ऑफ सीज़न टूरिज़्म का मज़ा ही कुछ और है!

क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो नए साल की पूर्व संध्या पर अखबार में शिमला में बर्फ गिरने की खबर सुनते ही गाड़ी उठाकर शिमला की तरफ दौड़ पड़ते हैं? या फिर उन सैलानियों में से हैं जो सोचते हैं कि गोवा की सैर का असली मज़ा नए साल पर या कार्निवाल के दौरान ही मिल सकता है? या फिर आप उनमें से हैं जिन्हें बच्चों की गरमियों की छुट्टियों में ही टूरिज़्म सूझता है?

अगर इन तीनों में से किसी भी सवाल का जवाब आप ‘हां’ देते हैं, तो आपको सैर सपाटे की अपनी पॉलिसी अब बदल देनी चाहिए। बेशक, इन मंजिलों पर पीक सीज़न में काफी कुछ होता है लुत्फ उठाने के लिए, लेकिन यदि आप यहां ऑफ सीज़न में जाएंगे तो इनका एक अलग ही पहलू जान पाएंगे।

गोवा जाना हो तो मानसून भी बढ़िया वक्त है। हां, आपको भीगने से एलर्जी हो, या पत्तों पर गिरती टिप टिप बूंदों का रोमांस शोर लगता हो या फिर समुद्र तट पर बरसती मूसलाधार बारिश के बीच अपने पार्टनर के साथ भीगना ज़रा न सुहाता तो आप इस ऑफ सीज़न टूरिज़्म को भूल ही जाएं तो अच्छा होगा! लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो इस बार जब घूमने का मन हो तो जिस भी मंजिल पर जाएं वहां ऑफ सीज़न में जाने के बारे में सोचें। इससे कई फायदे होंगे। सबसे पहले तो हर सेवा सुविधा पर जमकर डिस्काउंट मिलेगा। होटल से लेकर टूर पैकेजों पर आकर्शक छूट आपका उत्साह बढ़ाने के लिए काफी है।

अब थाइलैंड की सैर का उदाहरण लें। वहां सीज़न में यानी नए साल के आसपास जाएंगे तो ट्रैवल पोर्टलों पर पैकेज टूर करीब 25-30 हजार रु/व्यक्ति के हिसाब से उपलब्ध होंगे। नवंबर से फरवरी तक वहां तापमान पूरे साल भर में सबसे कम रहता है और बारिष भी अपेक्षाकृत कम होती है, लिहाजा हर कोई उन दिनों में ही वहां जाना चाहता है। लेकिन मई के आखिर से वहां बारिश शरू हो जाती है जो अक्टूबर तक चलती है, इसका सीधा सीधा मतलब यही हुआ कि इस दौरान थाइलैंड का टूरिज़्म सुस्त पड़ जाता है, यानी टूरिज़्म सस्ता पड़ता है। मतलब बात बात पर डिस्काउंट! तमाम ट्रैवल पोर्टलों पर आपको थाइलैंड की यात्रा का अच्छा खासा पैकेज इन दिनों महज़ 18-22 हजार रु में मिल जाएगा।  थाइलैंड जाने की तमन्ना मन के किसी कोने में छिपा रखी तो उसे बाहर निकालें और इस सीज़न में सैर पर निकल जाएं।

