Siachen trek – Once in a life time opportunity

31 अगस्त, 2011

जिन्दगी जो भी आपकी तरफ उछाले, बस उसे लपककर झोली में ले लो, अवसरों को अक्सर दोबारा एक ही दहलीज़ पर आकर दस्तक देने की आदत नहीं होती! मानसरोवर का अरमान पिछले दस सालों से मन के किसी कोने में छिपा रखा है, लेकिन उसकी जगह इस साल सियाचिन का बर्फानी विस्तार मेरे हिस्से आया है। दिल्ली में जुलाई 2011 में इस साल सियाचिन ट्रैक की चर्चा कानों में पड़ते ही मेरे मन के एक दूसरे कोने ने इस मौके को लपकने का हल्का-सा इशारा किया था। और आज सवेरे जैट एयरवेज़ की उड़ान से मैं लेह उतर चुकी हूं।

सवेरे 6.30 बजे दिल्ली के टी 3 एयरपोर्ट से उड़ान भरकर हिमालय की खूबसूरत बर्फानी चोटियों को पार कर 7.40 बजे हमारा विमान कुशाक बाकुला रिनपोछे की नन्‍ही सी हवाईपट्टी  पर उतरा।

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       लेह एयरपोर्ट उतरने से पहले बर्फीली जंस्‍कार रेंज का नयनाभिराम नज़ारा 

याद आया अभी पिछले सप्ताह कश्‍मीर के श्रीनगर हवाईअड्डे से दिल्ली की उड़ान पकड़ते समय कितनी तलाशी, कितनी सुरक्षा जांच के घेरों से गुजरे थे। लेकिन टी 3 पर औपचारिकताओं को निपटाने में बमुश्किल पन्द्रह मिनट लगे और इधर लेह के इस नन्हे से हवाईअड्डे पर भी लगा जैसे घर के आंगन में खड़े हैं। कोई झंझट, कोई झमेला नहीं। लाउंज से बाहर आते ही ’सियाचिन ग्लेश्यिर ट्रैक‘ के प्लेकार्ड लिए कुछ वर्दीधारी सैनिक इंतजार करते दिखायी दिए। सरकारी दामादों की सी खातिर का दौर अब शुरू हो चुका था। हमें सिर्फ खुद को लेह तक लेकर आना था, इसके बाद हर जिम्मेदारी भारतीय सेना ने उठा रखी है।

‘जब युद्ध नहीं लड़े जाते, तब सेना क्या करती है?’ अक्सर यह सवाल ज़हन में उठता रहा है। एक जवाब है इस तरह के आयोजन। शांति के दौर में इस तरह की गतिविधियों में सेना ने खुद को हमेशा से व्यस्त रखा है।

हवाईअड्डे से सिर्फ 1 किलोमीटर दूर स्थित लेह स्थित ट्रांज़िट कैंप में ’चांग ला‘ (मेरे कक्ष का नाम यही है!) में मुझे ठहराया गया। फ्रैश होने के क्रम से निपटी और सवेरे की बची-खुची नींद लेने की कोशिश में जुटी थी कि डॉक्टर मेडिकल जांच के लिए आ पहुंचे। ब्लड प्रेशर, पल्स रेट और ऑक्सीजन के स्तर की जांच हुई, मुझे खूब पानी पीने की सलाह दी गई, अलबत्ता, बी.पी. हमेशा की तरह सामान्य था। सेहत वाकई सबसे बड़ी नेमत है! इस बीच, विंग कमांडर (सेवानिवृत्त) टी श्रीधरण ने घंटी बजायी। और फिर तो एक के बाद एक सूचनाओं का पुलिंदा खुलता गया। लेह में एक्लीमटाइज़ेशन की हिदायतों पर एक लंबा सार-गर्भित विवरण, खान-पान, आराम और ढेर सारा पानी पीने का संदेश बड़े जोरदार अंदाज़ में उन्होंने दिया। और मैं तो ठहरी एकदम कॉपी-बुक स्टाइल में निर्देशों का पालन करने वाली। जुटी रही हूं दिनभर पानी का टैंक पेट में उतारने में। फिर एक अन्य अधिकारी का आगमन। इस बार टी-षर्ट, स्नो-बूट की माप के बारे में पूछताछ। साथ में थे कर्नल एस के त्रिपाठी जो इस ट्रैक की देखरेख के लिए तैनात हैं। आर्मी की व्यवस्था आपको सचमुच वीआईपी अहसास कराकर ही रहेगी, ऐसा मुझे लग गया था। अर्दलियों की रेल-पेल, स्वास्थ्य जांच, हाल-चाल की पूछताछ, आगे के सफर के बारे में जानकारी और कुल-मिलाकर आपको सहज रखने की हर कोशिश  यहां की जा रही है। इस बीच, दरवाजे से एक और अर्दली घुसता दिखा, उसके हाथों में ’राशन‘ की ट्रे है – बादाम, नमकीन काजू, चॉकलेट, एक्लेयर्स, टॉफियां, रियल ऑरेन्ज जूस, एक अन्य जूस का छोटा पैक। उफ्, लगता है वज़न कम करने का सारा ब्रह्मचर्य यहां टूट जाएगा! मैं अपने साथ घर से सिर्फ टॉफियों का एक पैकेट लायी हूं, दरअसल, 2008 के बैच में सियाचिन ट्रैक पर आ चुकी पत्रकार ऋतु शर्मा से एक रोज़ सारी जानकारी ले ली थी, और उसी ने बताया था कि यहां से ढोकर कुछ मत ले जाना, वहां ओवरफीडिंग के लिए तैयार रहो! सचमुच ठीक कहा ऋतु ने।

बहरहाल, करीब घंटे भर के इस सिलसिले के बाद सब लौट गए हैं, मैं एक बार फिर बिस्तर में घुस गई हूं। आज यहां तापमान करीब 30 डिग्री है, काफी गर्म है, सिर्फ सूती कपड़े में हूं। लेकिन कमरे में घंटा भर गुजारने के बाद ठंडक का अहसास बढ़ रहा है। बड़ी अजब जगह है यह – धूप में आपको टैन हो जाएगा और छाया में फ्रॉस्ट बाइट तक हो सकती है। फिलहाल लेह में फ्रॉस्ट-बाइट वाला मौसम तो नहीं है, अलबत्ता हल्की कंपकपी महसूस हुई। रजाई में घुस गई हूं, नींद उचाट है, सो कैमरे से कुछ देर उलझने का मन बनाया। आज सवेरे लेह में उतरने से पन्द्रह-बीस मिनट पहले जंस्कार पर्वत-श्रृंखलाओं का नज़ारा देखा, जो बयान से परे लगा, उसे मैंने कैमरे की मेमोरी में कैद कर लिया था। यहां आने से दो रोज़ पहले कैमरा हैंडलिंग सीखी है, उसकी तमाम तकनीकियों के साथ। फोटो ट्रांसफर किए। अपनी पीठ खुद ही थपथपा ली, पहली बार इस डीएसएलआर कैमरे को स्वतंत्र रूप से हैंडल किया है। मेरी भी अजब स्थिति है, मुझे छोड़कर परिवार के हर सदस्य को फोटो उतारने का बेइंतहा शौक और समझ है। और मैं हूं परिवार की ’द मोस्ट फोटोग्राफ्ड सब्जेक्ट‘। बहरहाल, इस यात्रा में यह सिलसिला भी टूटा। और कौन-कौन सी रवायतों के चेहरे बदले, इसका जिक्र फिर कभी।

दोपहर के भोजन के बाद एक बार फिर बिस्तर की शरण ली है, लेकिन फोन और एसएमएस की कतार ने नींद को बार-बार आंखों से भगा दिया। नतीजा, षाम 6 बजे तक सिर में दर्द की लहर सी महसूस होने लगी। कमरे के बाहर देखा कि श्रीधरण एक बार फिर कुछ अन्य ट्रैकर्स के साथ जमा हैं और अपने खास अंदाज़ में अपने जिए अनुभवों का बयान कर रहे हैं। आईएमएफ से संबद्ध श्रीधरण शायद करीब साठ बरस के होंगे और लगता है उन्होंने जिंदगी के पहले दिन से ही ट्रैकिंग शुरू कर दी थी! हर ट्रैक रूट के बारे में इतने सुलझे ढंग से जानकारी देते हैं कि मन सवाल करता है – अब तक तूने किस राग में जिंदगी काटी? उनकी बातें अनुभवों का खजाना होती हैं, सो मैं भी झटपट कपड़े बदलकर उस ग्रुप में षामिल हो गई हूं। ’चांग ला‘ से दायीं ओर नज़र पड़ती है तीन चोटियों पर – पहली स्तोक कांगड़ी, पर्च (Perch) कांगड़ी और अंतिम गुलाप कांगड़ी। हमारे इस परिसर से चारों तरफ नंगी, भूरी पर्वत श्रृंखलाओं की घेराबंदी है, इनके ठीक पीछे कराकोरम रेंज का विस्तार है। और दायीं ओर नज़र घुमायी तो चांद का वो नज़ारा दिखायी दिया जो शहरी आसमान अक्सर निगल जाता है। आज ईद है और मैंने पहली बार  ’ईद का चांद’ देखा। मेरे मुंह से चांद का जिक्र निकला और फिर तो एक-एक कर कइयों के कैमरों में वो चांद सिमट गया। लगता है शर्मिला होता है आज का चांद, कुछ ही मिनटों बाद चुपचाप गायब भी हो गया। आज पहली बार  ‘ईद के चांद हो गए हो ’ मुहावरे को शब्दों के सांचे में साकार होते देखा!

देखते हैं लेह और फिर सियाचिन का यह सफर आगे क्या-क्या दिखाएगा!

– रात 23.10 बजे (शाम से सिर दर्द बना रहा, रात में 8 बजे के आसपास हल्की बदहजमी महसूस हुई, मगर खुद को घसीटकर मैस ले गई जहां भरपूर भोजन किया, अब लौटने पर इस अंश को पूरा किया है और खुद को हल्का महसूस कर रही हूं – दिमाग से और शरीर से भी!)

01 सितंबर, 2011

10.40 बजे हैं, गो-एयर का एक विमान धड़धड़ाते हुए ठीक सामने के आसमान से गुजरा है, संभवतः आज की अंतिम उड़ान हो। इन दिनों यहां देशी विदेशी (विदेशी अधिक) सैलानियों की चहल-पहल है, लिहाजा लगभग 6 उड़ानों का हर रोज़ संचालन किया जा रहा है। सर्दियों तक आते-आते यह आंकड़ा लुढ़कर बमुश्किल तीन-चार रह जाता है। मेरे ‘चांग ला’  के सामने ही सेना और वायुसेना का ठिकाना है। सुबह से ही हेलिकॉप्टरों का उड़ान अभ्यास देख रही हूं। हवाईड्डा भी नज़दीक है, लिहाजा हर पल किंगफिशर, इंडियन, जैट के विमान और इन हेलिकॉप्टरों के चीते जैसे शरीरों से आसमान गुलज़ार है। कमरे में अकेली हूं, परिवार-दोस्तों से दूर भी, लेकिन इस बार अकेलेपन ने अब तक तंग नहीं किया है। हवा को चीरते हुए विमानों का गुजरना रौनक बनाए हुए है। और दोपहर बाद हवाओं की जंगली सांय-सांय शुरू हो जाती है। हवा यहां बहती नहीं, चिंघाड़ती है। डराती है, धमकाती है। कल शाम परिसर में ही थोड़ी टहलकदमी के दौरान अहसास हुआ जैसे हमें सशरीर उड़ाकर ले जाने का इरादा भी है इन हवाओं में !

10.50 बजे हैं, किंगफिशर का विशालकाय विमान मस्ताना अंदाज़ में सामने से गुजर रहा है, तो यह है आज की अंतिम उड़ान।

आज का दिन भी एक्लीमेटाइज़ेशन के नाम होने जा रहा है। और मैं परम भक्त की तरह पूरा पालन करने में लगी हूं, आशंकित हूं कि कहीं कोई कोर कसर रह गई तो आधे सफर से ही लौटना न पड़ जाए। इसलिए नो रिस्क।

रात 23.30 बजे

एक्लीमेटाइज़ेशन की कड़ी में आज सलमान खान भी शामिल हो गया। आयोजकों ने संभवतः महसूस किया कि यह उत्साही जत्था अब तक बोर हो गया होगा, लिहाजा शाम नज़दीकी ऑडिटोरियम में सलमान की हालिया प्रदर्शित फिल्म बॉडीगार्ड दिखाने का कार्यक्रम बनाया। इस पर इतना ही।

आज की चिकित्सा जांच में डॉक्टर ने मुझे ‘नॉर्मल’ घोषित कर दिया। सेकिंड राउंड की जांच वाले अधिकारी ने तो कह डाला कि अब आपकी चिंता मुझे नहीं रह गई है। वाउ!!!!!!!!!!!!!

