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लाइफ ऑफ अभिलाष टॉमी ऑन महादेई

26 जनवरी की अलसायी सुबह जब हम में से कई उनींदी आंखों से टेलीविजन के परदे पर राजपथ पर परेड देख रहे थे, उसी दिन एक जांबाज़ हिंदुस्‍तानी नौसेनिक दक्षिणी अमरीका के धुर दक्षिण छोर में केप ऑफ हॉर्न के करीब से गुजरते हुए अपने अनूठे अंदाज में गणतंत्र मना रहा था। केप ऑफ हॉर्न से महज़ एक-डेढ़ मील के फासले पर जब इस जुनूनी ने तिरंगा फहराया तो वो इस लिहाज से अपने आप में एक रिकार्ड था कि हिंदुस्‍तानी सरजमीं से सबसे दूर यानी करीब 10 हजार मील परे दक्षिणी गोलार्ध में प्रशांत और अटलांटिक महासागरों के संगम पर इसे फहराया जा रहा था। इस समारोह के साक्षी बने कुछ एल्‍बैट्रॉस, शरारती डॉल्फिनें और सर्र-से  उड़ते जलकौवे। यह अनूठा गणतंत्र दिवस समारोह मना रहे थे भारतीय नौसेना में लेफ्टिनेंट कमांडर अभिलाष टॉमी जो एक नन्‍ही नौका ‘महादेई’ में सवार होकर धरती के दामन को समंदरों के रास्‍ते नापने निकल पड़े थे। नौसेना के इस अभियान – ”सागरपरिक्रमा II” की शुरूआत 1 नवंबर, 2012 को मुंबई पोर्ट से हुई थी और अकेले, बिना रुके, इस पूरे सफर में बिना किसी से बाहरी सहायता लिए पूरी धरती का चक्‍कर काटने (लगभग 20 से 22 हजार नॉटिकल मील यानी करीब 40, 000 किलोमीटर) के बाद महादेई अप्रैल 2013 के पहले हफ्ते में मुंबई लौटेगी। 

 

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चिली के तट के करीब ठंड में नहायी उस दोपहर अभिलाष ने अपनी नन्‍ही पाल नौका को केप ऑफ हॉर्न के काफी नज़दीक ले जाना चाहा ताकि उस ऐतिहासिक मुकाम की यादों को कैमरे में कैद किया जा सके। और वो हॉर्न के लगभग एक-डेढ़ मील तक के दायरे में पहुंचने में कामयाब भी हो गए। लेकिन आसमान में टंगे बादलों और केप को हर तरफ से घेरकर डेरा जमाए बैठी धुंध ने जैसे साजिश कर रखी थी कि उस पल को सिर्फ और सिर्फ अभिलाष की स्‍मृतियों में ही कैद किया जा सकता है ! अभिलाष ने केप का चक्‍कर लगा लिया था, समुद्री यात्राओं में यह उपलब्धि एवरेस्‍ट फतह करने जैसी है। बुलंदी को छूने पर जैसे आह्लाद और निराशा का भाव एक साथ जमा होता है, ठीक उसी तरह अभिलाष भी उस रोज़ कुछ निराश हुए। वो कहते हैं – ‘दरअसल, मेरे लिए यह एडवेंचरस समुद्री सफर उसी रोज़ पूरा हो गया था, उसके बाद तो सिर्फ घर वापसी बची थी।‘

