Kashi – a kaleidoscope of life

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हर शहर की अपनी फितरत होती है और अपना एक अलग मिज़ाज लिए होता है प्रत्‍येक शहर। संभवत: यही वजह है कि हर शहर हरेक के साथ अलग शैली में संवाद करता है। और बात जब शहरों के शहर काशी की हो तो उसकी फिज़ा में घुली अकड़, उसकी मस्‍ती, सुरूर, बेफिक्र तबीयत का जिक्र भी जरूरी हो जाता है।

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यों अब शहरों में जिंदगी भी कहां दिखती है, लेकिन काशी में जिंदगी के साथ-साथ मरण का गान भी सुनाई देता है। लगता है यह शहर मौत के साथ भी दिल्‍लगी करता है। दशाश्‍वमेध घाट से मणिकर्णिका घाट तक पहुंचने के लिए नैया को ज्‍यादा खेना नहीं पड़ता, मगर वरुणा और असी के संगम पर शांत भाव से बहती गंगा मैया की यह यात्रा जैसे जिंदगी से मौत तक के सफर का एक कैलाइडोस्‍कोप बन जाती है। धू-धू कर जलती चिताओं को देखकर यहां वैराग्‍य भाव नहीं पनपता बल्कि जिंदगी को और सलीके से जीने के समीकरणों की गुत्थियां खुलती हैं।

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मौका देव दीपावली जैसे असीम उल्‍लास से भरे पर्व का हो तो वाराणसी शहर अपनी पूरी संपदा जैसे दिल-खोलकर लुटाने पर आमादा होता है। कहते हैं इस शहर की गलियां और सीढि़यां जिसने नहीं नापी उसने शहर से कोई नाता नहीं जोड़ा। और यही गलियां, चौबारे, सीढि़यां और घाट देव दीपावली पर रोशनी से नहा उठते हैं।

 

अनाम, बेनाम, बदनाम हर गली, हर मोड़, शहर का हर कोना-कोना जैसे उत्‍सव की रौ में बहने लगता है।

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काशी में पहुंचना जैसे बीत चुके, रीत चुके वक्‍त में वापसी करने की तरह है। स्‍पेस और टाइम का फसाना यहां बाकी जगहों से अलहदा है, यह मानना पड़ेगा। कहीं पढ़ा-सुना था कि वाराणसी शहर किंवदंतियों और इतिहास से भी पुराना है, और यहां आकर सचमुच लगता भी ऐसा ही है। शहर की दरो-दीवारें जाने कितने ही अफसानों को अपनी परतों में छिपाए टिकी हैं। कचौड़ी गली से उठती महक हो या दशाश्‍वमेध तक उतराती सीढि़यां, अस्‍सी के चाय के अड्डे या फिर कोने-कोने में सिर उठाए खड़े पान के खोके, सभी कुछ तो काशी की खास फितरत के निर्माण में योगदान करते हैं। लेकिन फिर भी इसकी कल्‍चर को, इसकी आइडेन्टिटी को और इसके मतवालेवन को किसी खास डेफिनेशन में बांधा नहीं जा सकता। सचमुच बहुत पेंचोखम है काशी के …. 

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