07 सितंबर, 2011

शाम के करीब साढ़े सात बजे थे, सूरज पता नहीं किस दिशा से कब विदाई ले चुका था, हम उत्तर की तरफ लगातार बढ़ रहे थे। बायीं तरफ नुब्रा कभी मदमस्त चाल से गुजरती दिख रही है तो कभी शरारती अंदाज़ में कूद-फांद कर रही है। नुब्रा यहां साल्तोरो पर्वतमाला की गोद में टहलती हुई सियाचिन ग्लेश्यिर से आ रही है।

बायीं तरफ भी नज़ारा कुछ कम नहीं है। ऊंचे-नीचे, टेढ़े-मेढ़े पहाड़ अजब-गजब आकार और रंगों में दिख रहे हैं। कहीं कहीं तो इन पहाड़ियों को देखकर लगता है जैसे किसी ने रंगों की कूची फेर दी है। सेडिमेंट्री चट्टानें हैं, कहीं भूरी, कहीं गहरी भूरी और कहीं लाल। दोनों ओर प्रकृति के नज़ारें हैं और बीच में हमारी गाड़ी दौड़ रही है। दिनभर की थकान हरेक पर हावी है, सो हर किसी की बोलती बंद है। सिर्फ गाड़ी की आवाज़ सुनायी दे रही है। बेस कैम्प/स्नाउट की दूरी बता रहे मील के पत्थरों पर बार-बार निगाहें ठहरती हैं। दिनभर सफर का आनंद लिया है लेकिन अब मंजिल का बेसब्री से इंतजार है। खिड़की से बाहर देखती हूं तो ठिठक गई हूं, क्या आसमान अपने सितारों के संग पहाड़ों की पीठ पर लदा है या फिर पहाड़ों ने ही कद बढ़ा लिया है और आसमान से गले मिल रहे हैं? दोनों के बीच की दूरी लगभग नदारद है, कहीं कहीं तो यह भ्रम भी हुआ जैसे पहाड़ के गाल पर दमकते सितारे आ चिपके हैं। बाहर के अंधेरे में आंखें गढ़ाकर देख रही हूं, असलियत क्या है, ये हमारी सेना की सक्रियता तो नहीं, कहीं कोई बल्ब, टावर वगैरह तो नहीं है? बहुत दूर तक यह सिलसिला चला तो लग गया कि सचमुच आसमान और पहाड़ों ने यहां हाथ मिला रखा है! इस हसीन रात की यादों को आंखों में जी-भरकर उतार रही हूं, स्मृतियों में कैद रखने की भरपूर कोशिश भी है। अचानक तेन्ज़िंग के चेहरे पर नज़र जाती है, ये क्या? उसे झपकी आ गयी है। मैंने चौंककर अगली सीट पर बैठी मंजुल को सतर्क किया – उसे जगाओ, वो सो गया है!!!!!!! तेन्ज़िंग हमारी ज़ायलो की कमान को सवेरे से थामे हुए है, 21 साल का छोटा-सा लद्दाखी युवक हमारे शोर से जाग गया है। बस पल भर को उसकी आंखें मुंदी थी। लगभग 10 घंटे होने जा रहे हैं हमारे इस सरपट सफर को, थकान लाज़िमी है। लेकिन इस घटना के बाद से अगले करीब आधे घंटे तक यानी बेस कैंप पहुंचने तक के क्रम में मैं प्रकृति को लगभग भूल गई हूं। लगातार रियर व्यू मिरर से तेन्ज़िंग पर निगाह रख रही हूं। हर कोई आश्‍वस्त हो गया था कि इस थकान के बीच एक जोड़ी निगाह है जो अब भी सतर्क है!

दूर से कुछ बत्तियां झिलमिलाने लगी थीं। हमारी अटकलों को विराम दिया लेफ्टिनेंट सुधीर ने – यही बेस कैंप है। हिंदुस्तान की सेना का सियाचिन के भूगोल-इतिहास को सहेजकर रखने के क्रम में पहला अड्डा। गाड़ी जैसे-जैसे उस ओर बढ़ रही है, देखती हूं कि शुरू में दो-चार बत्तियों का सिलसिला लगातार अपना दायरा बढ़ा रहा है, और नज़दीक पहुंचकर स्पष्‍ट हो चुका था कि यहां अच्छी-खासी एक बस्ती है। मन ने कहा – सवेरे देखेंगे इस बस्ती की गलियां-चौबारे, फिलहाल तो बस गरमागरम थुकपा और एक बिस्तर मिल जाए! मेरी हिम्मत तो देखिए, ग्लेश्यिर के मुहाने पर भी थुकपा का स्वाद जीभ नहीं भूली है! कल रात लेह में अंतिम रात गुजारी थी, उसी मौके को कुछ यादगार बनाने की खातिर शाम  लेह मार्केट आयी, साथ में मंजुल और उसका भाई अविचल भी हैं। इस छोटे से शहर की छोटी सी गलियों में सामने से रमेश अमृतराज भी टकरा गए, रमेश को हम

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शाम आर्मी अस्पताल (हाइ आल्टीट्यूड मेडिकल रिसर्च सेंटर) में अलविदा कह आए थे। दरअसल, बेस कैम्प रवानगी से पहले दिन में इसी अस्पताल में हमारी मेडिकल जांच हुई थी। हमारे दल में रमेष और मैं पल्स रेट काफी अधिक होने की वजह से अटक गए थे और हमें शाम को दोबारा आकर जांच कराने की सलाह दी गई थी। शाम की जांच ने सुकून दिया, हमें पास कर दिया गया। बस, वहीं से मैं अविचल के संग मार्केट आ गयी (वो भी दाएं पैर के तलवे में शू बाइट से हलकान होने की वजह से अस्पताल की शरण में था), मंजुल पहले से ही बाजार की खाक छानती फिर रही थी। उसे चांदी के आभूशणों के कुछ एक्सक्लुसिव नमूनों की तलाश थी। घूमते-टहलते हुए मुझे साइबर कैफे दिख गया है, कुछेक ईमेल और ऑनलाइन पेमेन्ट से निपटना है, सो घुस गई हूं कैफे में। नथुनों में अजीब सी गंध समा गई है, लेह में यह खास गंध शायद बटर-टी, मोटे-भारी ऊनी कपड़ों, कार्पेट, मीट-मांस और शायद कई-कई दिन बिना नहाए शरीरों की मिली-जुली गंध का नतीजा है, अक्सर जगह-जगह महसूस कर चुकी हैं। बहरहाल…. कोई 20-25 मिनट में कैफे के झमेले से आजाद हूं (ऑनलाइन दुनिया कितनी थोथी होती है, इसका अंदाज़ा लगाना हो तो इन दूर-दराज के इलाकों में आकर रहना चाहिए)। उसके बाद अविचल हमें तेजी से लेह शहर के मशहूर रेस्टॉरेंट ‘तिब्बतन’ किचन  ले आया है। वेज थुकपा और साथ में अमेरिकन चॉप्सी। वाह! मन और पेट अब भर चुका है। सो, रात 10 बजे लौट रहे हैं। मेजर रितेष ने आर्मी का एक वाहन तिब्बतन किचन के बाहर भिजवा दिया है। भाई-बहन की जोड़ी ने कुछ चाइनीज़ आइटम पैक करवा लिए हैं – आज रात सुधीर और रितेश अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों से फारिग होकर लुत्फ उठाने हमारे ट्रांज़िट कैंप में आएंगे। मुझे भी न्योता दिया जा रहा है, मगर मैंने साफ कह दिया है, कबाब में हड्डी बनने का मेरा कोई इरादा नहीं है। वैसे भी कल सुबह के लिए पैकिंग और बाकी की तैयारियों के लिए अब वक्त ही कहां बचा है। सो रात साढ़े दस बजे मैं अपने चांग-ला लौट आयी हूं। यहां हर रात 11.30 बजे बत्ती गुल कर दी जाती है, सो मैं जल्दी-जल्दी अपनी बची-खुची पैकिंग से निपट जाना चाहती हूं। कैमरा, मोबाइल, लैपटॉप जैसे इलैक्ट्रॉनिक सामान को चार्ज करने लगा दिया है। सफर के अहम् साथी जो हैं ये सब।

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नुब्रा पर बने तंग पुल को पार कर रही है हमारी ज़ायलो। तेन्ज़िंग ने सामने से इशारा होने पर ब्रेक लगा दिया है, ये क्या – लेफ्टिनेंट कर्नल अतुल भाटिया पहले से खड़े हैं। सवेरे हमारे काफिले के साथ ही जिप्सी में निकले थे। शायद उन्हें नॉर्थ पुलु में आखिरी बार देखा था। सारा खेल समझ आ गया है। उनकी जिप्सी उसके बाद सरपट दौड़ती रही है। हमारी तरह जगह-जगह रुककर फोटोग्राफी और लू-ब्रेक से उन्हें कोई सरोकार नहीं था। दरअसल, बेस कैंप में ट्रैकर्स की इस टोली के ठहरने की व्यवस्था को देखने वे हमसे करीब डेढ़ घंटे पहले यहां पहुंच चुके थे। इन छोटी-छोटी कोशिशों को सराहे बगैर आगे बढ़ना इस दास्तान-नवीसी के सिलसिले में गुस्ताखी होगा।

वे हमें हमारे कमरों की तरफ ले जा रहे हैं, बस से सामान उतरवाया जा चुका है और हमारे पीछे पीछे उसे लाया जा रहा है। बेस कैम्प की मेरी तमाम कल्पनाओं को धराशायी करते हुए यहां अच्छे-खासे कमरे सजे हैं। टीवी, म्युज़िक सिस्टम, टेलीफोन, डबल बैड से सुसज्जित गैस्ट रूम ‘कमान’ मेरे नाम हो गया है। और बाथरूम में गरम पानी की दो बाल्टियां पहुंच गई हैं। बिस्तर देखकर थकान एक बार फिर हावी हो गई है। मगर अभी इस स्वर्गिक सुख तक पहुंचने के क्रम में थोड़ा वक्त और लगेगा!

हमें बताया गया कि गरमा-गरम भोजन तैयार है। मेरे कमरे के बराबर ही ‘सियाचिन हट’ है जिसमें पायल और ऋतु का बसेरा है। हमारे कमरों से कुछ बेहतर व्यवस्था है इस हट की। एक बैडरूम है जो प्यारा सा सजा है। बाहर बरामदे को चारों से कवर किया गया है और वहीं एक डाइनिंग टेबल के इर्द-गिर्द हम बैठ गए हैं। राजमा, चावल, रायता, सब्जी, रोटी और डैज़र्ट का लुत्फ लेने के बाद हम सब अपने-अपने बिस्तरों की ओर बढ़ चले थे। कमरे की छत पर नज़र पड़ गई है, टिन की चादरों के जोड़ों में से रुई झांक रही है। एक जगह छत में छेद कर एक पाइप कमरे तक आया है और वो एक हीटर/सिगड़ी से जुड़ा है। जरूर यहां की सर्दियों से निपटने का इंतजाम होगा। मैं रजाई में घुस गई हूं, लेकिन कंपकंपी देर तक बनी रही, सोचा इस हीटर को चालू करवा लेना चाहिए। मगर फिर अपनी बेवकूफी पर हंसी आ गयी। दिसंबर-जनवरी की ठण्ड के इंतजाम को इस ‘समर’ में बरतना किसी मज़ाक से कम नहीं होगा। अगस्त और सितंबर के महीने यहां आने के लिए सबसे उपयुक्त रहते हैं। सितंबर के आखिर तक गर्मियों का मौसम विदाई ले रहा होता और अक्टूबर के मध्य तक आते-आते सर्दियां दस्तक दे डालती हैं। कर्नल गोथ बता रहे हैं, जो बेस कैंप में हमारी टीम को ट्रेनिंग दिलाने का जिम्मा संभाले हैं, कि दिसंबर में सर्दी का मौसम पूरे शबाब पर होता है। मेरी तो कल्पना से परे हैं वो दिन।

लेह से रवानगी

परसों यानी 7/9 को लेह से हमारी समारोहपूर्वक विदाई हुई और हमारा काफिला साउथ पुलु (लेह से 28 किमी), खारदूंग-ला (लेह से 42 किमी), नॉर्थ-पुलु होते हुए 205 कि.मी दूर स्थित बेस कैम्प की ओर बढ़ चला। पायल, ऋतु, मंजुल, माला और लेफ्टिनेंट सुधीर के साथ मैं एक बार फिर सफेद ज़ायलो में सवार हो गई थी। मन में जज़्बा और उत्साह बरकरार है। इस बार इस ऊंचाई ने मुझे धोखा नहीं दिया, शुक्र है। बहरहाल, हमारा काफिला तेजी से दौड़ रहा है, सबसे आगे दो जिप्सी हैं – आर्मी अफसरों और अर्दलियों से लदी हुई, फिर हमारी मस्त ज़ायलो और सबसे पीछे कैडेट्स तथा अन्य ट्रैकर्स को ला रही स्वराज मज़्दा।