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हालांकि सफर के रोमांच को बरकरार रखा इस बीच गुजरी कई तारीखों ने और घर-परिवार से दूर, इंसानी साथ से महरूम इस एडवेंचरिस्‍ट ने हर दिन को बेहद खास अंदाज में मनाया। बीते महीने 5 फरवरी को अभिलाष का जन्‍मदिन था, वो 34 साल के हुए और संयोग तो देखिए कि ठीक उसी दिन महादेई ने 34 डिग्री पश्चिम को पार किया। फिर वैलेंटाइन की बेला आयी तो अभिलाष की नौका प्राइम मेरिडियन को पार कर रही थी। उससे एक ही दिन पहले समुद्र में उफान इतना था कि लहरें महादेई को पांच-छह मीटर तक उछाल रही थीं। महादेई के फेसबुक पेज (https://www.facebook.com/www.mhadei.co.in) पर दर्ज है कि वो दिन उसके मौजूदा सफर में तब तक का सबसे खतरनाक दिन रहा है। किश्‍ती में रखा कुछ भी सामान अपनी जगह नहीं टिका था। समुद्र की तरंगे उस रोज़ इतनी उत्‍तेजित थीं कि बीस-बाइस फुट ऊंची छलांग लगा रही थीं और तरल पर्वत की तरह दिखने लगी थीं। ऐसे में किश्‍ती भी करीब 40 डिग्री तक तिरछी बनी रही। ऐसी बोट पर रहना किसी वॉशिंग मशीन की टंबल वॉश को झेलने जैसा अनुभव होता है। समुद्री पानी में उथल-पुथल का ही नतीजा था कि हर मुमकिन कोशिश करने के बावजूद नींद पूरे तीन दिन तक अभिलाष से रूठी रही थी। और तीसरे दिन जब भयंकर सिरदर्द ने उन्‍हें घेर लिया तो समुद्र भी चुप पड़ गया। वैलेंटाइन के दिन समुद्र ने जैसे अपनी नाराज़गी छिपा ली थी और एकाएक शांत हो गया। समुद्री लहरों ने यह अस्‍थायी विराम लिया था। 19 फरवरी को जब महादेई अफ्रीका महाद्वीप के धुर दक्षिणी तट यानी केप ऑफ गुड होप से गुजर रही थी, जो कि केप टाउन शहर के सिरे पर है और जिसके इर्द-गिर्द दो समुद्रों हिंद महासागर और अंध महासागर (अटलांटिक) का पानी मिल जाता है, तो एक बार फिर लहरों का आर्तनाद बढ़ गया, हवा की रफ्तार 130 किलोमीटर प्रति घंटा तक बढ़ गई और उस कश्‍ती की एक पाल भी क्षतिग्रस्‍त कर गई। अगले कुछ घंटों तक हवाओं की चिंघाड़ और गर्जना जारी रही। उस पूरे दिन हवाओं ने 80-90 किलोमीटर प्रति घंटा से शोर मचाए रखा था जो किसी का भी दिल दहला देने के लिए काफी होता है। अभिलाष पिछले हफ्ते झेले समुद्री कोप को भी इसके आगे भूल गए थे। हवाओं के शांत होते ही पाल की मरम्‍मत का काम करने अभिलाष मास्‍ट पर चढ़ गए, उस ऊंचाई पर चढ़ना भी कम रोमांचकारी नहीं था जहां से दूर-दूर तक फैले एकांत को बेहतर ढंग से देखा अभिलाष ने और अकेलेपन का बोध जैसे खुर्दबीन से देखने पर कई गुना बढ़ गया था। सागर के उस अनंत, अपार विस्‍तार में बस कुछ समुद्री पंछियों की आकाश में टहलकदमी दिख रही थी। ऊंचाई पर सर्द हवाओं का अहसास भी ज्‍यादा महसूस हुआ। अभिलाष ने अपने आध्‍यात्मिक मन को टटोला उस बुलंदी पर, अपने इष्‍ट देवों का स्‍मरण कर उस वीराने में भी मन के भीतर उत्‍सव का भाव जगाए रखा। वो कहते हैं कि समुद्री सफर बेहद खतरनाक, जोखिमपूर्ण और कभी कभी बेहद डरावने बन जाते हैं, मगर ऐसे में हमारा प्रशिक्षण, खतरों से बाहर आने की क्षमता, परिपक्‍वता और मानसिक मजबूती बहुत काम आती है। ऐसे मौके ही एक सेलर की परख भी करते हैं। 