यही बात आप लंदन के मामले में भी अपना सकते हैं। आमतौर पर भारत का अमीर तबका गरमियों में विदेशों की सैर पर निकल पड़ता है, उस वक्त वहां का मौसम भी सुहाना रहता है, और पूरे बाजार में सेल ही सेल लगी रहती है। समर सेल का यह आकर्षण ही है जो सैलानियों को उस तरफ मोड़ लेता है। दिन भी काफी लंबे हो जाते हैं, रात 10 बजे तक उजाला रहता है। जगह जगह आयोजनों की रेल-पेल भी रहती है। और इस लवली वैदर में हर चीज़ चुपचाप मंहगी हो जाती है। अगर आपने पहले से बुकिंग नहीं करायी तो हो सकता है अच्छी जगह ठहरने का इंतजाम भी न हो पाए। यानी लंबी प्लानिंग आपको करनी होती है। सीज़न में सैर सपाटै की एक यह कीमत भी चुकानी पड़ती है। कहीं भी जाना हो तो काफी पहले से योजना बनाओ, वरना न सफर के लिए टिकट होगा और न सिर छिपाने के लिए होटल की छत मिलेगी। इस तरह, पहले से काफी पैसा ब्लॉक करना पड़ता है। ऐसे में किसी वजह से प्रोग्राम में तब्दीली करनी पड़ जाए तो कैंसलेषन फीस के नाम पर अच्छी खासी रकम टूट जाती है। लेकिन इन दिनों जरूरी नहीं कि वहां जाने के लिए हवाई जहाज़ की टिकटें और होटलों में ठहरने के खर्च भी कम हों। अगर आप चाहते हैं लंदन जैसी मंजिल को अपनी ट्रैवल लिस्ट में षुमार करना तो समर सीज़न थोड़ा बीत जाने दें, सितंबर में अपना प्रोग्राम बनाएं। तब गर्मियों का मौसम अलविदा कह रहा होता है, और हवा में ठंडक घुलनी षुरू हो चुकी होती है, लेकिन वह इतनी होती है कि आप आसानी से उसे सह सकते हैं। हां, दिन तब भी 7-8 बजे से पहले नहीं ढलता। मगर पर्यटकों की भीड़ जरूर कम हो जाती है। टूरिस्ट सीज़न को ढलता देख आमतौर पर जगह जगह डिस्काउंट बढ़ा दिए जाते हैं, बचे खुचे टूरिस्टों को लुभाने के लिए स्कीम घोशित होती हैं। होटल मालिक से लेकर टूरिस्ट कोचों की संचालक कंपनियां तक टूरिस्टों के लिए कोई न कोई नई पेशकश करती हैं। ऑफ सीज़न में लंदन की सैर है न फायदे का सौदा!

यही हाल यूरोप के दूसरे देशों का भी रहता है। पर्यटकों के कम होने से बड़े होटल अपने किराये घटा देते हैं तो बजट होटलों /हॉस्टलों में भी कमरे आसानी से उपलब्ध होते हैं। लोकल टूरिस्ट इंडस्ट्री जाते सीज़न में जितना हो कमा लेना चाहती है, और ऐसे में टूरिस्टों के लिए अच्छी खासी पेशकश भी करती है। टूरिस्ट ऑफिस भी आपको पूरी तरजीह देते हैं। हां, अक्सर टूरिस्टों के प्रमुख आकर्षण जैसे कुछ खास शो, प्रदर्शनियां आदि ऑफ सीज़न में बंद हो जाती हैं। मगर जब बचत एक दो नहीं बल्कि कई सौ डालरों की हो तो यह कीमत कुछ ज्यादा चुभती नहीं है।

यूरोप की सैर विंटर में काफी सस्ती पड़ती है। पेरिस में आइफिल टावर में कदम रखने या लूव्र में टंगी मोनालिसा की पेंटिंग को निहारने के लिए आपको पीक सीज़न में घंटों लाइन में इंतजार करना पड़ सकता है और उसके बाद भी हो सकता है कि भीड़ इतनी ज्यादा हो कि आप वहां बस कुछ पलों के लिए ठहर सकें। लेकिन ऑफ सीज़न में आप चुपचाप खड़े होकर मोनालिसा को निहारते रह सकते हैं, जी-भरकर विंसी की कला की बारीकियों के बारे में सोच विचार कर सकते हैं और आइफिल टावर की ऊपरी मंजिल पर बने रेस्तरां में बैठकर शांतिपूर्वक घंटों अपने कॉफी मग के साथ गुजार सकते हैं।

