How to adapt to Ladakh climate/Acclimatisation

लेह है अगर आपकी अगली पर्यटन मंज़िल तो
एक्लीमेटाइज़ेशन (दशानुकूलन) को बखूबी जान लें!!

’लेह‘ नाम के साथ एक्लीमेटाइज़ेशन शब्द जैसे आत्मा के स्तर तक पर पिरोया गया है। समुद्र तल से करीब 11,500 फुट की ऊंचाई पर बसे लेह शहर आना हो तो एक्लीमेटाइज़ेशन के बारे में पूरी जानकारी पहले से हासिल करना न सिर्फ अच्छा रहेगा बल्कि यह जरूरी भी है। अक्सर ज्यादातर सैलानी यहां हवाई मार्ग से पहुंचते हैं, लेह का नन्हा-सा कुषाक बाकुला रिनपोछे हवाईअड्डा श्रीनगर और दिल्ली से सीधे जुड़ा है, दिल्ली से बमुश्किल 70 मिनट की उड़ान में आप खुद को व्यवस्थित करने और नाश्‍ता करने के तुरंत बाद जंस्कार की नयनाभिराम श्रृंखलाओं के ऊपर पाते हैं (सुबह-सवेरे की इन उड़ानों को पकड़ने के लिए आपको ब्रेकफास्ट विमान में ही करने के लिए तैयार रहना चाहिए, लेह से और लेह तक आने-जाने वाली तमाम उड़ाने प्रायः सवेरे 11.00 बजे तक निपट लेती हैं, क्योंकि उसके बाद अक्सर यहां चिंघाड़ती हवाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है)। कहते हैं दुनिया की सबसे खूबसूरत हवाई यात्राओं में से एक है दिल्ली-लेह तक का सफर। जंस्कार रेंज में ही सबसे ऊंची नुन और कुन चोटियां भी स्थित हैं। बीच-बीच में पहाड़ों के सीने को चीरती पतली-सी …… नदी की धार इस पूरे दृश्‍य में अजब रंग भरती है। लिहाजा, बोर्डिंग के समय विंडो सीट के लिए आग्रह करना न भूलें, यहां बच्चों जैसा उत्साही नज़रिया सचमुच यादगार अनुभव आपको दिलाएगा

जिनकी जेब में समय और पैसों की रेल-पेल होती है और सफर को दुरूह बनाकर चुनौतियों को गले लगाना पसंद आता है, वे अक्सर सड़क मार्ग को चुनते हैं। मनाली से लेह तक का 484 किलोमीटर लंबा सड़क मार्ग काफी कठिन, चुनौतीपूर्ण, थकाऊ मगर बेहद यादगार साबित होता है। एडवैंचर पसंद टूरिस्ट अक्सर मनाली, सारचू और उपशी होते हुए लेह आना पसंद करते हैं, और इसमें दो दिन का समय लगता है। इसी तरह, श्रीनगर से सोनामर्ग, द्रास, कारगिल होते हुए भी लेह में प्रवेश किया जा सकता है। इस रूट पर एक या दो नहीं बल्कि पूरे तीन दर्रे – जोज़ि ला, नामिका-ला और फाटु-ला से गुजरने का अपना ही रोमांच है। श्रीनगर-लेह हाइवे (नेशनल हाइवे नंबर 1ए) करीब 434 किलोमीटर लंबा है। सड़क मार्ग से आने का एक बड़ा फायदा यह होता है कि आपका शरीर धीरे-धीरे एक्लीमटाइज़ यानि इलाके की जलवायु, मौसम और परिस्थितियों के हिसाब से ढल चुका है। इसके उलट विमानयात्रा आपको घंटे भर में इतनी ऊंचाई पर पहुंचा देती है कि शारीरिक प्रणाली इस झटके को झेलने के लिए समय मांगती है।

9000 से 12000 फुट की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद अगले दो दिन अपने होटल/विश्राम गृह में ही गुजारें। अलबत्ता, उसी परिसर में हल्की-फुल्की सैर कर सकते हैं, लेकिन चढ़ाई से बचें। इंडियन माउंटेनियरिंग संस्थान, नई दिल्ली से जुड़े श्री टी श्रीधरण, जो खुद अनुभवी पर्वतारोही भी हैं, कहते हैं कि शरीर को एक्लीमटाइज़ करने के क्रम में अपने शरीर को सुनें। खूब आराम करें, ढेर सारा पानी पिएं, बार-बार पेशाब जाएं, इस प्रक्रिया को जितनी बार हो सके, दोहराते रहें। अमूमन हर 45 मिनट में आपको लू जाने की जरूरत महसूस होनी चाहिए, इतना पानी अवश्‍य पिएं। ’वॉटर थेरेपी‘ यहां बेहद काम आती है। दो दिन तक पानी, जूस (इसमें पानी मिलाकर पिएं, क्योंकि इस ऊंचाई पर ऑक्सीजन कम होने की वजह से पैकेटबंद जूस अक्सर कॉन्सन्ट्रेटेड हो जाते हैं), लैमन टी (ब्लैक टी से बचें क्योंकि इसकी वजह से डीहाइड्रेशन की आशंका बढ़ जाती है) और दूसरे तरल पदार्थों का खूब सेवन करें। एल्कोहल किसी भी रूप में नुकसानदायक ही रहती है, उससे जितना हो सके, बचें।

