The Great Indian Monsoon – cloud chasing, Dreams and me!!

बादलों की मनमानी और मेरा मन

 

उस रात पहली बार बारिश “सुनी” थी। इससे पहले, बारिश देखी थी, बारिश में भीगी थी, बारिश से बची थी और कई बार बिन छतरी बरसात में पकड़ी भी गई थी। लेकिन रात भर पत्तियों पर टप-टप का शोर उस रोज़ पहली बार सुन रही थी। और तभी से बारिश से जो इश्‍क हुआ तो आज तक बदस्‍तूर जारी है। 2001 में गोवा का पहली बार दीदार हुआ था, और उस पहले सफर की पहली ही रात थी वो। मडगांव स्‍टेशन पर ही बूंदा-बांदी मिल गई थी, जैसे कोंकण भूमि पर हमारे स्‍वागत के लिए आ जुटी हो। स्‍टेशन से अपने ठिकाने तक की दूरी अब बेमायने लग रही थी और मेरी निगाह सिर्फ कार की खिड़कियों पर बहती पानी की पतली धारों पर टिकी थी। मेरे कान उस कार के वाइपर से पैदा हो रहे ‘शोर’ को सुनने पर जम चुके थे, ठीक उसी तरह जैसे कभी कुमार गंधर्व के स्‍वर में गूंजते मेघ-मल्‍हार को सुनने में खो जाया करते हैं। दिल्‍लीवालों को बरसात की वैसी आदत नहीं होती जैसी देश के इस हिस्‍से में गिरती है। बारिश वहां बरसती या टपकती नहीं है बल्कि छप्‍पर फाड़कर बहती है। गोवा की मानसूनी बारिश —- वल्‍लाह !!

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बारिश में जब मेरे मन के किसी कोने में यायावरी विचार कौंधा तो हर “शुभचिंतक” ने इसे सुनकर संभवत मेरी अक्‍ल पर तरस खाया था। छोटे बच्‍चों के साथ भला बारिश के मौसम में कोई घर से निकलता है? और वो भी इतने दूर के सफर पर ? दिल्‍ली से हमने करीब 2200 किलोमीटर का रास्‍ता नाप लिया था बरसात में भीगने के लिए। दिमागी दिवालियापन नहीं तो और क्‍या था ये ? कम-से-कम आम हिंदुस्‍तानी की निगाह में तो इस दीवानेपन को यही कहा जाता है। बहरहाल, वो बोलने से कब चूके और हमने उनकी बातों पर कान देने की परवाह कब की! चले आए एक रोज़ और बस फि‍र तो ऐसा सिलसिला बना कि हर दूसरे साल गोवा पहुंचने लगे। कई-कई दिन वहां बिताकर जब अपने शहर लौटते तो कई-कई दिनों तक गोवा की यादों में पड़े रहते। पहनावा, जुबान, अंदाज़, फि‍तरत और यहां तक कि चाल-ढाल भी कुछ समय तक तो बदली बदली रहती। गोवा की मस्‍ती का सुरूर तो घर लौटने पर बना रहता लेकिन उसकी बारिश की याद यहां ज्‍यादा आने लगी थी। एक साल जून का महीना गोवा में बिताकर लौटे तो यहां पाया कि जुलाई आधा बीत गया और मिट्टी से वो भीगी गंध ही नहीं उठी। ये दिल्‍ली शहर तो जैसे प्रकृति से ही शापित है। न बादल, न बारिश, न बर्फ और न तूफान।

 

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सुनते आए हैं कि दिल्‍ली और मानसून 29 जून को एकाकार होते हैं, होते होंगे कभी, अब तो नहीं होते। दिल्‍ली तरसती है, मेघ-मल्‍हार गाने को मचलती है। हर किसी की बातों का हिस्‍सा बना रहता है वो न आया मानसून और हल्‍की बूंदा-बांदी ही अखबारों की सुर्खियों में सज जाती है। इंडिया गेट से लेकर राजपथ, रायसीना हिल्‍स से लेकर राजीव चौक तक पर उमड़े बादल धड़ाधड़ कैमरा बंद होने लगते हैं। और बारिश है कि बरसती ही नहीं। लगता है हमें चिढ़ाने की खातिर यहीं कहीं आसपास छिप जाती है। अब कल ही की बात है, राजधानी के आसमान में बादल उड़ते दिखे, मगर थोड़ी ही देर में वो आवारा गुड़गांव होते हुए अलवर पहुंच गए। अब क्‍या इनका पीछा करना होगा, आत्‍मा की तृप्ति की खातिर ? एल्‍बर्ट फ्रेटर ने ‘चेज़िग मानसून’ में यही किया था। मानसून के हर तेवर को टटोलने बादलों के पीछे-पीछे हो लिए थे। वो सफरनामा यायावरी के संसार का अद्भुत टीला है, हिंदुस्‍तान के इस अजीबोगरीब, जटिल और रहस्‍यमयी मानसूनी तंत्र का इतना बारीक विश्‍लेषण कि लगता है ट्रैवलॉग और मौसम विज्ञान एक दूसरे में गुत्‍थम गुत्‍था हैं।

बारिश का एक रूमानी मिजाज़ शिलॉन्‍ग में दिखा था। न कोई शोर, न शरारत, न बादलों की गड़गड़ाहट और न ही बिजलियों की कड़क से आसमान दहकता है। बस चुपचाप बरसते हैं मेघ वहां। कभी उन्‍हें देखकर मन में ख्‍याल आता है कि वो सिसक रहे हैं, चुपचाप आंसू बहा रहे हैं तो किसी पल बारिश की खिलखिलाती बूंदे आंगन को तर कर रही होती हैं। चेरापूंजी की बारिश देखने पहुंची थी वहां। याद है अब भी कि घर से निकलते हुए मेरे कुल जमा आठ साल के बेटे ने पूछा था हम कहां जा रहे हैं तो मैंने उसे एकदम सहज अंदाज में बताया था कि बारिश से मिलने बारिश के घर जा रहे हैं। और वो अपनी आंखों में न जाने कितने सवाल लिए बस टुकुर टुकुर मुझे देखता रह गया था।

 

 

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