                                                                                       खारदूंग ला पर फहराते आस्‍था प्रतीक

सेना के अफसरों से इतनी ’सॉफ्ट‘ बातों की उम्मीद कम ही होती है जैसी जीओसी रवि दस्ताने ने औपचारिक विदाई समारोह के दौरान कही। हमसे मुखातिब दस्ताने कह रहे थे कि सेना के जवान तो हर दिन माटी की गंध को महसूस करते हैं और इस तरह के ट्रैकिंग प्रोग्राम का मकसद भी यही है कि आप लोग यानी सिविलियन बिरादरी भी उसी मिट्टी की सुगंध से रूबरू हो। अभी कल ही यहां मीडिया प्रभारी कर्नल हेमंत से मुलाकात करने 14 कोर के मुख्यालय में आयी थी तो उन्होंने भी कुछ ऐसा ही संदेश  दिया है। इस तरह की गतिविधियां एडवेंचर को लोकप्रिय बनाने की खातिर आयोजित की जाती हैं, क्या मीडिया सेना की इस भूमिका को अधिक प्रचारित नहीं कर सकता। हर बार सिर्फ यही संदेश क्यों दिया जाता है कि यह सालाना ट्रैकिंग अभियान हमारी विदेष नीति का हिस्सा है जिसके जरिए हम अपने दुश्‍मन को बताते हैं कि इस बर्फीली सरजमीं के असली हुक्मरान हम ही हैं।

कहते हैं जिस देश को अपने भूगोल का होश नहीं रहता उसे इतिहास भी धूल में मिला देता है। संभवतः भारत सरकार ने पूर्वी कराकोरम में अपने भूगोल को सही समय पर जान लिया (जिसका श्रेय भारतीय सेना के अधिकारी कर्नल एन कुमार को जाता है) और उसी का नतीजा है कि आज हम भी यहां है। राजधानी के एयरकंडीशन्ड कमरों में बैठकर लफ्फाजियों के दौर में कई बार हम सुनते आए हैं कि कब तक इस बर्फीले बंजर पर युद्ध की स्थिति बनी रहेगी, कब तक हमारे बजट का एक मोटा हिस्सा सियाचिन में हमारी सेना के रखरखाव पर खर्च होता रहेगा। आखिर जिस बर्फानी विस्तार में न कोई बसावट है और न ही कोई अन्य उत्पादक गतिविधि की संभावना, वहां इस तरह सेना के भीमकाय काफिले पर हर दिन करोड़ों रुपए खर्च करने का क्या तुक है?

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सियाचिन स्‍नाउट की पहली झलक, बाएं साल्‍तोरो रेंज और दायीं तरफ कराकोरम से घिरा ग्‍लेशियर

मगर यहां पहुंचकर, यहां की मिट्टी में दो दिन गुजारने के बाद मैं आश्‍स्त हो गई हूं कि अपनी बुलंदियों की रखवाली करना सचमुच जरूरी है। और बुलंदियों के रखवालों यानी भारतीय सेना के जवानों को मन ही मन सलाम भी करती हूं। घर-परिवार से दूर, पत्नी और गर्ल-फ्रैंड के साथ से महरूम, रोज़मर्रा की बुनियादी सुविधाओं तक को तरसते इन जवानों की तकलीफों को समझने के लिए उनके करीब जाना जरूरी है। याद आता है कि कहां महानगरों में हम छींक मारने, मूड खराब होने और यहां तक कि शॉपिंग के अपने जुनून तक को फेसबुक, ट्विटर पर अपडेट करने से नहीं चूकते और एक कोना ये भी है जहां न मोबाइल काम करते हैं और न इंटरनेट। अलगाव और दूरियों के बीच वे अपनी तकलीफों को सीनों में छिपाए बस यहां हर पल तैनात रहते हैं। कैप्टन मनीष रावत की शादी इसी साल फरवरी में हुई है, और मार्च 2011 से वे यहां तैनात हैं, पत्नी पौड़ी में ही छूट गई है क्योंकि सियाचिन की बर्फ पर तो दुश्‍मन की छाया हर वक्त मंडराती रहती है! मनीष को दिनभर की व्यस्तताओं के बाद रात में 1 बजे पत्नी को फोन करने की फुरसत मिलती है, वे अपनी सफाई में बेशक यह कहते हों कि उस वक्त सिग्नल साफ होता है, लेकिन सच तो यह है कि खुद को चुस्त-दुरुस्त रखने की कवायद और फिर दफ्तरी ड्यूटी तथा अन्य औपचारिकताओं से निपटते-निपटते रात का यह पहर आ ही जाता है। राहत  से कल मैस में मुलाकात हुई, इस 22 साल के युवा के चेहरे पर मासूमियत देखते ही बनती है। लेकिन यह जानकर हैरत हुई कि वह हमारी सेना की स्पेशल सर्विस का कमांडो है और वाकई विशेष गतिविधियों का हिस्सा है। महज़ आठ महीने के अपने आर्मी कॅरियर में उसने ऊंचा मुकाम हासिल कर लिया है, लेकिन अपनी गर्ल-फ्रैंड गंवा चुका है। कारण पूछने पर मालूम हुआ कि उसे यहां अपने तूफानी-रफ्तारी रूटीन के बीच गर्ल-फ्रैंड को फोन तक करने की फुरसत नहीं मिल पाती है। ऐसे में इस नाजुक रिलेशनशिप को मेन्टेन नहीं कर पाया। सियाचिन की सर्द हवाएं न जाने ऐसे कितने ही रिश्‍तों की गरमाइश सोख चुकी हैं।

10 सितंबर, 2011

8/9 यानी बृहस्पतिवार का दिन ट्रैकर टोली के लिए आराम का दिन था। कोई खास कार्यक्रम नहीं था, सवेरे 1100 बजे कर्नल गोथ का औपचारिक स्वागत भाषण और फिर ग्लेश्यिर पर चढ़ाई के दौरान काम आने वाले तमाम औजारों, उपकरणों, थर्मल कपड़ों वगैरह की जानकारी देने के लिए परिचय सत्र। हम सभी अपने-अपने नाप के स्नो शूज़/स्कार्पा जूते (इटालियन ब्रांड जो बर्फ पर चलने में उपयुक्त है, कीमत करीब 6.5 हजार रु) जारी करवाकर अपने अपने कमरों में लौट रहे हैं। यहां हमें एकदम नए-नकोरे जूते जारी नहीं किए गए, क्योंकि पुराने जूते पहनना ज्यादा आरामदायक रहता है। नए जूते शू-बाइट की वजह से हमें नहीं दिए गए हैं। बहरहाल, भारी-भरकम (करीब 1 किलोग्राम) जूतों को किसी-किसी ने उत्साह में चढ़ा लिया है और उसी में अभ्यास शुरू कर दिया है। हमें बताया गया है कि इन जूतों को पहनकर चलने का अभ्यास खूब कर लेना चाहिए ताकि ग्लेश्यिर पर ट्रैकिंग के दौरान कोई परेशानी पेश न आए। इस बीच, सभी को बैक-पैक/स्लीपिंग बैग की एक-एक किट भी जारी हो गई है। किसी कोने में बैठा उत्साही कैडेट बैक-पैक को खोलकर उसमें रखे सामान की जांच में डूबा था, आइस-एक्स, वॉकिंग स्टिक, थर्मल टोपी, डाउन जैकेट, थर्मल दस्ताने…. और भी न जाने क्या-क्या। तो हमें ये सब पहनना होगा, बरतना होगा!

11/9

बेस कैम्प में आज हमारा 5वां दिन है, 7/9 तो सफर के नाम रहा, अगले दिन आराम और फिर हमें ट्रैकिंग मोड में डालने की खातिर 9/9 से अभ्यास का दौर जो शु रू हुआ तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा। पहले दिन पूरे 10 किलोमीटर की मॉर्निंग वॉक। बेस कैंप से लेह की ओर जाने वाली सड़क पर हमारा काफिला कुछ इंस्ट्रक्टरों और कर्नल गोथ, कैप्टन मनीश रावत की अगुवाई में उत्साह के साथ बढ़ रहा है। रास्ते में सड़क पर बहती नुब्रा को पार करने के क्रम में कर्नल गोथ ने कुछेक बड़े आकार के पत्थर पानी में डाले जिनके सहारे हम आगे बढ़े। रोमांच की षुरूआत हो चुकी थी, सवेरे की कड़क ठण्ड थी या उस रोमांच का अहसास, मुझे सिहरन महसूस हुई। लगा यहां आने का फैसला अच्छा था। सभी लंबे-लंबे डग बढ़ा रहे थे, एक मैं थी जो अपने आसपास के पथरीले नज़ारों को निहारने, उनकी यादों को कैमरे में कैद करने में इतनी व्यस्त थी कि पूरी टोली से पीछे हो गई थी। अब इंस्ट्रक्टर लिंबू मेरे साथ हो लिए थे, वे मेरी हौंसला अफ़ज़ाई कर रहे थे और मैं इस कोषिष में थी कि सभी के साथ कदम भी बढ़ा लूं मगर नज़ारों को अनदेखा करने के लिए मैं कतई तैयार नहीं थी। जंगली गुलाबों की झाड़ियां दिखते ही एक कली तोड़ ली है, फिर सीबकथॉर्न यानी लेह बैरी की झाड़ी दिखी और मैं उस पर टंगे गुच्छों में से कुछेक तोड़ने में जुट गई। कांटों से खुद को बचाते हुए बेहद खट्टे फलों का स्वाद लिया और आगे बढ़ गई। करीब सवा घंटे में पांच किलोमीटर का एकतरफा रास्ता पार कर लिया था, अब लौटने की तैयारी थी। इस बार भी मैं सबसे पीछे रही लेकिन कैप्टन रावत इस बार मेरे साथ थे। वे रास्ते भर इस इलाके के भूगोल, एक्टीमटाइज़ेशन के लिए जरूरी सावधानियों के बारे में बताते चले और मेरे हर ढीले, धीमे, सुस्त कदम पर हर बार हौंसला अफज़ाई करने से भी नहीं चूके। मेरे आगे के सफर का खाका तैयार हो चुका था, हर बार यही होने वाला था कि पूरी टोली आगे और मैं सबसे पीछे। लेकिन अकेली कभी नहीं रही, हर बार सुरक्षा का अहसास दिलाता कोई न कोई अधिकारी या इंस्ट्रक्टर साथ रहा जिसकी मदद से सफर की हर छोटी-बड़ी परेशानी कटती रही।

कल यानी 10/9 को अब तक के सबसे भयंकर अनुभव से हमें गुजारा गया था। हमें जुलु पहाड़ी की ओर से ऊंचाई पर चढ़ने का निर्देश मिला, पूरे 1000 मीटर की ऊंचाई पार करने में मुझे सबसे ज्यादा वक्त लगा (मेरे पीछे रहे 65 साल के दिलीप कोल्हाटकर जो नागपुर से यहां आए हैं पर्वतारोहण का पूरे 35 बरसों का लंबा इतिहास उनके साथ है, अलबत्ता उम्र अब उन पर हावी हो चुकी है)। रास्ते भर इंस्ट्रक्टर लिंबू ने पूरा साथ दिया, जहां कहीं मेरे कमजोर कदम अटके या इरादे चकनाचूर होने की कगार तक पहुंचे, वे आगे बढ़ाकर ले गए। इस चढ़ाई की पूर्व-सूचना ने मुझे इतना डरा दिया था कि मैं कैमरा तक साथ नहीं लायी थी, डर लगता रहा कि उसके ‘बोझ’ को कैसे ऊपर तक ले जाऊंगी!