लेह में ऑक्सीजन का दबाव करीब 100 एमएम रह जाता है जबकि मैदानी भागों में यह 160 एमएम होता है। वातावरण की सघनता में होने वाली इस कमी के चलते पल्मोनेरी इडिमा/एक्यूट माउंटेन सिकनैस जैसी तकलीफ होती है, और अगर एक्लीमेटाइज़ेशन की प्रक्रिया को अपने आधे-अधूरे ढंग से ही निभाया होता है तो यह भी मुमकिन है कि सैर-सपाटे, मौज-मस्ती के आपके इरादे यहां चकनाचूर हो जाएं। इसलिए लेह-लद्दाख क्षेत्र में आने पर इस पक्ष की अनदेखी करने का जोखिम कतई न लें।

तीसरे और चौथे दिन 1.5 से 2 किलोमीटर तक की हल्की-फुल्की सैर कर सकते हैं, लेकिन खड़ी चढ़ाई से बचें। यहां के होटलों में आपको अक्सर एक संदेश बार-बार दिखायी देगा – डोन्ट बी ए गामा, इन द लैंड ऑफ लामा। इस संदेश की भावना भी यही है कि आप अपने शरीर को पूरी तरह इस नई परिस्थिति के मुताबिक ढलने दें, दुस्साहस से बचें, फिज़ूल का जोखिम न उठाएं और फिर आगे आपका सफर एकदम सुहाना बना रहेगा। पांचवे और छठे दिन आप 5 किलोमीटर तक पैदल चलने और करीब 300 मीटर की चढ़ाई हल्की रफ्तार से नापने के लिए तैयार हो चुके होते हैं।

अपनी छुट्यिों की प्लानिंग करते समय एक्लीमटाइज़ेशन के लिए 2-3 दिन अलग से रख लें, इस दौरान बोरियत से बचने के लिए आप टीवी देख सकते हैं, कार्ड के शौकीन हैं तो कमरे में ही उसमें समय बिताएं। पढ़ने-लिखने का शौक है तो आपको बोरियत हो ही नहीं सकती। अपने साथ अपना संगीत का पिटारा आप हर जगह ले जाते हैं, यहां भी उसे लाना न भूलें।

एक्लीमटाइज़ेशन की प्रक्रिया में खुद को मस्त रखें, दिमाग पर ज़ोर कतई न डालें, यह बिल्कुल मत सोचें कि आप बीमार हैं। बल्कि इसके उलट खूब हंसी-ठट्टे करें, यार-दोस्तों की मण्डली के साथ आए हैं तो एक-दूसरे को हंसाते रहें, मनोरंजन में डूबे रहें। इस तरह, जब आप खुद को तनावरहित रखते हैं तो रिलैक्सेशन की प्रक्रिया तेज होती है।

अन्य सावधानियां:

  •  ऊंचाई/अत्यधिक ठण्डे इलाकों में खुद को खुष रखने से आप जल्द-से-जल्द हालात के मुताबिक ढलते हैं
  •  योग, ध्यान, प्राणायाम या हल्के-फुल्के व्यायाम करते हैं, लेकिन खुद को थकाने से बचें।
  •  अगर बाहर हिमपात या अत्यधिक ठण्ड की वजह से आप कमरे/टैन्ट में सिमटकर रह गए हैं तो भी हाथ-पैर हिलाते रहें, चेहरे-गर्दन की मांसपेशियों को भी हिलाना जरूरी है।
  • बाहर निकलने से पहले सिर, पैरों और हाथों को अच्छी तरह से ढक लें।
  • आपके अंडर गारमेंट्स साफ-सुथरें हों, नाखून कटे हुए हों।
  • रात में सोने जाने से पहले शरीर पर मायस्चराइज़र लगाना न भूलें, पैरों की उंगलियों के बीच साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें, गीला न छोड़ें।
  • बाहर जाने से पहले कम-से-कम 30 एसपीएफ का सन लोशन शरीर के उन सभी भागों पर लगाएं जो खुले हैं, इसे कुछ देर त्वचा द्वारा सोखने दें, और उसके बाद ही धूप में निकलें।
  • यहां सर्द हवाओं की वजह से अक्सर होंठ फटने लगते हैं, लिहाजा अच्छी कंपनी का लिप ग्लॉस लगाना न भूलें।
  • ताज़ा, गरम भोजन करें।
  • अपने शरीर को इतना न थकाएं कि बहुत पसीने की वजह से आवश्‍यक लवण आदि बह जाएं। वैसे लेह-लद्दाख क्षेत्र में जब तक भी रहें, खुद को ज्यादा थकाएं नहीं।
  • जब भी बाहर निकलें, यूवी किरणों से पूरी सुरक्षा देने वाला सनग्लास अपनी आंखों पर जरूर चढ़ा लें।
  • माउंटेन सिकनेस के लक्षणों से राहत दिलाने वाली दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन ये इलाज नहीं हैं। लिहाजा, अगर आपको हाइ एल्टीट्यूड सिकनेस बनी रहे तो जल्द-से-जल्द ऊंचाई से उतरने की कोशिश करें।
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