साल 9 जून से 9 सितंबर के दौरान भारत का विदेश मंत्रालय इस परम पावन तीर्थभूमि की यात्रा का आयोजन कर रहा है जिसे कुमाऊं मंडल विकास निगम और भारत-तिब्‍बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के सहयोग से कराया जा रहा है। अंतस की यात्रा है कैलास भूमि की यात्रा जो उत्‍तराखंड राज्‍य के दुर्गम इलाकों से होते हुए तिब्‍बत प्रदेश में स्थित इस ब्रह्मांड की धुरी माने जाने वाले कैलास पर्वत तक यात्रियों को ले जाती है। पिछले साल तक 25 से 27 दिनों में पूरी होने वाली इस यात्रा की अवधि इस साल घटाकर 22 दिनों की कर दी गई है ताकि यात्रियों के लिए यह अधिक कष्‍टप्रद न हो। कैलास मानसरोवर का पहला जत्‍था 9 जून को रवाना हो रहा है और दिल्‍ली-अल्‍मोड़ा-बागेश्‍वर-धारचूला-तवाघाट-मंगती-गला-बुधी-कालापानी-नभिढांग-लिपुलेख दर्रे से होते हुए चीन के स्‍वायत्‍त शासी प्रदेश तिब्‍बत में कैलास-मानसरोवर के दर्शनार्थ दुर्गम इलाकों की चुनौतियों को गले लगाते हुए आगे बढ़ेगा।

golden kailash

राजधानी दिल्‍ली से कैलास पर्वत (समुद्र तल 6690 मीटर) तक की लगभग 900 किलोमीटर की यात्रा, फिर कैलास और मानसरोवर झील की परिक्रमा पूरी करने के बाद यात्री उत्‍तराखंड से होते हुए लौटते हैं। इस अत्‍यंत दुर्गम यात्रा के लिए भारी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तैयारियों की जरूरत होती है। लगभग 1.5 लाख रु का खर्च इस यात्रा पर आता है जिसमें लगभग एक-तिहाई राशि चीन को वीज़ा शुल्‍क और तिब्‍बत में यात्रा की व्‍यवस्‍था के लिए देने होते हैं। विदेश मंत्रालय हर साल जनवरी में इस यात्रा के लिए प्रमुख अखबारों में विज्ञापन देता है, प्राप्त आवेदनों को कंप्‍यूटर ड्रॉ की प्रक्रिया से गुजारकर लगभग 1200 यात्रियों को चुना जाता है क्‍योंकि चीन सरकार सीमित संख्‍या में ही यात्रियों की इजाजत देती है। पूरे यात्रा मार्ग में लगभग 250 किलोमीटर का ट्रैकिंग मार्ग शामिल है। आईटीबीपी के साए में सुरक्षा और कुमाऊं मंडल विकास निगम लिमिटेड की खान-पान तथा रिहाइश की व्‍यवस्‍था भारत-तिब्‍बत सीमा तक इस यात्रा की पूरी जिम्‍मेदारी संभालती है। पिथौरागढ़-तिब्‍बत सीमा पर लिपुलेख दर्रे को पार करने के बाद तीर्थयात्री तिब्‍बत में प्रवेश करते हैं और वहां से आगे की जिम्‍मेदारी चीनी प्रशासन के हाथों में होती है।

a

कैलाश परिक्रमा मार्ग में यम द्वार – फोटो सौजन्‍य शम्‍मी अरोड़ा

कभी ह्वेन सांग तिब्‍बत से कश्‍मीर जाते हुए कैलास मानसरोवर इलाके से गुजरा था, उससे भी कई सौ बरस पहले सम्राट अशोक ने अपने दूत मानस खंड इलाके में भेजे थे। विख्‍यात हिंदू संत आदि शंकराचार्य ने भी मानस की यात्रा की थी और कहते हैं वहीं उनकी मृत्‍यु भी हुई। आगे चलकर मुगल शासक अकबर ने गंगा नदी के स्रोत का पता लगाने के लिए यहां अपने दूत रवाना किए थे जिन्‍होंने मानस क्षेत्र का विस्‍तृत अध्‍ययन कर यहां का मानचित्र भी तैयार किया था। 1812 में अंग्रेज़ पशुचिकित्‍सक विलियम मूरक्राफ्ट ने कैप्‍टन हियरसे के साथ इस क्षेत्र का दौरा किया और उनके यात्रा-वृत्‍तांत से इस पूरी यात्रा के दुर्गम मार्ग का विस्‍तृत ब्‍योरा मिलता है। देसी-विदेशी यात्रियों के इस इलाके में धार्मिक, भौगोलिक, भूगर्भीय अध्‍ययन, प्राकृतिक सौंदर्य को निहारने या प्राचीन समय में व्‍यापारिक-राजनीतिक कारणों से यात्राओं पर जाने के रिकार्ड मिलते हैं और आज भी सुदूर प्रदेशों से यहां आने-जाने का सिलसिला कायम है। अलबत्‍ता, 1959 में तिब्‍बत पर चीनी कब्‍जे के बाद साठ के दशक से चीन सरकार ने इस यात्रा पर पाबंदी लगा दी थी लेकिन दोनों देशों के बीच संबंध सुधरने के बाद 1982 से चीन ने इस यात्रा को दोबारा मंजूरी दे दी। चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग की हाल की भारत यात्रा के दौरान चीन ने कैलास यात्रियों को अपने क्षेत्र में वायरलैस सैट किराए पर देने और लोकल सिम मुहैया कराने जैसी घोषणाएं कर इस यात्रा के महत्‍व की ओर इशारा किया।

31

फोटो सौजन्‍य शम्‍मी अरोड़ा

हिंदुओं के अलावा बौद्ध, जैनी और बोन (तिब्‍बत में बौद्ध धर्म से पूर्व मूल धर्म) मतावलंबियों के लिए भी कैलास मानसरोवर परम तीर्थ है। सतलुज, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और करनाली नदियों के उद्गम स्‍थल कैलास मानसरोवर की यात्रा पर निकलना आनंदलोक की प्राप्ति की तरह होता है और शिव के धाम की यह अलौकिक तीर्थयात्रा किसी स्‍वप्‍नदेश में की जाने वाली परमयात्रा की तरह है।

21

नभिढांग से ओम पर्वत के दर्शन – फोटो सौजन्‍य शम्‍मी अरोड़ा

Advertisements