सफर के अदद साथी होते हैं मील के पत्‍थर, सियाचिन में यह अहसास और भी गहरा जाता है

नाश्‍ते के लिए वापस कमरे में आए और तुरत-फुरत पोहा मुंह में ठूंसकर जिप्सी में सवार हो गए। इस बार बेस कैंप से करीब 3 किलोमीटर दूर ग्लेश्यिर स्नाउट की ओर हमें ले जाया गया जहां आइस-क्राफ्ट ट्रेनिंग करायी गई। मेरे कदम और इरादे सचमुच थक चुके थे, लिहाजा मैं ट्रेनिंग एरिया से कुछ कदम पहले ही ठिठक गई। हर कोई एक छोटी सी घाटी में उतर गया था, मैं ऊपर ही बैठकर उनके हौंसलों की उड़ानों को देखती रही। इस बीच, ठंडी हवाओं ने सिहरन बढ़ा दी, हल्की बूंदा-बांदी भी शुरू हो गई थी। मेरे तन पर सिर्फ एक जैकेट थी, टोपी-दस्ताने कुछ भी नहीं। हवा से बचने के लिए मैं थोड़ा नीचे की ओर बढ़ी लेकिन दुखते घुटनों ने आगे बढ़ने से रोक दिया। अब मैं एक बड़े से पत्थर पर बैठ गई थी। समय काटने के लिए पत्थरों को एक के ऊपर एक सजाने में जुट गई। इस तरह कोई दस-एक मीनारें खड़ी कर डाली। शायद सूरज देवता को मुझ पर रहम आ गया और वे बादलों को चीरकर कुछ गरमाइश मुझ पर बरसाने लगे। मेरे थके-हारे बदन में जैसे हल्का सा नशा दौड़ गया और मैं उसी चौड़े पत्थर पर लुढ़क गई। पास के ट्रेनिंग एरिया से शोर बराबर फीका पड़ रहा था, शायद दस-पन्द्रह मिनट के लिए मुझे झपकी आयी होगी। इस बीच, शोर एकदम बंद हो गया तो मैं ठिठककर उठ गई, मैं समझ गई थी कि ट्रेनिंग पूरी हो गई और सब ऊपर आते ही होंगे। सो, खुद को संभालने में लग गई।

आइसक्राफ्ट का अभ्‍यास करते कैडेट

…………..
आज हमारे शारीरिक अभ्यास का तीसरा दिन है। सवेरे साढ़े सात बजे तक हम सब अपने कमरों के बाहर आ जुटे थे। स्नाउट की ओर जिप्सी बढ़ रही थी। एक बार फिर आइसक्राफ्ट ट्रेनिंग का कार्यक्रम था। कल के अभ्यास से मैं नदारद रही थी, लिहाजा आज कर्नल गोथ और कैप्टन रावत ने मुझे छूट न देने का फरमान जारी कर दिया था। ये क्या मुसीबत है! आइस स्किल में मेरी ज़रा भी रुचि नहीं बन पा रही है। सच तो यह है कि आज भारी-भरकम स्कार्पा जूते पहनकर ग्लेश्यिर वॉक कार्यक्रम ने कल रात से ही मेरी नींद उड़ा दी थी। हालांकि थके शरीर ने कल रात साढ़े नौ बजे ही बिस्तर पकड़ लिया था, लेकिन रात भर कई-कई बार मैं जागती रही। और हर बार बस यही ख्याल आता रहा कि कल इस थकेहारे शरीर से कैसे चलूंगी – वो भी ग्लेश्यिर पर! घर में बैठकर सियाचिन की कल्पना जितनी सुहावनी लग रही थी, यहां आकर उतनी ही कष्‍टप्रद हो गई है। बार-बार मनाती रही कि काश सवेरे जोरों की बारिश हो या फिर कोई आंधी-तूफान ताकि यह अभ्यास रद्द हो जाए। मन में डर बैठ चुका था। फिर यह भी सोचा कि सवेरे कोई बहाना बना दूंगी न जाने का। लेकिन सवेरे जब अर्दली ने आकर गरमा-गरम चाय का गिलास थमाया और मुंह-हाथ धोने के लिए गरम पानी की बाल्टी भी वो बाथरूम में रख गया तो पता नहीं कैसे इरादा बदल गया। सोचा, चलो आइसक्राफ्ट वैन्यू तक चलती हूं, आगे देखा जाएगा। आइसवॉल पर चढ़ने का डेमो दिया गया, इंस्ट्रक्टर चेतराम मुझे बड़े धैर्य के साथ सिखाते रहे लेकिन पन्द्रह मिनट के अभ्यास के बाद भी मैं एक कदम तक बढ़ाने में नाकाम रही। मेरे ‘हुनर’ को देखने के बाद कर्नल गोथ ने इस अभ्यास को बंद करने और दिन के अगले कार्यक्रम यानी ग्‍लेश्यिर वॉक का निर्देश दिया। इस बीच, मैंने कैमरे को अपने बैग से निकाल लिया था और स्नाउट की तस्वीरें उतारने में जुट गई। इस नज़ारे को बयान करने में मेरे शब्द नाकाफी साबित होंगे, इसका अहसास मुझे हो गया था।

मन में छिपा डर अब भी हावी था, मैंने डरे-डरे कदमों से ग्लेश्यिर पर चलना शुरू किया। दूर अथाह विस्तार तक सिर्फ मोरेन दिखायी दे रहा था। परसों कर्नल गोथ ने ग्लेश्यिर पर केंद्रित अपने लैक्चर में मोरेन के बारे में बताया था, आज उसी मिट्टी, पत्थर, चट्टानों और बीच-बीच में दबी-छिपी बर्फ के मिश्रण यानी मोरेन पर चलने का साक्षात अनुभव मिला। नया अनुभव नई शब्दावली दे जाता है, इसका प्रमाण मेरे सामने था। सदियों पुरानी काली बर्फ की ऊंची-मोटी दीवारें डरावने अंदाज़ में दाएं-बाएं दिख रही थीं, हमारी दायीं तरफ खड़ा था ऊंचा, पथरीला, भूरा-नंगा पहाड़ और इसी की फुटहिल के सहारे-सहारे नुब्रा का तेज प्रवाह था। नुब्रा यहां महा-शैतान है, बीच-बीच में बहती बर्फीली चट्टानें या बड़े-बड़े बर्फानी पत्थर सचमुच खतरनाक थे।

सियाचिन ग्‍लेशियर स्‍नाउट का हतप्रभ करता दृश्‍य

सिर्फ दस मिनट बाद ही मैं एक बार फिर सबसे पिछड़ चुकी थी। हां, हर बार की तरह 65 साल के दिलीप और लगभग उनकी ही उम्र के मनोहरलाल भी आगे-पीछे ही थे। हमारे साथ एक बार फिर इंस्ट्रक्‍टर निहाल सिंह हो लिए थे। शायद यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत् किया जाता है। जो हो, मैं इस फैसले से सबसे ज्यादा खुश थी क्योंकि हर खतरनाक ऊंचाई या डरावनी उतरान पर निहाल सिंह अपने मजबूत हाथ से मेरा हाथ थामकर मुझे आगे ले जा रहे थे। निहाल सिंह गाइड की भूमिका भी निभाते चल रहे थे, कभी क्रिवास दिखाते तो कभी ग्‍लेशियर की इस सतह पर दौड़ने वाले स्नो लैपर्ड, आइबैक्स या ऐसे ही दूसरे जानवरों के बारे में भी बताते जा रहे थे। मोरेन की वजह से हर कदम बहुत सावधानी से रखना पड़ रहा था, लेकिन मैंने महसूस किया कि बड़े-बड़े पत्थरों, धूल-मिट्टी, रेत और चट्टानों के बीच मिली-जुली बर्फ ज्यादा परेशानी पैदा नहीं कर रही थी। हर चढ़ाई उतरने के बाद या हरेक मोड़ काटते ही एकदम नया दृश्‍य सामने होता, और हर नया दृश्‍य पिछले नज़ारे से और ज्यादा सिहरन पैदा करने वाला होता था। कभी बर्फ की बड़ी-बड़ी गुफाएं दिखती तो कभी बर्फ का मजबूत, कद्दावर नन्हा-पहाड़ सामने आकर खड़ा हो जाता, कभी बर्फ की एक चौड़ी सिल्ली के नीचे से टप-टप बहते पानी की धार अचंभित करती। उसके नीचे से पानी की एक पतली कतार होती तो कहीं छोटा-सा झरना बहता दिखता। और अचानक पीछे से कभी ऐसी आवाज़ सुनायी देती जैसे किसी ने एकाध गोली चलायी है। देखती हूं यह गोलीबारी नहीं बल्कि किसी बड़े बर्फानी पत्थर के नीचे पानी में धड़ाम गिरने की आवाज़ थी जो इस वीराने में कई गुना बढ़कर सुनायी दे रही थी। कहीं किसी ऊंचाई से सरकते कंकड़-पत्थर हैं तो कहीं बड़ा सा पत्थर ही मदमस्त चाल से नीचे गिर रहा है, और बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े, उन्हें सिल्लियां या चट्टानें कहना बेहतर होगा, अचानक टूट-टूटकर बह रहे हैं और यह सारी बर्फ आगे सरककर नुब्रा की शक्ल ले रही है। ग्लेश्यिर के मुहाने पर नदी का जन्म होते देखना अपने आप में अनूठा अनुभव है। प्रकृति के इस रंग को देखने घर से कितनी दूर चली आयी हूं!

क्रिवास क्रॉसिंग

अब वो डर भी जाता रहा है जो ग्लेश्यिर वॉक को लेकर मन को मथ रहा था। मुझे हर बढ़ता कदम नया हौंसला दे रहा था और मन में यह खुशी थी कि आज तकनीकी रूप से मैं सचमुच सियाचिन ग्लेषियर पर ट्रैकिंग कर रही हूं। करीब साढ़े चार किलोमीटर का एकतरफा सफर कर हम हाफ लिंक यानी कैंप 1 तक के आधे रास्ते पर पहुंच चुके हैं। बेस कैंप से कैंप 1 की दूरी 12 किलोमीटर है और हमने आज आने-जाने में 9 किलोमीटर ट्रैकिंग पूरी की। स्कार्पा जूतों ने मोरेन पर चलने में बहुत साथ दिया और आभार उन इंस्ट्रक्टरों का जिन्होंने आने-जाने के क्रम में मुझे हर नाजुक मोड़ पर गिरने से न सिर्फ बचाया बल्कि सुरक्षित बचाकर आगे भी ले गए। कुछेक स्ट्रैच तो इतने डरावने थे कि मुझे यहां तक लग गया था कि यदि अकेली पड़ गई होती तो मेरी समाधि वहीं बन जाती!

मोरेन और खतरनाक चढ़ाई को पार करने का हौंसला तो कोई इनसे सीखे

बहरहाल, जिंदा रहने के सिलसिले को जारी रखते हुए दोपहर 3 बजे बेस कैंप लौट आयी हूं, लंच तैयार था, ऑफिसर्स मैस में जाकर बेमन से भोजन किया (अब देखती हूं कि भूख कम हो गई है, और यहां इतने स्वादिष्‍ट भोजन के बावजूद उसमें दिलचस्पी लगातार घट रही है)। कमरे में आकर बिस्तर पर लुढ़क गई और अगले डेढ़-दो घंटे बेहद गहरी नींद में खो गई।

– रात 11.12 बज चुके हैं, सवेरे साढ़े छः बजे फिर एक कष्‍टप्रद अभ्यास का दौर तय है, लिहाजा अब सो जाना चाहिए।

12/9

सवेरे पांच बजे ही आंख खुल गई, उसके बाद सोने की बहुत कोशिश की लेकिन सब नाकाम। आखिर छह बजे बिस्तर छोड़ दिया और तैयार होने में जुट गई। आज हमें एक छोटी पहाड़ी पर चढ़ाई के लिए जाना है। उसके बाद फिर आइसक्राफ्ट ट्रेनिंग। मुझे दोनों से ही नफरत हो गई है। मन ही नहीं लगा पा रही हूं इन दोनों में। क्या करूं, चलना ही होगा। महिला टोली मेरे कमरे के बाहर जमा हो चुकी है। मैं चाय पीना चाहती हूं, लेकिन गरमा-गरम चाय का गिलास छोड़कर उनके साथ चल पड़ी हूं। टीम में होने पर आपको इन छोटी-छोटी बातों का बखूबी ख्याल रखना पड़ता है। हमारी पांच की टीम में सबसे छोटी 22 साल की मंजुल से लेकर 58 साल तक की मैराथन रनर और माउंटेनियर माला होनत्ती समेत सभी के बीच भरपूर तालमेल है। हमें आर्मी माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट (एएमआई) कॉम्प्लैक्स के बाहर जमा होना है। इस बीच, इंस्ट्रक्चर चैन सिंह हमें लेने पहुंच चुके हैं। हम सभी उनके पीछे चल दिए। आज मेरे कदमों ने सुबह-सवेरे ही षिकायत षुरू कर दी है। चलते हुए लग रहा है कि आगे नहीं चल पाऊंगी। लेकिन इस आवाज़ को नज़रंदाज़ कर लगातार चल रही हूं, अलबत्ता आज मेरे कदम रोज़ से भी ज्यादा धीमे हैं। एएमआई का बोर्ड सामने दिख रहा है। वहां से एक ढलान ऊपर को जाती है और फिर एक मोड़ लेकर ऊपर पहाड़ी पर ट्रैक जा रहा है। चैन सिंह ने बताया कि आज उसी ट्रैक पर हमें भी जाना है। कुछ तो हौंसला पहले से ही पस्त था और उस पर पहाड़ी देखकर बची-खुची हिम्मत भी जाती रही। मैंने हमेशा की तरह फैसला लेने में ज्यादा वक्त नहीं लगाया और चैन सिंह को बता दिया कि आज मैं यहीं से लौट जाऊंगी। वह शायद इस फैसले से कुछ चिन्तित हुआ, तुरंत वॉकी टॉकी पर टीम के बाकी लोगों से संपर्क साधा और यह संदेश उन्हें दिया। मुझे दूसरी तरफ से इंस्ट्रक्टर लिंबू की आवाज़ सुनायी दी जो कह रहे थे कि मुझे आराम करने दिया जाए। और मैं दो ही मिनट बाद अपने कमरे में लौट आयी। अब मेरे सामने यह सवाल था कि बाकी के समय में क्या किया जाए। सोने का इरादा अब बाकी नहीं रहा था, कुछ लिखा-पढ़ा जाए मगर उसके लिए भी ताकत नहीं बची। तो फिर क्यों न आज टीवी ही देखा जाए। मैंने इस कमरे में अभी तक एक बार फिर टेलीविजन नहीं खोला है। बेस कैम्प के इस कमरे की इस बड़ी सुविधा का यह अपमान ही होगा। मुझे याद आया जब 7/9 की रात हम इस कमरे की तरफ बढ़ रहे थे तो बाहर ही डिषटीवी की डिष दिखी थी जिसे देखकर मैं सचमुच हैरत में पड़ गई थी। तो यहां भी सैटलाइट टीवी है। याद आया, परसों की मॉर्निंग वॉक के दौरान कैप्टन रावत बता रहे थे कि कैसे ग्लेषियर में बनी ऊंची पोस्टों के जवानों को दिमागी रूप से सक्रिय बनाए रखने के लिए उन्हें टीवी कार्यक्रम/डीवीडी पर नई-नई फिल्में भी दिखायी जाती है। उस बर्फीले रेगिस्तानी में जहां चिड़िया भी पर नहीं मारती, वहां तैनात जवान कुछ ही दिन बाद एक अजीब-सा खालीपन महसूस करने लगता है। सभ्यता-समाज से दूर, उस वीराने में जहां कई बार कोई-कोई पोस्ट इतनी छोटी सी जगह में बनी होती है कि उन्हें ठीक से हाथ पांव फैलाकर व्यायाम तक करने की सुविधा नहीं मिल पाती, वहां उन जांबाजों के हौंसले जगाए रखना सचमुच जरूरी है। कई बार डिप्रेशन में चले जाने का खतरा बढ़ जाता है। कैप्टन रावत बता रहे थे कि ऐसे में हम जानबूझकर आपस में बोलते हैं ताकि यह पता चलता रहे कि कहीं दिमागी रूप से कोई खिन्न तो नहीं हो रहा। लेकिन विडंबना यह भी होती है कि आपको उस ऊंचाई पर अपने छोटे-मोटे निजी काम करने तथा हर वक्त मुस्तैद रहने के लिए अपनी ऊर्जा भी सहेजकर रखनी होती है। ऐसे में बातें करना भी एक बड़ा ‘प्रयास‘ साबित होता है। ग्‍लेशियर के इस गणित की गुत्थियां धीरे-धीरे खुल रही हैं।