अलबत्ता, विंटर टूरिज़्म के अपने कुछ नुकसान भी हैं। हो सकता है इन सर्द देशों का मौसम आपको रास न आए। शाम को क्या दोपहर में ही अंधेरा घिर आने से आपको चिड़चिड़ाहट महसूस होने लगे। लेकिन यहां भी आपकी पूर्व तैयारी अच्छी हो तो आप पूरा फायदा उठा सकते हैं। जैसे होटल से जल्दी निकलें, देर तक रजाई में घुसे रहने का मोह छोड़ना होगा। जल्दी षुरूआत करेंगे तो रोशनी का पूरा पूरा इस्तेमाल कर सकेंगे। खुद को गर्म रखने के लिए अच्छी तरह कपड़े पहनें, सिर और हाथ-पैरों को ढककर रखें, ताकि ठंड से बचाव हो। बड़े शहरों में कुछ न कुछ आकर्षण बना रहता है, लेकिन पर्यटन के लिहाज से कम महत्वपूर्ण छोटे नगरों वगैरह में ऑफ सीज़न में इंतजाम वाकई कम कर दिए जाते हैं। इसी तरह, सर्दियों में बीच रेसोर्ट अपने शटर गिरा देते हैं। और सबसे बड़ा नुकसान यह भी होता है कि दूसरे सैलानियों का संग साथ नहीं रहता। इन दिनों सड़कों पर ज्यादातर स्थानीय निवासी ही दिखायी देते हैं। यानी एकाकीपन की समस्या हो सकती है। पर आपके साथ यार-दोस्त हों, या परिवार का संग हो तो फिर अकेलापन भी कुछ नहीं कर सकता!

ऑफ सीज़न में सैर-सपाटा आपकी जेब के साथ साथ दिलो-दिमाग के लिए भी सुकूनभरा हो सकता है। गोवा में बारिश में हरियाली का अपना अलग ही सौंदर्य है, प्रकृति जैसे थिरकने लगती है। अलबत्ता, दूधसागर प्रपात जैसे खूबसूरत नज़ारों को आप देखने से वंचित रह जाएंगे क्योंकि इस प्रपात तक पहुंचने का रास्ता बंद हो जाता है। उधर, केरल में कोवलम तट पर मानसून का नज़ारा खास अंदाज़ लिए होता है। पूरे राज्य में जिधर भी निकल जाओ, नारियल के वृक्ष झूमते दिखते हैं, वनस्पति इतनी हरी-भरी हो जाती है कि पूरा केरल राज्य मानो हरे रंग की चादर में ढका होता है। इसी तरह, कर्नाटक में कुर्ग या फिर केरल में मुन्नार की सैर पर निकल जाएंगे तो आपको मानसून हॉलीडे के नए समीकरण पता चलेंगे। बेशक, इन दिनों यहां पैदल चलने पर ज़रा सावधान रहना पड़ता है, क्योंकि लीच से बचना होता है मगर उड़ते बादलों के घेरे जब आपको चारों ओर से घेर लेंगे तो लगेगा मानो प्रकृति भी आपके साथ लुका-छिपी का खेल खेलने को आतुर है। मुन्नार के बाद आप केरल के ही इडुक्की जिले में पेरियार वन्यजीव अभयारण्य जाएं और यहां बारिष के बाद हल्के, खुशनुमा हो चुके मौसम में वन्यजीवन के दर्षन करें। यहां भी आपको बरसाती कीड़ों, जीव जंतुओं से सावधान रहना पड़ता है। लेकिन जब प्रकृति प्रेमियों के सामने वनस्पति और वन्यजीवन की भरमार हो तो इसकी परवाह किसे रहती है।

ऑफ सीज़न में ये पूरा पूल है मेरा !

यही तो मज़ा है बारिश में उन जगहों में जाने का जहां बादलों की मेहरबानी कुछ खास होती है। और आपको तब इन पर्यटन ठिकानों का वो सौंदर्य दिखायी देगा जो आमतौर पर टूरिस्टों के सामने नहीं आ पाता। पीक सीज़न में जाने वाले पर्यटकों को इस बात का अहसास भी नहीं होता कि पार्टी, आतिशबाजी, मौज मस्ती, और हुड़दंग से अलग एक शांत, धीर गंभीर पहलू भी है गोवा का। और इसी रूप का दर्शन करना हो तो जून से सितंबर तक वहां जाएं।

