smart travel ! Is it so, really?

टैक्‍नोलॉजी ने बदला ट्रैवल का समीकरण

जीपीएस और गूगल मैप का  षडयंत्र तो देखो,  रास्‍ता भटकने के मज़े से भी महरूम हो गया है

नए दौर का नया ट्रैवलर !

 

पिछले साल गर्मियों में हम जन्‍नत के सफर पर निकले थे। जन्‍नत यानी कश्‍मीर, लेकिन उस सफर ने सैर-सपाटे की हमारी पारंपरिक परिभाषा को बदल डाला। हमारे साथ आए परिवार के मुखिया की जेब में दो-दो स्‍मार्टफोन ठुंसे थे जिन पर पूरे रास्‍ते भर वो अपने बिजनेस को नई बुलंदियों पर पहुंचाते रहे थे। वो तो शुक्र था कि आसमान में 35 हजार फुट की ऊंचाई पर सिग्‍नल नहीं मिलता, वरना उनका वैकेशन जहाज में बैठने के बाद भी शुरू नहीं होता। दिल्‍ली से श्रीनगर की दो घंटे की उड़ान में शायद बीसियों बार वो घड़ी देख रहे थे, इस बीच, कई नोट्स और रिमाइंडर तैयार कर चुके थे, यहां तक कि साथ चल रही पत्‍नी और बच्‍चों से संवाद की बजाय वो रास्‍ते भर कभी अपने स्‍मार्टफोन पर तो लैपटॉप की बड़ी-बड़ी स्‍क्रीन में ही गुम रहे। वैकेशन के नाम पर जहाज़ या रेल में सवार होना, होटल में जाकर पसर जाना और टीवी की स्‍क्रीन के बाद लैपटॉप या स्‍मार्टफोन की स्‍क्रीन में खोए रहना बहुत से पर्यटकों का शगल होता है। पर्यटन की उनकी इस परिभाषा पर एतराज करने का हमें हक तो नहीं था, लेकिन बराबर ये सवाल उठता रहा कि आखिर इंसान घर से सैंकड़ों मील दूर सैर-सपाटे पर क्‍यों जाता है? काम की व्‍यस्‍तता, ऊब और बोरियत को तोड़ने की खातिर, ताज़गी की खातिर और नई मंजिलों को देखने-टटोलने के लिए या फिर टूरिज्‍़म पर भी काम का बोझ साथ लेकर चलने के लिए।

स्‍मार्टफोन और इंटरनेट के इस युग में बेशक, पर्यटन आसान बना है और रेल-जहाज की टिकटों से लेकर होटल की बुकिंग तक की ऑनलाइन सुविधा ने टूरिज्‍़म को नए आयाम दिए हैं, लेकिन इससे भी किसी को इंकार नहीं होगा कि इन गैजेट्स और नॉन-स्‍टॉप कनेक्टिविटी ने ही घुमक्‍कड़ी की असली फितरत को बदलकर रख दिया है। या मेरे जैसा पारंपरिक घुमक्‍कड़ तो यही कहेगा कि सैर-सपाटे के मकसद को काफी नुकसान पहुंचाया है इन गैजेट्स ने। स्‍मार्टफोन से ट्रैवल तो स्‍मार्ट बन गया, मगर कुछ नया पाने, नया देखने, नया महसूसने और कुछ अलग जानने का असली आकर्षण जाता रहा। अब मंजिल पर पहुंचने से पहले ही आप पूरी कवायद कर चुके होते हैं उसके बारे में सब कुछ जानने-समझने की, यहां तक कि होटलों की साइट आपको कमरों, रेस्‍टॉरेन्‍ट वगैरह का पूरा टूर भी करवा देती हैं। कमरे में बिछा पलंग कैसा होगा, बाथरूम का साइज़ क्‍या होगा और रेसोर्ट से बीच कितने मीटर की दूरी पर होगा, ऐसी तमाम जानकारी से लैस आधुनिक टूरिस्‍ट जब सफर पर निकलता है तो वो होता है ‘इन्‍फॉर्म्‍ड टूरिस्‍ट’। यानी पर्यटन की डिक्‍शनरी से ‘डिस्‍कवरी’ शब्‍द गुम हो चुका होता है। दूर-दराज की यात्राओं से पहले थोड़ा-बहुत होमवर्क कर लेने से भले ही सफर आसान बनता है, दिक्‍कतें घटती हैं और बेहतर प्‍लानिंग रास्‍ते की तकलीफों को काफी हद तक दूर भी करती हैं, लेकिन रास्‍ते भर जीपीएस, गूगल मैप्‍स में सिर घुसाए लोग भला सफरबाज कैसे बन सकते हैं। कार, रेल की खिड़की से बाहर झांका नहीं, रास्‍ते की घाटियों, झरनों, सड़क किनारे उगे सरसों के खेतों या गेहूं की पकी बालियों को निहारा नहीं तो कैसा सफर और कैसा वैकेशन ?