बहरहाल, कुछ भी कर नहीं पा रही हूं – न टीवी, न किताब और न कुछ और। मन में ख्याल यह भी आ रहा है कि यहां क्या सिर्फ चलने आयी हूं। बहुत हो चुका चलना-वलना अब लौट जाना चाहिए। वैसे भी अब मैं अपनी रिपोर्ट में यह लिखने के लिए तैयार हूं – ‘सियाचिन’ से लौटकर। आह, कितनी बड़ी उपलब्धि कमा चुकी हूं। गृहस्थी के चक्रव्यूह के बीच से सियाचिन के बर्फानी रेगिस्तान तक पहुंचना बहुत दुरूह न सही, लेकिन एक चुनौती तो है ही। वक्त की मेहरबानी को सलाम करती हूं। इस उपलब्धि में जिसने साथ दिया उसकी याद हो आयी है, तत्काल घर फोन लगाया। पूरे दो दिन बाद आज पहला मौका है जब फोन एक ही बार में लग गया। घर-परिवार के हाल-चाल के बाद ज्यादा समय मैंने अपने ही अनुभवों को बांटने में लगाया।

बहरहाल, आज मैं कुछ-कुछ डिप्रेशन महसूस कर रही हूं। खाने-पीने से पहले ही मन हट चुका था और अब आगे बढ़ने की भी कोई ख्वाहिश बची नहीं है। क्या सचमुच मैं हार रही हूं? इसी ऊहापोह में 9 बज गए और सभी लौट आए हैं। मेरे हाल-चाल जानने के बाद सभी ने डॉक्टर से मिलने की सलाह दी। हमारे गेस्ट रूम से करीब 200 मीटर की दूरी पर ही एक छोटी-सी डिस्पेन्सरी है। मैं कुछ ही देर में डॉक्टर के सामने हूं, बीपी, पल्स और ऑक्सीजन का स्तर एकदम सामान्य है, लेकिन बुखार हो गया है। डॉक्टर ने गले की जांच के बाद बताया कि मैं फैरिन्जाइटिस संक्रमण की शिकार हो चुकी हूं जो अब कम-से-कम 5 दिन बना रहेगा। कुछ दवाएं और हिदायतें मेरे हिस्से आयी हैं जिन्हें चुपचाप समेटकर अपने कमरे में लौट आयी हूं। बाकी दिन आराम करने/नींद लेने में गुजार दिया। हर किसी को मुझ पर थोड़ा तरस आ रहा है, क्या मैं कुमार चौकी तक जा पाऊंगी? अब ये सवाल सिर्फ मेरा नहीं रह गया है, हर किसी के पास है, ये अलग बात है कि किसी की भी जुबान पर अभी यह पहुंचा नहीं है।

आज लंच और डिनर कमरे में ही किया, मैस तक जाने की हिम्मत नहीं थी। अलबत्ता, हरीश कपाड़िया की पुस्तक पीक्स एंड पासेज़ ऑफ जंस्कार, लद्दाख एंड ईस्ट कराकोरम, जिसे कर्नल गोथ के ऑफिस से मैं पहले ही दिन ले आयी थी, पूरी पढ़ डाली है।

13 सितंबर, 2011

आज सवेरे ब्रेकफास्ट करने के बाद से अच्छा महसूस कर रही हूं। सवेरे नहायी, सिर भी धो लिया, सो खुद को कुछ हल्का पाया है। ये अलग बात है कि सवेरे की सैर से लौटने के बाद माला ने मुझे इस ‘दुस्साहस’ पर एक मीठी डांट पिलायी। 11,000 फुट की ऊंचाई पर इस तरह खुद को बुखार में ‘एक्सपोज़’ करना कितना खतरनाक है, इस पर एक लैक्चर मिल गया।

बहरहाल, करीब 10 बजे सभी ने अपने लिए जैकेट, इनर वगैरह जारी करवाने जाना है। हर कोई बेचैन है कि जल्द-से-जल्द और बढ़िया से बढ़िया, नया नकोरा आइटम उसे जारी हो जाए। बच्चों का सा उनका उत्साह सचमुच काबिले-तारीफ है। खासतौर से 51 वर्शीय पायल का उत्साह तो देखते ही बनता है। एकदम दुबली-पतली, इकहरे बदन की पायल का फिटनेस लैवल कमाल का है।

सभी जाने की तैयारी में हैं, लेकिन मैंने आज अपने लिए एक अलग ही मंजिल चुनी है। चुपचाप नाक की सीध में कदम बढ़ा लिए हैं। करीब 200-250 मीटर दूर बायीं ओर हैलीपेड है। आज चीता, चीतल और एमआई 17 हेलिकॉप्टरों की सॉर्टी देखने, उनके पायलटों के साथ बातचीत करने का मौका चुरा ही लिया है। एक पायलट मेरी जिज्ञासाओं को शांत करने के क्रम में मुझे एमआई 17 हट में ले गए हैं, वहां कंप्यूटर, रजिस्टरों से उलझे कुछ अन्य पायलट मुझे देखकर चौंक गए हैं। इस बंजर, वीराने में एक औरत हैरानी में डाल सकती है, यह उनके चेहरे देखकर साफ समझा जा सकता था। कुछ ही देर में हर कोई सहज हो गया, मेरे मासूम सवालों के जवाब देने में उनकी दिलचस्पी काबिले-तारीफ थी। तभी एक पायलट ने मुझे बाहर चलने का इशारा किया। वहां एक एमआई 17 खड़ा था, इंजन और उसके पंखों की तेज़ आवाज़ ने शोरगुल कर रखा था। कुछ सैनिक तेजी से उसकी ओर लपके, अंदर रखे बोरों, कार्टन वगैरह को तेजी से बाहर निकाला जा रहा है और दूसरे जवान उतनी ही तेजी से नए बोरे, डिब्बे, कार्टन अंदर ठूंस रहे हैं। झटपट एक जवान ने दरवाज़ा बंद कर दिया और हैप्टर नॉर्दन ग्‍लेशियर (एनजी) की ओर बढ़ चला। तुरंत ही दूसरा हेलिकॉप्टर जो अब तक अपनी बारी के इंतजार में कोई 30 मीटर पीछे खड़ा था, अब आगे आकर रुक गया है। फिर वही क्रम दोहराया गया। एकदम मशीनी सटीकता के साथ, हर कदम हूबहू पिछले जैसा था। इस तरह, लोडिंग और ऑफलोडिंग का सिलसिला पांच मिनट तक देखती रही हूं। अगले दो हैप्टर्स ने एकदम उलट दिशा पकड़ी है, मुझे इसका राज़ समझ नहीं आया। पायलट ने इस पहेली को सुलझाते हुए बताया कि ये दोनों दरअसल, सैंट्रल ग्लेश्यिर के लिए ‘रसद’ ले जा रहे हैं। मेरे मन में एक और सवाल अटका हुआ है, पूछ ही डाला –  ‘ ‘वो जो बोरे और डिब्बे एमआई 17 से उतारे गए हैं, उनमें क्या था।‘ वे मेरे मासूम सवाल पर जरा भी चौंके नहीं हैं –  ‘ ‘उनमें दरअसल, वो तमाम प्लास्टिक वेस्ट, जूस, पैकेटबंद फूड के खाली डिब्बे, टिन वगैरह हैं जिन्हें सियाचिन की बर्फ में दफन नहीं किया जा सकता। यहां इसी तरह उन्हें पहुंचाया जाता है और फिर यहां से भी नीचे उन्हें ले जाया जाता है।‘ ओह, तो ये हेलिकॉप्टर जवानों की प्राण रक्षा करने के अलावा ग्‍लेशियर के वातावरण को भी साफ-सुथरा बनाने में योगदान करते हैं! क्या क्या नहीं करते ये हवाई चीते? जवानों की डाक लाने-ले जाने के अलावा, उनके लिए फल-सब्जियां, आटा, दाल, चावल, दवाई, जूस, मैगी, चॉकलेट, अण्डे, काजू-बादाम, टॉफियां और मिट्टी का तेल जैसी अनगिनत वस्तुएं इनके कंधों पर ही सवार होकर 20-22 हजार फुट तक ऊंची बुलंदियों पर डेरा जमाए बैठे सैनिकों तक पहुंचती हैं। और अगर कोई जवान घायल या बीमार हो जाए तो उसे भी तत्काल परतापुर या चंडीगढ़ के अस्पतालों तक पहुंचाने का जिम्मा इन्हीं पंछियों का है। लेकिन सबसे कठिन घड़ी तब आती है जब उन्हें किसी ऊंची चोटी पर तैनात जवान के शव को नीचे लाने का फर्ज निभाना पड़ता है। बर्फ से निकालकर नीचे लाने पर शव को पोस्टमार्टम जैसी औपचारिकताओं के बाद जवान के परिजनों को सौंप दिया जाता है। यदि यह घटना कम ऊंचाई वाली पोस्टों पर घटती है तो प्रायः दूसरे जवान साथी स्ट्रैचर पर शव बांधकर पैदल रास्ते ही उसे नीचे पहुंचाते हैं। लेकिन कई बार मौसम की वजह से या फिर पोस्ट के ’एयर मेन्टेन्ड‘ (यानी जिस तक आने-जाने के लिए हैप्टर की सेवाएं जरूरी होती हैं) होने के कारण मृत षरीर कई-कई दिनों तक पोस्ट में रखना पड़ता है। उन जवानों की मनःस्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती जो अपने ही साथी के शव के साथ कई-कई दिन और रात बिताते हैं। शव लगभग 6 घंटे बाद सख्त पड़ने लगता है, लिहाजा हाथ-पैर आदि मोड़कर स्लीपिंग बैग में उसे समेटा जाता है। कई बार तो बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब सख्त और कड़े पड़ चुके शरीर को हेलिकॉप्टर की पिछली सीट पर ’फिट‘ करने के लिए उसके हाथ/पैर वगैरह काटने जैसा कठोर फैसला लेना पड़ा और इस तरह बॉडी का आकार छोटा कर उसे स्लीपिंग बैग में भरकर लाया गया। अपने ही साथी की बॉडी की यह हालत देखकर भी कर्तव्यपथ पर जुटे पायलट अपना दिल कड़ा कर सिर्फ उड़ान भरने पर ध्यान जमाते हुए जल्द-से-जल्द ’साथी‘ को नीचे लाने की भूमिका निभाते हैं।

