Leh-ladakh : Roads to heaven!!

सेब के दरख्त और खुबानी की मिठास
लेह में पर्यटन का अहसास नया-नया!!

लेह की शुष्‍क हवा को ठेंगा दिखाने के लिए हमारे पास लिप साल्वे की एक शीशी जरूर थी जो होंठो को सूखने से बचाने में तो कारगर थी लेकिन शरीर में भीतर तक घर कर चुकी शुष्‍कता का इलाज कतई नहीं थी। दरअसल, नमी यहां की हवा से नदारद है, उस पर ऑक्सीजन की कमी और सांय-सांय करती चिंघाड़ती हवाओं के तीर त्वचा को हर पल सुखाते रहते हैं। हमारी मेहमाननवाज़ी कर रहे बौद्ध लामा भिक्खु संघसेना ने हमारी इस शिकायत को दूर करने का दिलचस्प तरीका हमें सुझाया, और उसी का नतीजा था कि दोपहर के भोजन के बाद डैज़र्ट में लद्दाखी सेब और खुबानी का लुत्फ हमारी टीम ने जी-भरकर उठाया। और सेब भी कोई ऐसे-वैसे नहीं बल्कि सामने आंगन में खड़े बीसियों दरख्तों पर लटकते लाल-गुलाबी, हरे-सफेद कश्‍मीरी, लद्दाखी और हिमाचली सेबों पर जैसे हमने हमला बोल दिया था। दिल्ली, बेंगलुरु और नागपुर शहरों से आए हम सैलानियों के लिए यह किसी सपने की तरह था, हमें सेब कटने का सब्र नहीं था, बल्कि उनमें पैने दांत गड़ाकर जल्दी-जल्दी निगल जाने का जैसे कोई फरमान पूरा कर रहे थे। और लामा हमें देखकर बस मंद-मंद मुस्कुरा भर रहे थे!

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लेह की इस कैलेंडर ब्‍यूटी की मिसाल और कहां ? Pic By Ajay Rawat

लेह शहर से बाहर करीब 10 किलोमीटर दूर चोगलमसार में बने महाबोधि इंटरनेशनल मेडिटेशन सेंटर (http://mahabodhi-ladakh.org/) में पहुंचकर सचमुच लगता है जैसे वक्त ने थमने की मोहलत ले ली है। चारों तरफ लद्दाख पर्वतश्रृंखला के खाकी पहाड़ों से घिरे इस बसेरे में रुकने का हमारा इरादा था। अलबत्ता, अफसोस इस बात का था कि साल के इस भाग तक आते-आते (हम सितंबर में उस वक्त यहां यहां पहुंचे जब ’समर सीज़न’ अलविदा कहने का मन बना रहा होता है) यहां से देसी-विदेशी टूरिस्ट विदा ले रहे होते हैं और केंद्र की गतिविधियां भी अगले 6-7 महीने के लिए लगभग ठप्प होने को होती हैं। मेडिटेशन सेंटर के संस्थापक भिक्खु संघसेना ने बताया कि जून से सितंबर माह तक हर साल इस ध्यान केंद्र में टूरिस्टों की चहल-पहल रहती है और वो टूरिस्ट भी खास होते हैं। इस दौरान यहां ध्यान/विपासना, योग के शिविर लगते हैं। तीन दिन से लेकर 10-12 दिनों तक के ध्यान/योग प्रोग्राम मेहमानों के बीच काफी लोकप्रिय रहते हैं। हर दिन आध्यात्मिकता की खुराक के साथ-साथ सात्विक वेजीटेरियन खान-पान, फलाहार और यहां तक कि आपका मन हो तो नज़दीकी पहाड़ी की गोद में ‘तपस्या कुटी’ में एकांतवास की भी व्यवस्था आपको दिल-दिमाग से एकदम तरोताज़ा कर देगी। महानगरों की भांय-भांय से दूर इस मेडिटेशन सेंटर को आप अपनी अगली पर्यटन मंजिल बना सकते हैं।