और जब बड़ों ने वैकेशन के मतलब अलग निकाल लिए हैं तो भला बच्‍चे कब तक पीछे रहेंगे! मेरे जन्‍नती सफर में साथ चल रहे बच्‍चे रास्‍ते भर लैपटॉप पर फिल्‍में देखने में मशगूल रहे या बाकी समय कान में आईपॉड की डोरियां ठूंसे रहे। कभी हवाईजहाज की खिड़की से बाहर तैरते बादलों के नज़ारे मुझे ललचा रहे थे तो कभी मंजिल के करीब पहुंचने से ठीक पहले बाहर दिखती हिमालयी चोटियों का अद्भुत नज़ारा देखकर पलक झपकना भी गवारा नहीं था, बच्‍चों का ध्‍यान उन चोटियों की तरफ दिलाना चाहा तो वो बस एकाध बार गर्दन उठाकर वापस अपने संसार में डूब गए। और आइपॉड या फोन पर म्‍युजि़क में खोए बच्‍चों को तो कुछ सुनना भी जैसे पसंद नहीं था। मुझे बचपन की वो रेलयात्राएं याद आ रही थीं जब पूरे रास्‍ते भर हम अपनी नोटबुक में दर्ज करते चलते थे कि कौन-सा स्‍टेशन कब-कितने बजे आया। मां-पिताजी की कोशिश रहती थी कि उस यात्रा के बहाने हमारा ज्‍याग्राफिया भी सुधर जाए। लेकिन सच तो ये है कि उन यात्राओं ने ही हमें प्रकृति पर मुग्‍ध होना सिखाया, कभी ट्रेन चंबल की घाटियों से गुजरती तो देश के सामाजिक-आपराधिक परिवेश को अपनी सीमित बुद्धि से जितना समझ सके, समझा।

आज का युवा एसयूवी में लॉन्‍ग ड्राइव पर निकलता है तो जीपीएस उसे बताता चलता है कि कब-कहां कौन-सा मोड़ काटना है। गूगल मैप्‍स उसका राहगीर बन गया है और ऐसे में रास्‍ते में रुककर किसी खोमचे वाले से, किसान से या यूं ही सड़क किनारे से गुजर रहे ग्रामीण से रास्‍ता पूछने के तमाम कारण भी खत्‍म हो गए हैं। यूं रुकना बस रुकना नहीं होता था, इसी बहाने दूसरे शहर-देहात की जुबान को सुन लेना, ज़रा थमकर वहां के नज़ारों को जी-भरकर आंखों में बसा लेना, या बस किसी अजनबी से बतिया लेने का जो आनंद हुआ करता था, वो आज के स्‍मार्टफोन ने चुरा लिया है। यहां तक कि रास्‍ता भटकने के मज़े से भी महरूम हो गया है नए दौर का नया ट्रैवलर !

कुछ मुसाफिर होटल में चेक-इन करने के बाद भी ईमेल चेक करते रहते हैं, दफ्तरी  औपचारिकताओं को निपटाने में या फोन चर्चाओं में उलझे रहते हैं, और तो और कई बार वीडियो कॉन्‍फ्रेन्‍स भी वैकेशन में जुड़ जाती हैं। ऐसे में कई बार साथ आए परिवार के सदस्‍य या यार-दोस्‍त मन-मसोसकर रह जाते हैं कि कब आपका दफ्तर सिमटे और सैर-सपाटा शुरू हो!

टैक्‍नोलॉजी के साथ संतुलन बनाना जरूरी है। खासतौर से सैर-सपाटे पर निकलें तो इस बात का ख्‍याल जरूर रखें कि गैजेट्स आपकी जिंदगी को आसान बनाने का जरिया हैं, उसे उलझाने या आपके साथ सफर पर निकले दूसरे लोगों को चिढ़ाने-खिजाने का माध्‍यम नहीं। ऑफिस के संपर्क में रहना बहुत जरूरी है तो सुबह-शाम कुछ वक्‍त तय कर लें जब आप फोन पर उपलब्‍ध रहेंगे, एसएमएस से संपर्क में रहें और दिनभर उस नई मंजिल को देखें-जानें जहां आए हैं।

सोशल नेटवर्किंग ने घुमक्‍कड़ी को एकदम नया स्‍वरूप दिया है। अब वैकेशन पर निकलने से पहले, कई बार तो कई-कई दिन पहले स्‍टेटस अपडेट के जरिए यह बताने की कोशिश हमारे नए दौर के घुमक्‍कड़ों की रहती है कि उनका वैकेशन अड्डा क्‍या होगा। फिर एक रोज़ अगला अपडेट आता है जो बताता है कि उड़ान पकड़ने के लिए किस हवाईअड्डे पर खड़ा है हमारा आधुनिक मुसाफिर, दो-चार घंटे के बाद अगला अपडेट जो विमान से उतरने और एक नई सरजमीं पर पहुंचने की सूचना होता है। इसी क्रम में रेसोर्ट की तस्‍वीरें, समुद्री लहरों में मस्‍ती करते अधनंगे बदन, बियर की बोतलों के बीच यार-दोस्‍तों के कहकहों को अपडेट करने की पूरी कवायद सोशल नेटवर्किंग पर बनी रहती है। कब, कहां, क्‍या खाया, क्‍या पीया इसकी तफसील से पूरी जानकारी ईमानदारी से दर्ज होती रहती है। सनसेट के नज़ारों की दिव्‍य अनुभूति अब शायद सहयात्री के साथ उतनी नहीं बांटी जाती जितनी फेसबुकिया दोस्‍तों के साथ साझा की जाती है।

सोचती हूं, हमारा नया मुसाफिर सचमुच सफर पर निकलता भी है, या बस वहीं अटककर रह जाता है, जहां हर रोज़ जीता है !

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