सियाचिन की बर्फ ने ऐसी कितने ही गर्म शरीर ठंडे कर डाले हैं, लेकिन भावनाओं के बादल आज भी यहां उमड़ते-गरजते हैं। इस वीराने में जहां जिंदगी और मौत के बीच फासला बेहद कम है, जवानों को किसी के रहमो-करम या सहानुभूति की कतई जरूरत नहीं है। फख्र से सिर ऊंचा रखकर, पीठ पर 20-20 किलोग्राम तक का वज़न लादे ग्लेश्यिर पर बढ़ते जाते जवान को बस इतनी उम्मीद है कि उसके वतनवासियों को उसकी तकलीफों का अहसास जरूर होना चाहिए, उन्हें हमेषा यह याद रहे कि जब वो रातों को बेसुध नींद ले रहे होते हैं तब इन सफेदी में नहायी चोटियों पर कोई संतरी हाथ में भारी-भरकम बंदूक उठाए न सिर्फ दूर दुष्मन की परछाई तक पर निगाह रख रहा होता है, बल्कि दिनभर की थकान के बाद सो रहे अपने साथी को भी बीच-बीच में टटोलता, पलटता रहता है – ताकि यह सुनिष्चित करता रहे कि वह सही-सलामत है! वीरानियों में मौत की यह परछाई उसे कितनी डराती होगी, इसका बयान करने के लिए उस जवान के पास शब्द भी नहीं होते।

76 किलोमीटर लंबे, दुनिया के इस सबसे लंबे गैर-ध्रवीय हिमनद (Non Polar glacier) के मुहाने से लेकर अंतिम सिरे तक पर भारतीय सेना की चहलकदमी पिछले करीब 27 सालों से लगातार बनी हुई है। विष्व के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान के रूप में विख्यात सियाचिन के सीने पर से अब तक हजारों-हजार सैनिक गुजर चुके हैं, कितने ही इसके क्रिवासों में अनहद नाद को सुनते हुए डूब चुके हैं और कितनों के खून के छींटे इसकी बर्फ में हमेशा के लिए घुल गए हैं। ओ.पी. बाबा का आशीर्वाद लेकर हर सैनिक, अफसर यहां अपने फर्ज को निभाने में जुट जाता है। ग्लेषियर पर ऊपर की ओर बढ़ते हुए हमने कुछ थके-हाल, परेशान सैनिकों को नीचे लौटते देखा। वे अपनी पोस्टिंग पूरी कर अब लौट रहे हैं। कोई-कोई तो इतनी ऊंचाई पर तैनात होता है कि वहां से पैदल नीचे उतरने में ही कोई दस-बारह दिन उसे लग जाते हैं। रास्ते में पड़ने वाले विभिन्न कैंपों में रुकते-रुकाते उनके थके बदन अब तक सैंकड़ों तरह के अहसासों से गुजर चुके होते हैं। शायद इसीलिए उनके चेहरों पर अब कोई अहसाास ही नहीं दिखायी पड़ता! एक अजीब सी रवायत और देखी हमने यहां, जिस भी जवान की बारी ऊपर जाने की होती है वो अपने लौटने की तारीख हमें पहले बताता है! बेस कैंप की ऑफिसर्स मैस में तैनात और हर दिन हमारी खातिरदारी का जिम्मा संभाले ओमवीर ने आज ही बताया कि वह सैंट्रल ग्लेषियर (सीजी) पर अपनी तैनाती अवधि पूरी करने के बाद 30 दिसंबर को नीचे आएगा। और जाएगा कब? इस सवाल का वो कभी जवाब नहीं देता, हमने ही गणना कर ली है कि उसकी 90 दिनों की पोस्टिंग 1 अक्टूबर से शुरू होगी। यानी 20-21 सितंबर के आसपास वो रवाना हो जाएगा। ग्लेश्यिर पर खाइयों, मोरेन, फिसलन और क्रिवासों से निपटते हुए ऊपर अपने तैनाती स्थल पर पहुंचने के लिए उसे ऐसे ही जाना होगा। इस कठिन ट्रैक पर गुजरते हुए धीरे-धीरे उसका मजबूत षरीर एक्लीमेटाइज़ भी हो जाएगा। यानी 12 हजार फुट पर बने बेस कैंप से 15-20 हजार या इससे अधिक ऊंचाई तक पर बनी पोस्ट पर उसे ऐसे ही पहुंचना होता है। और इसी तरह पैदल वापस आना होता है। हेलिकॉप्टर से उसे बेषक 40-45 मिनट में कहीं भी पहुंचाया जा सकता है, लेकिन ऐसा करना उसकी जान से खेलने की तरह होता है। एक्लीमटाइज़ेशन के अभाव में इतनी ऊंचाई पर पहुंचना घातक हो सकता है। सियाचिन ने कितना विज्ञान और गणित सिखा दिया है यहां जवानों को!

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राइफलमैन सुरिन्द्र सिंह सीकर का रहने वाला है और एक साल से इस इलाके में ड्यूटी निभा रहा है। दिनभर में कई-कई बार गरम पानी – हाथ मुंह धोने से लेकर पीने तक के लिए उससे मंगवाती रहती हूं और वो पूरी निश्ठा भावना के साथ लाता रहता है। परसों से जबसे मेरी तबीयत बिगड़ी है, उसे मुझसे सहानुभूति हो आयी है। ‘यहां का मौस्सम ही जी गड़बड़ है, अपना ध्यान रखो।’ सवेरे उठते ही दो ग्लास गरम पानी, फिर चाय, और आठ बजते बजते बार्नवीटा वाला गरम दूध वो कमरे में पहुंचा जाता है। दिनभर में कितनी ही बार पीने का गरम पानी, चाय, कॉफी, सूप का सिलसिला वो बिना किसी शिकवे  शिकायत  के निभाता चलता है। सियाचिन की रेगिस्तानी बंजर धरती पर इस फितरत के इंसान सचमुच मौसम के कहर को फीका बनाते हैं। वह कल नॉर्थ पुलु के लिए रवाना हो जाएगा – तीसरे चरण के एक्लीमेटाइज़ेशन के लिए और वहां करीब 6 दिन रहने के बाद सीधे सैंट्रल ग्लेश्यिर (सीजी) की किसी पोस्ट पर उसकी तैनाती होगी। आज जब वो जाने से पहले आखिरी बार दुआ-सलाम के लिए मेरे कमरे में आया तो मैंने उसे बातों में उलझा लिया। घर-परिवार से संपर्क, सियाचिन की कड़ी परीक्षा, सेना में भर्ती होने का जज़्बा और यहां सीज़फायर के बावजूद तनाव की स्थिति में नौकरी करने के हालातों पर वह खुलकर बताता रहा। मेरे लिए उसका देखा-सुना-भोगा अनुभव किसी कर्नल की प्रेस कांफ्रेंस में किए जाने वाले खुलासों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था। जब वो किसी जवान की मौत या चौकियों वगैरह पर हुए हादसों के बारे में बता रहा था तो उसकी जबान भले ही नहीं कांपी लेकिन आंखों के पोरों पर आंसुओं की नमी मैं साफ देख रही थी। अभी बमुश्किल दो हफ्ते पहले रात में एक क्रिवास पार करते हुए कैसे एक जवान ऊपर से लुढ़के पत्थर से घायल होकर तत्काल घटनास्थल पर ही मौत की नींद सो गया था, इसका बयान करते हुए उसने बताया कि उस जवान के गमगीन साथियों ने पूरे दो दिन तक खाना नहीं खाया। खाते भी तो कैसे भला! पल भर पहले तक जो जवान मुस्तैदी से बर्फ पर आगे बढ़ रहा है, अब एकाएक उसके न रहने के सच पर यकीन आते-आते इतना वक्त लगना लाजिमी है। महज़ एक साल इस इलाके में बिताने के बाद उसे जनवरी 2012 में इस ‘बर्फानी जेल’ से मुक्ति मिल जाएगी।’ इससे ज्यादा मुश्किल पोस्टिंग कोई नहीं है, जी! यहां बेशक हर जवान को 17 हजार रु माहवार अलग से भत्ता मिलता है, जो देखा जाए तो उनकी तनख्वाह से भी ज्यादा होता है, और राशन भी ज्यादा दिया जाता है, लेकिन फिर भी उसकी तकलीफ के आगे ये कुछ भी नहीं है। जीते जी हम मौत को गले में डाले फिरते हैं, किस्मत ने साथ दिया तो यहां से जिंदा निकल जाते हैं नहीं तो अगले ही पल के बारे में कहा नहीं जा सकता।’

ठीक ही तो है, हर महीने सत्रह हजार रु पगार से अलग पाने का मोह इस बर्फीली कालकोठरी में आने के लिए आकर्षित नहीं कर सकता। हालांकि कुछ ऐसे जांबाज भी हैं जो यहां आने के लिए ‘वॉलन्टियर’ तक करते हैं, अब वो उनका जज़्बा हो सकता है, जोश या कुछ नया और एकदम अलग अनुभव जीने का इरादा। हम भी तो ऐसे ही जोशीले लोगों में से हैं जो अपने-अपने घरों के सुकून को छोड़कर यहां चले आए हैं। बाहर इस वक्त तेज हवाएं चल रही हैं, और उसके साथ ही बारिश भी है। ठंड तेज हो गई है। कमरे से बाहर निकलना दूभर है। एक्लीमेटाइज़ेशन के झंझट अलग से हैं। अभी-अभी गरम पानी के दो गिलास खत्म कर चुकी हूं।

16 सितंबर, 2011

परसों यानी 14/9 को हमारी अंतिम मेडिकल जांच हुई। 25 की टोली में से 3 को अनफिट घोषित किया गया और अब हम 22 ही सियाचिन के बर्फीले सीने पर चलेंगे। मनोहरलाल हाइ बी.पी., दिलीप कोल्हाटकर हाइ कलेस्ट्रोल और एक कैडेट सत्यम पंजे में फंगल इंफेक्षन की वजह से ट्रैक पर नहीं जाएंगे। यह डॉक्टरी फैसला बेशक उन तीनों के हित में लिया गया लेकिन तीनों ही इससे आहत थे। ब्लड प्रेशर, पल्स रेट, ऑक्सीजन लैवल जैसी सामान्य जांच के अलावा बाकायदा डेन्टल चेकअप भी हुआ। डेन्टिस्ट डॉ साहनी कल शाम बेस कैम्प परिसर में टहलते हुए मिल गए थे और तभी उन्होंने बताया कि ग्लेश्यिर पर जाने वाले हर फौजी की पूरी डेन्टल पड़ताल की जाती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऊपर बुलंदियों पर तीन माह के प्रवास के दौरान दांतों की किसी किस्म की तकलीफ उसकी असमय वापसी का सबब न बने। हमारी जांच से पहले एक जवान काफी देर से बंकरनुमा क्लीनिक में था, हमारी बेचैनी शायद डॉक्टर भांप गए थे, लिहाजा बाहर आकर उन्होंने बताया कि उस जवान की आर.सी.टी. पूरी हो चुकी है और अब हमारी जांच का वक्त बस आ ही गया है। बेस कैंप न हुआ अच्छी खासी नगरी है ये जहां आर.सी.टी की सुविधा भी है! इससे पहले एक कमरे में एक्स-रे मशीन भी दिखायी दी थी। कुल-मिलाकर, बुनियादी मेडिकल सुविधाएं यहां जुटायी गई हैं। लेह में हमारी ईसीजी जांच को यहां भी स्वीकार कर लिया गया, लेकिन कुछ अधिक उम्र के ट्रैकर्स को यहां दोबारा इस परीक्षा से गुजारा गया।

सियाचिन ट्रैक की तैयारियां सेना के स्तर पर कितने बड़े पैमाने पर की जा रही हैं, इसका सबूत हर दिन मिल रहा है। अभी तीन रोज़ पहले ही जब हेलिपैड का नज़ारा देखने गई थी तो वहां लोड किए जाने वाले कुछ डिब्बों पर ’कैंप 2 – ट्रैकिंग एक्सपीडिषन‘ की पर्ची चस्पा थीं। उसमें बंद थे जूस, बिस्किट, चॉकलेट वगैरह के पैकेट जो हमारे दल को कैंप 2 पर पहुंचकर दिए जाएंगे।

कल शाम कुछ आयुवेर्दिक दवाएं, मल्टीविटामिन कैप्सूल, ताकत की गोलियां वगैरह हमारे कमरों में पहुंचा दी गईं। जूस-चॉकलेट, एक्लेयर्स, काजू-बादाम का कोटा जरूरत से ज्यादा कमरे में रखा है। इस बीच, ग्लेश्यिर की सर्दी से निपटने के हिसाब से उपयुक्त थर्मल इनर, जैकेट, ट्राउज़र, कैप वगैरह भी जारी की जा रही हैं। मेरी टोली की अन्य महिलाएं अपनी माउंटेन गीयर ले आयी हैं और पहन-पहनकर खुष हो रही हैं। किसी को कैप के साइज़ से शिकायत है तो किसी के बदन पर इनर तंग है, कोई जैकेट के बड़े साइज़ से संतुष्‍ट नहीं है, इसलिए बार-बार इन्हें बदलवाकर ला रही हैं। समय बिताने के लिए यह बहाना भी बढ़िया है, गालिब!!