केरल में भी मानसून में जाने का खास महत्व है। अगर आप मेडिकल टूरिज़्म का लाभ उठाने के इरादे से वहां जाना चाहते हैं तो मानसून से बेहतर कोई मौसम नहीं हो सकता। दरअसल, इन दिनों धूल-धक्कड़ नहीं होती और गीली मिट्टी, तथा हरियाली की चादर आयुवेर्दिक उपचारों को अधिक प्रभावी बनाती है।

यही बात तो पहाड़ों की सैर पर भी लागू होती है। बर्फ की मोटी सफेद चादर में ढकी एल्प्स पहाड़ियों की खूबसूरती सर्दियों में बयान से परे होती है। यूरोप में गर्मियां भले ही खुशनुमा होती हैं और पर्यटकों के स्वागत में हर बाजार बांहे फैलाए होते हैं, लेकिन सर्दियों में इन ठिकानों का रूप-रंग अलग कहानी कहता है। आपको तमाम ट्रैवल बुक्स में पर्यटन मंजिलों की जो तस्वीर आमतौर पर दिखायी देती है वह पीक सीज़न की होती है, और आपसे छिपा जो रह जाता है वो होता है ऑफ सीज़न का नज़ारा। ऐसे में आप ऑफ सीज़न में जाकर इन पर्यटन ठिकानों के बारे में खुद से कुछ नया जान सकते हैं। यानी एक रटे-रटाए टूरिज़्म से अलग पहलू सामने आता है।

गोवा में समुद्रतट पर शाम बिताने का इरादा हो और शैक हों इतने शांत तो क्‍या बात है !!!

आप नियमित हॉलीडे पर जाते हैं तो अब तक इतना तो जान चुके होंगे कि परिवार के साथ सुख सुविधा से सफर पर निकलने के लिए कम से कम दो-तीन महीने पहले से तैयारी करने की जरूरत होती है। अगर ऐसा नहीं किया तो रेल टिकट के लिए दलालों के चंगुल में फंसना पड़ता है जो आपसे 1000 रु की टिकट के बदले पूरे 2000 रु बेहयाई से झटक लेते हैं। नए साल का धूम धड़ाका गोवा में देखने का मन हो तो सितंबर में सोच विचार कर फाइनल प्रोग्राम बना लो और अक्टूबर में बुकिंग करा लो। वरना होटल के मामले में समझौता, रेल और हवाई जहाज की टिकटों पर आनन-फानन खर्च करना होगा। आप चाहेंगे ए.सी. थ्री टियर में यात्रा करना मगर एजेंट आपको स्लीपर की टिकट चौगुने दाम पर भिड़ाना चाहेगा, वो भी अहसान के साथ। ऑनलाइन बुकिंग के लिए आप घर में कई कई रातों की नींद उड़ाकर प्लानिंग करेंगे तो कभी दफ्तर का काम छोड़कर टिकट के सस्ते होने का इंतजार करेंगे। मगर टिकटों का दाम आपके देखते देखते आसमान छूने लगेगा।

गर्मियों में स्कूल कॉलेजों की छुट्टियां होते ही श्रीनगर, दार्जिलिंग, ऊटी, शिमला, मसूरी, नैनीताल और यहां तक कि उत्तराखंड में जिम कार्बेट से लेकर बिनसर, औली तक में टूरिस्टों की भरमार हो जाती है। यानी रेल-हवाई जहाज में टिकटें गायब, होटलों में कमरों का अभाव और गर्मियों में किसी हिल स्टेशन पर पानी का अकाल तो किसी में टैक्सी मालिकों की मनमानियां झेलनी पड़ती हैं। हर जगह मामूली सुख सुविधाओं तक की किल्लत साफ दिखाई देने लगती है। ये पर्यटक ठिकाने पर्यटकों के दबाव में जैसे जवाब देने लगते हैं। और इस सबके बीच जो पिसता है, कुढ़ता है, फिर कभी इन जगहों पर न आने की कसम खाता है, वह बेचारा टूरिस्ट होता है!

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