लेह में सिंधु नदी का दीदार

लेह में घुमक्कड़ी का अंदाज़ देश के दूसरे इलाकों में सैर-सपाटे पर जाने से एकदम फर्क है। इस विषम जलवायु वाली धरती को अपने टूरिस्ट मैप में षामिल करने से पहले कुछ जरूरी बातों पर विचार जरूर कर लें। मैंने इंटरनेट को खंगालने, टूरिस्ट मैगज़ीनों को पलटने के क्रम में जब लेह को चुना था तो हरेक की भौंहे कुछ इस कोण में घूम गईं जो कम-से-कम यह जरूर पूछ रही थीं कि क्या हिमालयी ज़मीन के इस टुकड़े पर मौज-मस्ती मुमकिन है? सवाल वाजिब था क्योंकि देश के सुदूर उत्तर में बसा जम्मू-कश्‍मीर राज्य का यह हिस्सा ‘कूल हॉलीडे’ की सूची से अक्सर नदारद रहा है। बहरहाल, दिल्ली से महज़ 70 मिनट की उड़ान के बाद समुद्रतल से करीब 11,300 फुट की ऊंचाई पर स्थित लेह के नन्हे-से कुशाक बाकुला रिनपोछे हवाईअड्डे पर हमारा जहाज़ उतर रहा था। कहते हैं दुनिया की सबसे खूबसूरत हवाई यात्राओं में से एक है दिल्ली-लेह तक का सफर। लेह पहुंचने से करीब बीस मिनट पहले ही जंस्कार रेंज की बर्फानी ऊंचाइयां दिखायी देने लगती हैं जो आपको खिड़की से हटने ही नहीं देंगी। इसी रेंज में यहां की सबसे ऊंची नुन और कुन चोटियां भी स्थित हैं।

एक बात जो हैरान करती है वो है यहां चारों ओर भारतीय सेना की मौजूदगी, लगता है जैसे चप्पे-चप्पे पर सैनिक चस्पां हैं। बावजूद इसके सेना यहां बहुत सहज दिखायी देती है। और तो और यहां उनकी वर्दी भी खाकी, भूरी पर्वतमालाओं के साथ तालमेल करती दिखती है! देश के इस सीमावर्ती जिले की सड़कों पर घूमते हुए कई बार यह भ्रम तक हो सकता है कि यह ‘लोकल’ लद्दाखियों का ठिकाना है या सैनिकों का अड्डा ! लेह के नन्हे मार्केट में भी सेना की जिप्सी कभी फर्राटे से दौड़ती है तो कभी किसी कोने पर विदेशी टूरिस्टों को राह दिखाता कोई सैनिक दिखायी दे जाता है। इसी बाजार के एक कोने में पुरानी मस्जिद अपनी हस्ती को बखूबी दर्ज करा रही है, और सामने ही सिल्वर ज्यूलरी, वूलन, जैकेटों से सजी दुकानें हैं। बाजार का सबसे प्रमुख आकर्षण है इसकी फुटपाथ पर हर दिन सवेरे से शाम तक छोटा-मोटा हाट बाजार लगाने वाली स्थानीय लद्दाखी औरतें। आसपास के गांवों से खुबानी, गाजर, मूली, खीरा, सेब वगैरह लाकर बेचने वाली इन आदिवासी औरतों के चेहरों पर झुर्रियों ने जैसे एक पूरी किताब लिख डाली है। लंबी चोटियों में विचित्र ढंग से गुंथे उनके बाल, भारी-भरकम पारंपरिक आभूशणों और मोटे ऊनी वस्त्रों से ढका उनका बदन देखकर लगता है जैसे सदियों से वे इसी तरह यहां आकर अपनी टोकरियों में खुबानियों और सेबों का कारोबार करती आ रही हैं। बीच-बीच में कोई सैलानी रुककर खुबानी और सेब की खरीदारी में उलझता है तो कोई उनके अजीबो-गरीब रूप-रंग को कैमराबंद करने की इजाज़त मांग रहा है। और वो मुस्कुराकर हरेक के कैमरे में सिमट रही हैं!!

देश की राजधानी से लेह की भौगोलिक दूरी ज्यादा नहीं है लेकिन मानसिक दूरी के चलते यह इलाका हमेशा से काफी दूर लगता आया है। पिछले कुछ सालों में स्थिति धीरे-धीरे बदली है, करीब पांच-सात साल पहले यहां एयर इंडिया के अलावा जैट एयरवेज़ (हफ्ते में दो या तीन बार) की ही उड़ानें आया करती थीं लेकिन अब करीब-करीब सभी प्रमुख निजी विमानसेवाओं के ‘ पंछियों ‘ को लेह के आकाश में टहलकदमी करते हुए देखा जा सकता है।