हमें आज ही ट्रैकिंग के लिए रवाना होना था लेकिन हमारे दल के साथ चलने वाले डॉक्टर का एक्लीमेटाइज़ेशन पीरियड कल ही पूरा हुआ और वे कल शाम ही नॉर्थ पुलु से लौटे, इसलिए अब हम कल यानी 17 सितंबर को बेस कैंप से कैंप 1 के लिए रवाना होंगे।

इस बीच, बाहर लेफ्टिनेंट भाटिया की जिप्सी भी पहुंच गई। पांच मिनट बाद ही अविचल ने रहस्योद्घाटन किया – ‘हम कल नहीं जा रहे, क्योंकि एनजी (नॉर्दर्न ग्लेषियर) में एवलॉन्च आने की चेतावनी जारी हो गई है।’ वाउ!!!!!!!!!! मेरे समेत कम-से-कम दो और की जबान से निकला पहला शब्द यही था।

17 सितंबर, 2011

किसी एडवेंचर की इससे ज्यादा एडवेंचरस शुरूआत भला क्या हो सकती है कि एवलान्च की आशंका के चलते उसे रोक दिया जाए? हमारे एडवेंचर ट्रिप के साथ एक के बाद एक कई रोमांच जुड़ रहे हैं, पिछले चार दिनों से बेस कैंप में मौसम एकाएक खराब हो गया, फिर कैंप 2 और कैंप 3 के बीच एवलॉन्च का जोखिम और आज सवेरे मौसम फिर से एकदम साफ। सवेरे करीब साढ़े छह बजे आंख खुली तो सबसे पहले बाहर हैप्टर्स का शोर सुना, मन ने कहा, ‘जरूर मौसम खुल गया है।’ बाहर खिली-खिली धूप के बीच हेलिपैड पर रौनक दिख रही है। उड़ानों का सिलसिला जाने कब से शुरू हो चुका है। पहाड़ियों के किनारे-किनारे उड़ान भर रहे ये मशीनी पंछी हैं या इनकी परछाई, कई बार भ्रम के चलते यह समझ ही नहीं आता।

सवेरे सात बजे लेह रोड की ओर हमारा काफिला एक बार फिर बढ़ चला। नुब्रा पर बने पुल (2002 में निर्मित) को पार कर रहे कैडेटों की कदमताल में आज वो उत्साह नहीं दिख रहा जो हर दिन दिखायी देता है। रास्ते में खट्टे लेह बैरी के फलों से मुंह को तरोताजा किया, जंगली गुलाबों की झाड़ियों को रुककर देखना चाहती हूं, लेकिन आज पैरों में गजब की ताकत महसूस कर रही हूं। शायद ग्‍लेश्यिर ट्रैक के लिए शरीर पूरी तरह तैयार हो चुका है। मन में उमंग-उत्साह है, दिल खुश है और मौसम की मेहरबानी के बीच जिंदगी बेहद-बेहद खुशहाल लग रही है।

उम्मीद से उलट आज मैंने करीब सवा तीन किलोमीटर का सफर काफी जल्दी (करीब घंटे भर में) पूरा कर लिया है। कैप्टन मनीष और इंस्ट्रक्टर लिंबू मेरी रफ्तार से संतुष्‍ट हैं, चैन सिंह भी कहने से नहीं चूके कि आज मेरी एनर्जी सचमुच और दिनों से ज्यादा है। बहरहाल, मैं इसका कारण नहीं समझ पा रही हूं। मुझे अब भी लगता है कि मेरा हौंसला और दिनों जैसा ही है लेकिन बाकी लोगों का और खासतौर से कैडेटों का जोश फीका पड़ा है। कैप्टन मनीष मुझसे मुखातिब हैं लेकिन मेरे पास आज कैमरा नहीं है। आज मैं अपनी सवेरे की इस सैर को ’डिस्ट्रैक्‍शन‘ से मुक्त रखे हुए हैं। खैर, टीम के दूसरे कई सदस्य हैं जो इस पल को कैद कर रहे हैं। और फिर टोली लौट गई। इस बार मैं जानबूझकर सबसे पीछे हूं। इस राह पर आते वक्त ही मैं कुछ मन बना चुकी थी और अब उसी में जुट गई हूं। लेह रोड से बेस कैंप की ओर वापसी के क्रम में मैं इन खूबसूरत नज़ारों को इस बार वीडियो में कैद कर रही हूं।

19 सितंबर, 2011

सियाचिन के बर्फानी दरिया पर सिविलियन ट्रैकिंग जत्था कल यानी 18/9 को सवेरे बेस कैंप से रवाना हुआ। औपचारिक विदाई से पूर्व ट्रैकिंग दल बेस कैंप परिसर में ओ.पी.बाबा मंदिर पहुंचा जहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना और आरती के बाद ओ.पी.बाबा का आशीर्वाद और अनुमति प्राप्त कर टीम को समारोहपूर्वक रवाना किया गया। धर्म-निरपेक्ष परंपराओं का पालन करने वाली हमारी सेना और आस्था का यह सम्मिलन सचमुच दर्शनीय है। दुर्गम, दुरूह सियाचिन पर जवानों की तैनाती हो या फिर वापसी, ओ.पी.बाबा की जयकार हमेशा ऐसे मौकों पर गूंजती है। यहां तक कि कैंपों, पोस्टों पर स्थित बाबा के हर छोटे-बड़े मंदिर में हर दिन बाबा को भोग लगाने के बाद ही सैनिकों को भोजन मिलता है। आखिर कौन हैं ये ओ.पी.बाबा? यह सवाल लेह में हुई हमारी विदाई के समय से ही मन में है, उस दिन भी वाहनों को झण्डी दिखाने के साथ ही ‘ओ पी बाबा की जय’ से पूरा परिसर गूंज रहा था।

सियाचिन का हर सैनिक ओ.पी.बाबा को इस ग्‍लेशियर के लोकपाल देवता के रूप में पूजता है और यहां प्रत्येक कार्य के प्रारंभ में तथा उसके संपन्न होने के बाद ओ.पी.बाबा का आशीर्वाद लेना नहीं भूलता। जिस तरह सियाचन का विस्तार और इसके गहरे क्रिवास अपने मूल में बहुत कुछ रहस्य छिपाए हुए हैं, उसी तरह यह भी एक रहस्य ही है कि ओ.पी.बाबा कौन थे। कहते हैं इस किंवदन्ती का जन्म अस्सी के दषक के अंत में नॉर्दर्न ग्लेश्यिर के बिला कॉम्प्लैक्स की मालौन पोस्ट पर तैनात सैनिक ओमप्रकाष से जुड़ा है। लेकिन वास्तव में, इस नाम का कोई सिपाही उस वक्त वहां तैनात भी था या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकी है। और न ही ऐसा कोई कारण गिनाया जाता है कि ओमप्रकाश को कैसे ओ.पी.बाबा का दर्जा हासिल हुआ। यूं भी आस्था को कब प्रश्‍नचिन्ह लगे हैं? सो, सियाचिन ग्लेश्यिर पर हर छोटे-बड़े अभियान, रूटीन तैनातियों, सैनिकों की वापसी और यहां तक कि नियमित अभ्यास कार्यों से पहले ओ.पी.बाबा की बाकायदा अनुमति और आशीर्वाद लिए बगैर किसी भी महत्वपूर्ण काम की शुरूआत नहीं की जाती। और हर कार्य के संपन्न होने के बाद बाबा के मंदिर में दर्शन करने जाने पर ही कार्य की पूर्णता मानी जाती है।

इसी रवायत का पालन करते हुए हम 22 ट्रैकर्स का दल, आयोजक मंडली, टीम के नेता और अन्य संबंधित कर्मी सवेरे करीब 6.30 बजे बेस कैम्प स्थित ओ.पी.बाबा मंदिर पहुंचे। यहां से टीम की रवानगी सवेरे 7.50 बजे हुई और स्नाउट की ओर हमारे कदम बढ़ चले। मोरेन से पटे पड़े उबड़-खाबड़, पथरीले और चुनौतीपूर्ण रास्ते पर हम हौंसले से बढ़ रहे थे। हमारे साथ करीब 30 पोर्टर भी थे जिनका बंदोबस्त सेना की ओर से किया गया था। नामग्याल, नोरबू, त्थाच्ट से हमारी थोड़-बहुत जान-पहचान हो गई थी और उनसे मालूम हुआ कि इस अभियान के लिए उन्हें 14,000 रु मेहनताना मिलेगा, जो वाकई एक जवान के मासिक वेतन से भी अधिक है। 4 दिन की चढ़ाई और 4 दिन उतरान, यानी कुल जमा 8 दिन में 14,000 रु की पगार आकर्षक है। सेना प्रायः आसपास के इलाकों से पोर्टरों की सेवाएं लेती हैं और यह धंधा यहां के नौजवानों को इतना रास आ गया है कि वे किसी और नौकरी के मोह में पड़ने की बजाय पोर्टरगिरी को तवज्जो देते हैं। सेना की इस इलाके में मौजूदगी ने यहां के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को किस तरह से प्रभावित किया है, यह इसका बेहतरीन उदाहरण है।

लगभग दो घंटे बाद, 10 बजे हम हाफलिंक पहुंच गए, यहां गरम पानी, चाय-बिस्किट ब्रेक के बाद ग्रुप फोटो सेशन हुआ और काफिला अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चला। यहां तक का रास्ता कुल-मिलाकर मुश्किलों से भरा था। क्रिवासों, खाइयों और दूसरी कई छोटी-बड़ी परेशानियों से यहां वास्ता पड़ चुका था। आगे की राह थोड़ी और एडवेंचरस होने जा रही थी… दरअसल, अब हम कुछ चढ़ाई पर आ चुके थे और ट्रैकिंग रूट पर बर्फ बढ़ गई थी। लेकिन आसमान पर चमकीली धूप टंगी थी और उसके तीखेपन से बर्फ लगातार पिघल रही थी। अब रास्ते में चलते हुए जगह जगह पानी की धाराओं को भी पार करना था, कभी पानी की धार पतली होती तो स्कार्पा बूटों के चलते आसानी से पानी में पैर रखकर गुजर जाते। और कई बार ऐसे भी मौके आए जब हमारे संगी-साथी आसपास के पत्थरों को बीच धार में फेंककर हमारे लिए राह आसान बना रहे थे। एडवेंचर का अहसास धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था, अभी तक हमने क्रिवासों को अपने दाएं-बाएं ही मुंह खोले देखा था और उन्हें पार करने की नौबत नहीं आयी थी। लेकिन अब ग्‍लेशियर के सीने पर वो बड़ी-बड़ी दरारें दिखायी देने लगी थीं जिनकी वजह से आगे बढ़ना नामुमकिन न सही मगर टेढ़ा जरूर हो गया था। अब हमें इन क्रिवासों पर लकड़ी के फट्टों या सीढ़ियों से बनाए चालू किस्म के पुलों को पार करके जाना था। टीम लीडर का आदेश  आ चुका था कि मुझे अकेले ही, बिना किसी सहारे के क्रिवास को पार करना होगा। उनके आदेश की तल्खी थी या मेरे सीने में जगी हिम्मत, कि मैं सचमुच उस कच्चे से दिख रहे लकड़ी के टुकड़े के ऊपर से गुजर गयी। अलबत्ता, नीचे क्रिवास की गहराई में झांकने का साहस मैंने नहीं किया। गहराइयों का, ऊंचाइयों का ये डर मन से जाने कब जाएगा!

लेकिन मेरी इस कमजोरी को अविचल ताड़ चुका था। आज मंजुल और अविचल दोनों मेरे साथ, मेरी ही रफ्तार से बढ़ रहे थे। मंजुल दरअसल, परसों बास्केटबॉल खेलते हुए पैर मुड़वा चुकी थी, सो धीरे चल रही थी और अविचल तो पहले ही दिन से पैरों के तलवे में शू-बाइट से परेशान है। अगले क्रिवास पर पहुंचते ही उसने मुझसे नीचे झांकने की जिद की और उसका आग्रह मैं टाल नहीं पायी। जब नीचे देखा तो मेरे होश सचमुच उड़ चुके थे। उसने एक पत्थर नीचे खाई में फेंक दिया, लेकिन उसकी आवाज़ बाहर नहीं सुनाई दी। क्रिवास की गहराई में उस पत्थर का नाद जैसे खो गया, ऐसे ही अब तक कई जांबाज़ों के शरीर भी इनमें गुम हो चुके हैं। यह ख्याल आते ही मेरे सीने की धड़कन और तेज़ हो गई थी…

अब हम अपनी मंजिल से करीब डेढ़-दो किलोमीटर दूर थे। हमारे साथ चल रहे इंस्ट्रक्टर को वॉकी-टॉकी पर सूचना मिली कि पहला जत्था कैंप 1 पहुंच गया है, समय दोपहर के 11.20 बजे थे, टीम के कर्ता-धर्ताओं ने करीब 1 बजे पहुंचने का अनुमानित समय बताया था लेकिन उनके तमाम अनुमानों को धता बताते हुए सिविलियन दस्ता करीब पौने दो घंटे जल्दी पहुंच गया। इस खबर को सुनकर लगा जैसे कैंप 1 नहीं बल्कि एवरेस्ट पर हमारी टीम ने झण्डा फहरा दिया है। बहरहाल, मन में एक खुशी की लहर दौड़ गयी और हमने भी कदम तेज़ करने का मन बनाया। लेकिन अब तक पैरों ने जवाब दे दिया था, हौंसलों की उड़ान के आगे वो ढीले पड़ने लगे थे। सांस भी अब उखड़ रही थी, बगल से गुजरते कैडेट हर्ष के हाथ से एप्पल जूस का टैट्रा पैक मैंने ले लिया और तेजी से सारा जूस पी गई। फिर कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद पानी पीया, एक टॉफी भी मुंह में रख ली मगर कोई असर चाल में नहीं दिखा। इस बीच, सामने ही एक गेरूआ झंडा दिखायी देने लगा था, जरूर वही हमारी मंजिल है और वो झंडा ओ.पी. बाबा के मंदिर पर टंगा है। लेकिन अब अंतिम पांच सौ मीटर मुझे पांच मील दूर लग रहे थे। किसी तरह, बची-खुची हिम्मत खरोंचकर आगे कदम बढ़ाए। धीरे-धीरे, लटकते कदमों से 12.15 बजे हम भी अपने ‘एवरेस्ट’ पर पहुंच चुके थे। तालियों के शोर के बीच हमारा जोरदार स्वागत हुआ, और एक कोने में बैठते ही गरम पानी की ट्रे हमारे सामने थी। इस खातिरदारी की उम्मीद हमने नहीं की थी, लेकिन अभी यहां ऐसे ही और भी कई हैरत में डाल देने वाले वाकये होने बाकी थे …………

साढ़े बारह हजार फुट की ऊंचाई पर राजमा-चावल और पास्ता – यह कमाल भारतीय सेना ही कर सकती है!

