Symphony of Life on Dal lake

डल पर ठिठका एक अजूबा संसार

कश्‍मीर कुदरत का करिश्‍मा है, तभी इसे रह-रहकर नज़र लग जाती है। डल पर हमारे घरौंदे ‘न्‍यू मून लाइट’ के केयरटेकर मंजूर का यह बयान मासूमियत से जितना भरा था, उतना ही सच्‍चा भी लगा। हाउसबोटों की इस बस्‍ती का सौंदर्य चिल्‍लै कलान (कश्‍मीर वादी में भयंकर ठंड के वो 40 दिन जो लगभग 20 दिसंबर के आसपास शुरू हो जाते हैं और जनवरी के अंत जारी रहते हैं) में और भी निखरकर आता है। रात भर में पारा गुपचुप गिरता है और कब डल की ऊपरी परत बर्फ की झीनी चादर ओढ़ लेती है, पता ही नहीं चलता। यानी रात में आप जिस डल में पानी का संसार देखकर नींद के आगोश में उतरते हैं, वो सुबह आपकी आंखे खुलने तक चांदी की परत बिछा लेती है। और इस पर यहां से वहां दौड़ते शिकारे वाले अपने चप्‍पुओं से चांदी की परत को तोड़ते हुए जिंदगी के कारोबार में फिर वैसे ही उलझ जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो।

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हमीदा अपनी छोटी-सी नौका में एलपीजी सिलेंडर लिए जाती दिखती है तो अहसान ने ट्यूशन का बस्‍ता टांग लिया है और सवार है अपनी नौका पर। बमुश्किल नौ साल का अमान भी पड़ोस में खेलने के लिए निकल चुका है, नौका पर .. अकेले ही उसे खे रहा है।

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बूढ़ा सुलेमान जैकेटों, ऊनी जुराबों, गरम जूतों और बैगों की भारी-भरकम पोटलियां सजाए हमारी हाउसबोट की तरफ बढ़ा चला आ रहा है। उसकी मोबाइल शॉप मेरे लिए अजूबा है, उससे सौदा निबटा भी नहीं था कि एक और नन्‍ही नौका हमारी हाउसबोट से आ सटी है, इस बार पम्‍पोर का केसर, शिलाजित, कश्‍मीरी शहद और काहवा बेचने वाला सौदागर सीधा हमारी बोट में चला आया है। दिनभर यही सिलसिला बना रहा है यहां, और तो और पूरी ग्रॉसरी शॉप भी एक शिकारे पर लदकर हमारे दरवाजे तक दो बार आ चुकी है। मैं उस दुकान को देखकर हैरत में हूं, बिस्किट, नमकीन, तमाम रंग-बिरंगे कोला ड्रिंक, च्‍युंगगम, टॉफियां, चॉकलेट, कापियां, पेन, पेन्सिलें, कॉफी, मिल्‍क पाउडर से लेकर सैनिट्री नैपकिन तक उसमें ठुंसे पड़े हैं। ‘यू थिंक इट, एंड वी विल हैव इट’ का सिद्धांत पूरी तरह कामयाब दिखता है इस मोबाइल बाजार में। शहरों में हम बाज़ार जाते हैं, मगर यहां बाज़ार उठकर हम तक आता है। डल का अर्थशास्‍त्र धीरे-धीरे खुल रहा है। कहने को तो हमारे शहरों में भी रेहडि़यों पर लदकर दुकानें हमारे घर-आंगन तक आती हैं, मगर उनमें वो रोमांस कहां जो डल झील पर तैरते-दौड़ते बाज़ार में दिखता है।

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यों रोमांसपूर्ण सफर की शुरूआत तो तभी से हो जाती है जब आप जमीन पर टिके ईंट-क्रंक्रीट के होटल की बजाय पानी पर रखी लकड़ी की हाउसबोट में रहने का फैसला करते हैं। हर हाउसबोट के साथ एक किस्‍सा जुड़ा है जैसे, हमने जिस हाउसबोट को चुना है वो पिछले तीस वर्षों से एक जर्मन महिला और उसकी बूढ़ी मां का ठिकाना रही है। कमरों में उस महिला की जवानी की तस्‍वीरें हैं तो हाउसबोट मालिक के जर्मनी प्रवास के चित्र भी टंगे हैं। मंजूर ने बताया कि उनके ये विदेशी मेहमान बरसों से नियमित यहां आते रहे हैं, बीच के कुछ साल जब कश्‍मीर ने पर्यटकों से मुंह मोड़ लिया था, उन वर्षों को छोड़कर वे हर दूसरे-तीसरे साल यहां डेरा डालती रही हैं। साथ में खड़ी हाउसबोट करीब 80 बरस पुरानी है, मंजूर ने कुछ बंबइयां फिल्‍मों के नाम गिना डाले जिनकी शूटिंग उसी पर हुई थी। मज़े की बात तो यह है कि हाउसबोट बाहर से देखने पर बेशक अलग-थलग दिखती हैं लेकिन पीछे से एक सिलसिला उन्‍हें जोड़े रखता है और उनके गलियारों से होते हुए आप जैसे डल की पूरी बस्‍ती का चक्‍कर लगाकर आ सकते हैं। आगे सैलानियों की सैरगाह और पिछवाड़े हाउसबोट मालिकों के ठिकाने।

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शिकारे से सैर पर निकलो तो जैसे डल का ओर-छोर समझ में आता है। कभी जो झील करीब 75 वर्ग किलोमीटर तक पसरी हुई थी, इन बीते दिनों में गंदगी, अंडरवाटर ग्रोथ और उपेक्षा ने उसे महज़  10-12 वर्ग किलोमीटर तक समेट डाला है। इस झील के सीने पर क्‍या क्‍या नहीं रहता। अगले हिस्‍से में सैलानियों का ठिकाना, पीछे दुकानों की लंबी कतारें जिनमें लखनवी चिकन भी बिकता है और कश्‍मीरी फिरन भी। शिकारा कुछ आगे बढ़ा तो हमारी आंखे फटी की फटी रह गई, पानी ने जिस थोड़ी-सी जगह पर जमीन का टुकड़ा छोड़ा था उस पर बाकायदा खेती-बाड़ी हो रही है। एक कोने में मिनी पोल्‍ट्री फार्म भी है। डल न हुई पूरा संसार हो गई! और डल की इस बस्‍ती की रौनक कहीं कम नहीं होती। टूरिज्‍़म का एक अलग फलसफा लिखती है यह झील। कहने को तो केरल में भी बैकवाटर-लैगून हैं, मगर उनमें और श्रीनगर की इस झील में कोई साम्‍य नहीं है। Image

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