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खारदूंग ला की सर्पीली सड़कों का नज़ारा


लेह से 42 किलोमीटर दूर है खारदूंग-ला टॉप यानी दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित सड़क। लेह से महज़ दो-ढाई घंटे के सफर के बाद, सर्पीली घूमती सड़कों को नापते हुए यहां पहुंचा जा सकता है। इस पूरे रास्ते में जगह-जगह साइकिल पर गुजरते कुछ जांबाज़ किस्म के सैलानी दिखना आम है। बीच-बीच में बाइकर्स की टोलियां गुजरती हैं जिनकी बाइक पर फहराते रंग-बिरंगे झण्डे बताते हैं कि स्वीडन, इस्राइल और डेनमार्क या नॉर्वे जैसे सुदूर देषों से एडवेंचर की घुट्टी पीने वे यहां आए हैं। लेह और इसके आसपास की घाटियां हों या आसमान तक पहुंचती बुलंदियां, ये तेजी से विदेशी टूरिस्टों के बीच लोकप्रिय हो रही हैं। यह बड़ा दिलचस्प पहलू है कि लेह ने ऐसे टूरिस्ट सर्किट में अपनी जगह बना ली है जिसे विदेशी सैलानी पसंद करते हैं। इसी सड़क से गुजरकर एडवेंचर की तलाश में ये सैलानी नुब्रा वैली निकल जाते हैं। खारदूंग-ला की 18,600 फुट की ऊंचाई जिस तेजी से हासिल होती है, खारदूंग-ला टॉप के बाद उतनी ही तेजी से सड़क नीचे उतरती है और त्सो-मोरिरि (झील) तक इन काफिलों से सड़कों पर रौनक बनी रहती है। बमुश्किल डेढ़-दो घंटे बीतते-बीतते आप फिर खुद को सपाट वादियों में पाते हैं। अब सड़क के दायीं तरफ से विशाल श्‍योक नदी इठलाती हुई साथ हो लेती है। आगे चलकर यह सियाचिन ग्‍लेश्यिर से आ रही नुब्रा से मिलती है और इस मिलन के बाद नदी को श्‍योक नाम मिलता है जो तुरतुक होते हुए पाकिस्तान और फिर अरब सागर से जा मिलती है। बीच-बीच में गांवों, खेतों का सिलसिला दिखायी दे जाता है, घरों और होटलों/रेसोर्टों को देखकर जरूर लगता है कि हम सभ्यता के बीच हैं, वरना तो दूर-दूर तक वीरानी और प्रकृति के नज़ारे ही दिखते हैं। जंगली गुलाब और सी-बकथॉर्न की झाड़ियों से घरों की चाहरदीवारी की गई है। किसी घर के आंगन में दरख्त पर सेब लटकते दिखते हैं तो किसी पर खुबानी टंगी हैं। कहीं-कहीं कच्चे, हरे अखरोटों से लदे पेड़ भी तनकर खड़े हैं। लेह की वनस्पति-विहीनता और भूरेपन से उलट यहां हरियाली दिखायी देती है।

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मध्‍य एशिया से कारोबारियों के साथ लद्दाख पहुंचा डबल हंप कैमल जो नुब्रा घाटी और आसपास के इलाकों में दिखता है Pic By – Ajay Rawat

लेह से एक सड़क चांग-ला (करीब साढ़े सत्रह हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित इस दर्रे से होकर दुनिया का तीसरा सबसे ऊंचा सड़क-मार्ग गुजरता है) की ओर बढ़ जाती है और आगे चलकर पैंगॉन्ग-त्सो (भारत-तिब्बत सीमा पर स्थित इस झील की लंबाई करीब 140 किलोमीटर है, इसका एक-तिहाई भाग भारत में जबकि शेष दो-तिहाई तिब्बत की सीमा में है) तक चली जाती है।

पैंगोन्‍ग लेक – कहते हैं मत्‍स्‍यकन्‍याएं इस झील में स्‍नान करने आती हैं Pic By Ajay Rawat

इस रूट पर भी बाइकर्स की टोलियां गुजरती हैं, कुछ उत्साही सैलानी होटल, रेसोर्ट में रुकने की बजाय टैन्टों में रुकना पसंद करते हैं। लद्दाख की हिमालयी धरती अपनी विषमता, विचित्रता और चैलेन्जिंग टेरेन की वजह से एडवेंचर के लिहाज से एकदम आदर्श है।

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