कैंप 1 में एक तंबू में चल रही रसोई से शोर-गुल के अलावा कुछ खुष्बुएं और धुंआ भी बाहर आ रहा था। दोपहर का भोजन तैयार हो चुका था और कई मजबूत हाथ भारी-भरकम भगोनों को उठाकर हमारे ‘डाइनिंग हॉल’ में उन्हें पहुंचा रहे थे। भूख से हाल बेहाल था, इसलिए बिना किसी औपचारिकता में पड़े हम भगोनों पर टूट पड़े – राजमा-चावल, गोभी की सब्जी, रायता, सलाद और डैज़र्ट में टिन्ड फ्रूट! वाह! इस ऊंचाई पर जहां खुद को ढोकर लाना भी एक महा-चुनौती लग रहा था, वहां इस लजीज़ लंच की उम्मीद शायद किसी भी ट्रैकर को नहीं थी। हमें पता चला था कि ट्रैकर दल के रवाना होने से दो दिन पहले एक एडवांस पार्टी बाकायदा बंदोबस्त के लिए रवाना हो गई थी। टैंटों की व्यवस्था से लेकर खाने-पीने तक की बारीकियों पर पूरा ध्यान दिया गया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

एक तो सफर की थकान और उस पर इतना स्वादिष्‍ट खाना, हमने शायद भूख से ज्यादा ही खा लिया था, सो अब अपनी जगह से उठकर जाने की हिम्मत भी नहीं बची थी। सौंफ-इलायची भी सामने थी, कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ी है आयोजकों ने। अभी हम लंच का स्वाद भुला भी नहीं पाए थे कि टीम लीडर की एक और सुखद सूचना हमें मिली – ‘कल का नाश्‍ता होगा पास्ता!’ क्या मैं सचमुच ग्लेश्यिर में हूं, या फिर ये सब मेरा वहम भर है। रास्ते भर जूस, चॉकलेट, गरम पानी, ब्लैक टी, बिस्किट और न जाने क्या-क्या! और अब यहां टैंट में चल रही टैम्परेरी रसोई में एक के बाद एक व्यंजनों का सिलसिला। शाम छह बजे गरमागरम टमेटो सूप हमारे टैंटों में पहुंच चुका था। सचमुच यह कमाल भारतीय सेना ही कर सकती है!

भारतीय सेना ने जैसे सियाचिन की दुर्गम चोटियों पर अपनी चौकियां बना रखी हैं उसी तरह यहां भी किसी बर्फीली चोटी पर किचन है तो किसी पर एक तंबू की आड़ में पोर्टरों का अड्डा तो कुछ फर्लांग दूर एक टैंट हमारी महिला टोली के लिए है। चोटियों पर कब्जे की रवायत यहां भी मिनी स्केल पर दिखती है! और जब समय के साथ तंबू के आसपास की बर्फ पिघलने लगती है, तो ये जवान दाएं-बाएं कोई दूसरा ठिकाना ढूंढ लेते हैं। इस तरह, उनका अड्डा आए दिन खिसकता रहता है। रसोई में झांककर देखती हूं तो दो स्टोव जल रहे हैं, एक पर रखे कनस्तर में बराबर पानी गरम हो रहा है, दिन भर यह सिलसिला जारी रहता है। फिलहाल मौसम तल्ख नहीं है, लिहाजा नजदीकी पानी की धारा से पानी इकट्ठा कर पीने तथा दूसरी जरूरतों के लिए पानी का यह इंतजाम हर वक्त चलता है। दूसरे स्टोव पर एक बड़े कड़ाहे में कुछ पक रहा है। हाथ मुंह धोने, पीने के लिए गरम पानी की दरकार हरेक को रहती है, कुल-मिलाकर लगता है कि पानी गरम करना यहां सबसे बड़ा काम है। सर्दियों में जब तापमान शून्य से नीचे गिर जाएगा तब बर्फ इकट्ठा कर उसे पिघलाने के तामझाम में ही एक जवान दिन-दिनभर उलझा रहता है। तीन महीने की हर जवान की पोस्टिंग अवधि में नहाने की ‘लग्ज़री’ से हर किसी को महरूम रहना पड़ता है, एक तो पानी की किल्लत, दूसरे इस शीत में शरीर को ’एक्सपोज़‘ करने का जोखिम बहुत भारी पड़ सकता है। लिहाजा, हर कोई बस टॉवल बाथ लेता है। लेकिन कड़क सर्दी में भी हाइजिन का ख्याल रखना बेहद जरूरी है, इसीलिए सुबह-शाम हैंड-फुट परेड की जाती है। इसके लिए गरम पानी में 10-15 मिनट हाथ-पैर डुबोकर रखे जाते हैं। फिर उन्हें पानी से निकालकर बिल्कुल सुखाने के बाद एलो-वेरा क्रीम, फुट पाउडर वगैरह लगाकर जुराब/दस्तानों को पहना जाता है। इस तरह, इंफेक्‍शन से बचाव होता है।

कैंप 1 में करीब 18 घण्टे बिताने के बाद यह साफ हो गया था कि इन बर्फीली बुलंदियों पर अपनी साफ-सफाई, टैंट की सफाई, भोजन-पानी की व्यवस्था में ही दिन का एक बड़ा हिस्सा बीत जाता है। फिर पोस्ट पर अपनी-अपनी निर्धारित ड्यूटी के बाद नींद के हिसाब-किताब में ही पूरा दिन कहां उड़ जाता होगा, इसका ख्याल किसे रहता होगा? ऐसे में बोरियत या निराशा के लिए समय बचता है? बेशक, तीन महीने का कार्यकाल साधारण परिस्थितियों में बहुत कम लगता है, लेकिन सच पूछा जाए तो यहां जैसे समय भी परीक्षा लेता है। हर दिन अपने अस्तित्व की लड़ाई में जवान की अच्छी-खासी ऊर्जा लग जाती है। एक-एक दिन उंगली की पोरों पर गिनती करते-करते बीतता है। अगर ऐसा न होता तो पोस्टिंग पर जाने वाला हर जवान अपने लौटने की तारीख क्यों पहले बताता है? ग्लेश्यिर की बर्फ उसके हौंसलों से खेलती है, उसके जज़्बों की गर्मजोशी को ठण्डा करने की कोशिश भी करती है और कभी ब्लिज़ार्ड या एवलॉन्च का रूप धरकर उसे डराती-धमकाती भी है।

बीस-बाइस हजार फुट ऊंची पोस्ट पर बैठे जवानों को अकेलापन, अलगाव सताता होगा? क्या मनोरंजन की ख्वाहिश उन्हें रहती है या एक बंधी-बंधाई दिनचर्या उनके हिस्से आने वाले चौबीस घंटे को हर दिन सुरसा की तरह निगल जाती है?

बर्फानी दरिया पर इंसानी बस्‍ती की रौनक !!!!

बर्फीले दरिया की विशाल काया और आसपास खड़ी ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरने पर ऐसे ही कई सवाल मन को मथने लगे हैं। और हम जवाब की तलाश में कभी उनके तंबुओं में झांकते हैं तो कभी उन्हें कुरेदते हैं। किसी जवान के सिरहाने किसी मैगज़ीन का पुराना अंक दिखाई दे रहा है तो किसी ने अपने मोबाइल को ही अपना मनोरंजन बना रखा है। यहां मोबाइल का इस्तेमाल फोन के सिवाय बाकी दूसरे हर काम के लिए होता है, बतौर घड़ी, टॉर्च, एमपी3 हर किसी रूप में उसकी अहमियत है, लेकिन अपने प्रियजनों से बतियाने के लिए उन्हें सैटलाइट फोन पर निर्भर रहना पड़ता है। और इस फोन की ’सुलभता’ आपको राशन में मिलने वाली चीनी की याद दिला देगी! गुजरे ज़माने की याद ताज़ा करती और भी बहुत-सी रवायतें आज भी सियाचिन के माहौल में ज़िंदा हैं। मसलन, चिट्ठियां! आप ज़रा फेसबुक पीढ़ी के बच्चों से अंतरर्देशीय पत्र या पोस्टकार्ड के बारे में पूछकर तो देखिए, उनकी आंखों में आपको बड़ा-सा सवाल दिखायी देगी। लेकिन सियाचिन के सीने पर चौकसी करता सिपाही आज भी अपने घर चिट्ठी लिखता है और उस तक भी चिट्ठियां पहुंचती हैं। हेलिकॉप्टर ही यहां डाकिए की भूमिका भी निभाते हैं। मौसम साफ रहने पर महज़ सात दिनों में उसकी चिट्ठी देश के किसी भी भाग में पहुंचा दी जाती है। ‘ओल्ड एज चार्म’ को इस कोल्ड-स्टोरेज ने सचमुच बरकरार रखा है।

अखबारों का यहां किसी को इंतजार नहीं रहता। उसे पढ़ने की सुध भी किसे है। सोना-जागना, खाना-पीना, देश की बुलंदियों की रखवाली और इस पूरी व्यवस्था को चालू रखने के लिए लॉजिस्टिक्स के जोड़-तोड़ में ही अंधेरा हो जाता है। शाम छह बजे डिनर, फिर रसोई समेटने की तिकड़म और हैंड-फुट परेड! अगर एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट सामान पहुंचाना है तो वो काम कई-कई मार्गों पर रात दो-ढाई बजे ही शुरू हो जाता है। ग्‍लेशियर में एवलॉन्च की आशंका वाले इलाकों में रात में ही यह गतिविधि शुरू हो जाती है ताकि दिन निकलने के बाद बर्फ पिघलने से पहले-पहले सैनिकों के बूटों की आवाज़ थम जाए। इसी तरह, एक पोस्ट से दूसरी पर बदली होने, या पोस्ट से वापसी का सफर भी रात में या मुंह अंधेरे ही शुरू करने पर ज़ोर रहता है।

………….

कैंप 2 की ओर बढ़ते कदम

आज कैंप 2 की ओर काफिला बढ़ गया है। करीब 14 किलोमीटर की दुर्गम ट्रैकिंग के दौरान क्रिवासों की उलझन बढ़ गई है। हाफलिंक के बाद तो बर्फ का संसार कुछ ज्यादा ही बर्फीला हो गया है। अब सभी ने अपने अपने बूटों के नीचे क्रैम्पॉन बांध लिए हैं। कुछ चेहरों पर थकान की लकीरें उभर आयी हैं, जो स्वाभाविक भी है। आज दूसरा दिन है। अब रास्ते की नाजुक परिस्थितियों के मद्देनज़र टीम के सदस्यों को आपस में ‘रोप-इन’ कर दिया गया है। इस तरह, रस्सियों से जुड़कर ट्रैकर्स अधिक सुरक्षा बोध के साथ आगे बढ़ रहे हैं। सवेरे 7 बजे से चलते-चलते दोपहर के दो बजने को आए हैं, हर किसी की निगाहें ‘शीश-महल’ तलाश रही हैं। हमारी टीम ने कैंप 1 के तंबुओं को यही नाम दिया था, और कैंप 2 पर भी वैसे ही शीश-महल दिखने की आस है।

—- जारी रहेगा सिलसिला आगे भी

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4 thoughts on “Siachen trek – Once in a life time opportunity

  1. brilliantly written … thanks a lot for sharing your experience … such a detailed review … keep it up!! hope we will see some more of your experience of your visit to these amazing amazing places.

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