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क्‍या समुद्र का अकेलापन उन्‍हें डराता नहीं होगा ? सबसे नज़दीकी इंसान भी हजारों मील दूर हो सकता है, क्‍या यह कल्‍पना उस इंसान को परेशान नहीं करती होगी जिसने पिछले चार महीनों से किसी इंसान का मुंह नहीं देखा है ? लाइफ ऑफ पाइ के प्रमुख किरदार के पास रिचर्ड पार्कर था जो समुद्र में घिर जाने पर उसका संबल बना था, लेकिन अभिलाष टॉमी के पास तो वो भी नहीं है। और उनसे जब इस बारे में हमने जी टॉक पर (महादेई का फेसबुक पेज, ब्‍लॉग का संचालन खुद लेफ्टिनेंट कमांडर अभिलाष टॉमी कर रहे हैं और अपने तमाम आधुनिक संचार उपकरणों, जिनमें जीपीएस, सैटलाइट फोन, लैपटॉप वगैरह शामिल हैं, की मदद से पीछे छूट गई सभ्‍यता से संपर्क बनाए हुए हैं) पूछा तो वो तपाक से बोले – ‘कोई डर नहीं है समुद्र की गोद में, महादेई पर मैं अपनी जिंदगी के सबसे बेहतरीन दिनों को गुजार रहा हूं। इसका एकांत मुझे बेहद प्रिय है। अभी कुछ रोज़ पहले की ही बात है जब मैं न्‍यूज़ीलैंड में एक ऐसे स्‍थान से गुजर रहा था जहां समुद्र थोड़ा उथला था। धीमी-धीमी हवा की रफ्तार के बीच महादेई भी जैसे हौले-हौले कुछ गुनगुना रही थी। मैंने उस शाम अपने ब्‍लॉग पर कुछ लिखना चाहा, लेकिन तभी आसमान पर एल्‍बैट्रॉस पंछियों का एक पूरा दल तरह-तरह के आकार में गुजरता दिखा, फिर सटाक से एक व्‍हेल हमारे करीब से गुजर गई, नज़दीक ही कुछ डॉल्फिन टहलती दिखीं। और इसी बीच खुले आसमान में चांद टंग गया, दूसरे कोने में सूरज ने भी विदाई का गीत सुनाया। और इतने ढेर सारे ‘व्‍यवधानों’ के बीच मेरी लैपटॉप स्‍क्रीन तरसकर रह गई। उस रोज़ मैं जैसे मौन हो गया था, वरना हर दिन फेसबुक और ब्‍लॉग के जरिए दुनिया को अपने हाल चाल सुनाता हूं।’

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गैब्रियल गार्सिया मार्खेज़ के उपन्‍यास ‘वन हन्‍ड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ और गोर्की की ‘मदर’ ने इस तूफानी सफर में इस नौसेनिक को मानसिक खुराक दी है। यों तो किताबें और भी कई हैं अभिलाष के पिटारे में लेकिन प्रशांत और अटलांटिक महासागरों पर हिचकौले खाती, कभी लहरों पर कूदती, संभलती, तिरती-तैरती किश्‍ती में सर्दीली दिन और रातों को पढ़ना थोड़ा मुश्किल रहा इस पढ़ाकू के लिए। फिर आए दिन मास्‍ट पर चढ़कर पाल की मरम्‍मत, कभी क्षतिग्रस्‍त पाल को बदलना, दिन भर की रिपोर्ट तैयार कर नौसेना मुख्‍यालय भेजना, खाना पकाना, कपड़े धोना, खुद की देखभाल .. जैसे ढेरों काम हैं जो एडवेंचर की खुराक लेने समुद्र में निकले अभिलाष को निपटाने होते हैं। 

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बैलेंटाइन और स्‍टीवेंसन के समुद्री एडवेंचर साहित्‍य की खुराक पर पले-बड़े हुए अभिलाष के युवा मन ने समुद्री सफर पर निकलने के कई सपने देखे थे। नेवी की नौकरी ने उस वक्‍त इस ख्‍वाब को पूरा कर दिया जब दो साल पहले महादेई पर ही ”सागरपरिक्रमा I” पर निकले कमांडर ढोंडे को सपोर्ट देने के लिए उन्‍हें चुना गया। और फिर तो एक के बाद एक मौके मिलते रहे। लेकिन सबसे बड़ा मौका उस वक्‍त हाथ आया जब पिछले साल इस अभियान के लिए उनके नाम को नौसेना ने मंजूरी दी। वे खुशी जाहिर करते हुए कहते हैं कि नौसेना ने न सिर्फ उनके भीतर छिपे एडवेंचरिस्‍ट को बाहर आने का यह शानदार मौका दिया बल्कि वह उनके ब्‍लॉग (http://sagarparikrama2.blogspot.in/) को भी सैंसर नहीं करती है और वो अपने हिसाब से अपने अनुभवों को इसमें दर्ज कर रहे हैं। 

समुद्र की ऊंची उठती लहरों के बीच अभिलाष टॉमी ने 9 फरवरी को एकांत के 100 दिनों का जश्‍न मनाया। तब तक इस सागरपरिक्रमा II अभियान के भी 15000 मील पूरे हो चुके थे। सागरपरिक्रमा की एक प्रमुख तकनीकी शर्त यानी तीन बड़े केप (अंतरिप) पार करने की कसौटी भी दो-तिहाई पूरी की चुकी थी। मुंबई से सफर की शुरूआत के सोलह रोज़ बाद पहली बार इक्‍वेटर पार किया था महादेई ने, और फिर 16 दिसंबर को पहली बड़ी केप यानी आस्‍ट्रेलिया में केप ल्‍यूविन को सायोनारा कर आगे बढ़ गई थी अभिलाष की किश्‍ती।

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12 फरवरी को महादेई ने नौसेना में 4 साल और समुद्र में कुल मिलाकर 70 हजार मील का हैरतंगेज़ सफर पूरा किया तो अभिलाष के साथ साथ उनके लगभग 35 हजार फेसबुक प्रशंसकों ने भी हैप्‍पी बर्थडे टू यू गुनगुनाया। महादेई का आकार बेशक छोटा है, मगर 56 फुट की इस किश्‍ती में वो सब सामान भरा गया जिसकी जरूरत इस जूनूनी सफर के दौरान पड़ सकती थी। पैकेटबंद प्रोसैस्‍ड फूड सामग्री डीएफआरएल (रक्षा खाद्य शोध प्रयोगशाला, मैसूर) ने तैयार की, ताज़ा फलों की जो खुराक मुंबई में लदायी गई थी उसने लगभग पन्‍द्रह दिन अभिलाष का साथ निभाया। और पॉपकॉर्न इस जांबाज़ की ‘इमोशनल खुराक’ थी मगर अफसोस कि उसका कोटा अभिलाष के जन्‍मदिन से पहले ही निपट गया और अब एक-तिहाई समुद्री सफर इस ‘संबल’ के बगैरही पूरा करना होगा। यह इस सफर का बड़ा ‘झटका’ साबित हुआ है जिसने अभिलाष के मनोबल को भी ठेस पहुंचायी।

महादेई में लगी समुद्री पानी को मीठे पानी में बदलने वाली मशीन के पिछले दिनों जवाब देने के बाद अभिलाष ने नहाने जैसे लग्‍ज़री से खुद को दूर किया। नहाने के लिए समुद्र का पानी सीधे ही इस्‍तेमाल में लाया जा सकता था लेकिन 4 डिग्री तापमान पर ऐसा जोखिम उठाना भारी भूल हो सकता था। और इस तरह पूरे 45 दिनों तक अभिलाष ने स्‍नान नहीं किया। ब्रश करने के लिए समुद्र का खारा पानी का इस्‍तेमाल करने और उसी पानी में कपड़े धोने से पानी की बचत होती रही है। बीते महीनों में न शेविंग हुई और न ही बाल कटे हैं। बस थोड़ी-बहुत ट्रिमिंग से काम चल रहा है। फरवरी के आखिरी सप्‍ताह में जब महादेई दक्षिण अफ्रीका और मैडागास्‍कर के बीच से होकर गुजर रही थी तब करीब 300 लीटर पीने का पानी उसमें बचा था, जो अगले एक साल तक के लिए काफी है। किफायत और प्‍लानिंग के इस समीकरण के चलते अभिलाष खुद को काफी सुरक्षित मान रहे हैं, और इस बीच नौका किसी वजह से बेहद खर्रामा-खर्रामा भी चली तो भी खाने-पीने की इतनी सप्‍लाई उसमें है कि वो किसी संकट में नहीं पड़ेंगे। सागर परिक्रमा की शर्त भी यही है कि वे इस दौरान किसी से भी बाहरी मदद नहीं ले सकते। यहां तक कि किसी पोर्ट पर न तो रुकना है और न कोई जहाज़ उन्‍हें मदद देने के लिए उन तक पहुंच सकता है।

जुनून और जज्‍़बे के इस सफर पर निकलने से पहले अभिलाष को और तमाम तैयारियों के बीच अपनी मां को विश्‍वास में लेना पड़ा था। अभिलाष नेवी में पायलट हैं और डॉर्नियर उड़ाते हैं, ऐसे में इस मुसीबतजदां सफर पर निकलने का तुक उनकी मां की ममता को समझ में नहीं आया था। पिता भी नेवी से रिटायर हुए हैं, लिहाजा उन्‍हें मनाना नहीं पड़ा। लेकिन पिछले बरस जब महादेई को रियो के तट से अकेले हिंदुस्‍तान तक वे ले आए तो मां के कोमल मन को मनाने का काम थोड़ा आसान हो गया था। 

 

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