London Diary

लोनली प्लैनेट लिखता है कि जब आप इंग्लैंड के टूर पर निकलते हैं तो निश्चित रूप से अपने दोस्तों पर रौब जमाने के लिए कहते हैं ’मैं लंदन जा रहा हूं। यही है लंदन का आकर्षण और रुतबा कि उसके सामने इंग्लैंड भी बौना पड़ जाता है।

लेकिन मेरे साथ उल्टा हुआ, मैं 8 सितंबर, 2007 को जब लंदन की अपनी पहली और अब तक की इकलौती यात्रा पर रवाना हुई तो किसी के भी पूछने पर कुछ दबे ढके से अंदाज़ में ’यू.के.‘ बताया करती है, सोचती थी लंदन जैसे भारी भरकम, रौबदार शहर का नाम लूंगी तो कहीं सामने वाले को यह न लगे कि ’बहुत अकड़ रही है, लंदन का गुमान हो गया है अभी से।‘ बहरहाल, ये भी तो लंदन नाम से जुड़े रोमांच की ओर ही इशारा करता है। कुछ हो, इतना तो सच है कि लंदन अपने आप में एक गज़ब का शहर है। बालाजी ने जब एक रोज़ ऑनलाइन देखकर पूछा था – ’आर यू बैक‘ तो मैंने ठोंककर लिख डाला था – ’नो, स्टिल इन लंडन‘। और पलटकर जो ’वाउ!‘ मेरे चैट बॉक्स में दिखा था उसके पीछे छिपे रोमांच को मैं वहां 6000 मील दूर बैठकर भी महसूस कर रही थी।

लंदन की ट्यूब (वहां की मैट्रो का यही प्यार भरा नाम है) में चढ़ते उतरते, साफ सुथरी सड़कों पर घूमते हुए बस एक ही वाक्य मन में गूंजता था –लाइफ इन लंडन इज़ ए सॉन्ग… इफ यू कैन सिंग इट वैल! और वहां जीवन गुनगुनाता रहे इसके लिए जेब में अमेरिकन एक्सप्रेस के टीसी और वॉलेट में बीसियों रंग बिरंगे कार्ड होना जरूरी है। यह बात मैंने पहले ही दिन, हीथ्रो पर उतरते ही जान ली थी। हीथ्रो से मैट्रो हाउस तक टैक्सी चालक ने पूरे 60 पौंड लिए थे (हालांकि अमूमन 22-23 पौंड बनने हैं पर हमने शाम 6 बजे से उसे बुला लिया था जबकि इमीग्रेशन औपचारिकताओं को पूरा करते करते रात के 11 बजे हम उसमें सवार हुए थे)। बहरहाल, हमें अगले कई दिनों तक ऐसे झटके लगने थे, मगर परवाह किसे थी।

पहली सुबह मैट्रो हाउस से यही कोई 500 मीटर दूर बने उडिपी रेस्तरां में इडली वड़े और गरमा गरम कॉफी के नाश्‍ते का बिल जब यही कुछ 7 पौंड चुकाया तो मन ही मन तय कर लिया कि मैट्रो हाउस की किचन में पकाएंगे खाएंगे। बर्तन कुछ साथ लाए थे, सो समस्या ज्यादा नहीं थी। फिर मैट्रो हाउस हैरो/कैंटन के उस इलाके में ही था जो गुजरातियों का गढ़ माना जाता है। यानी यहां पापड़ अचार से लेकर ढोकला तक आसानी से उपलब्ध था (अलबत्ता, कीमत इतनी ऊंची होती है कि आप बहुत जरूरत होने पर ही खरीदने का फैसला करेंगे)। सब्जियों और फलों की बहार थी, हम दो वेजीटेरियन प्राणियों के लिए जैसे प्रकृति ने सब बंदोबस्त अपने आप ही कर डाला था।

लंदन शहर को कॉस्मोपॉलिटन नाम यूं ही नहीं मिल गया। मुझे तो लगा जैसे वहां ब्रिटिश नागरिक कम और भारतीय/चीनी/अफ्रीकी/पाकिस्तानी/बांग्लादेशी ज्यादा हैं। आंकड़े भी कुछ ऐसी ही कहानी बयान करते हैं। लंदन की हवा में, फितरत में, जीने के अंदाज़ में और उसकी शोख अदा में जैसे थेम्स से लेकन सीन तक गंगा-जमुनी से लेकर जाने कैसी कैसी संस्कृतियों का घोल मिला है। भारतीय लंदन, चीनी लंदन, नीग्रो लंदन, साडा पंजाबी लंदन, ऐसे ही कितने इलाके हैं लंदन में जो अलग अलग नस्लों के वाशिन्दों की वजह से जाने जाते हैं। सुरक्षित लंदन तो कहीं कालों की बस्तियों वाला असुरक्षित अपराध-ग्रस्त लंदन। भागता दौड़ता, अपने में मस्त लंदन। किसी को किसी की परवाह नहीं। इंसान मशीन जैसे और मशीनें आदमी जैसी हो गई हैं। ट्यूब स्टेशन पर, ट्यूब के भीतर, एस्केलेटर पर चढ़ते उतरते एक सा नज़ारा। कभी कभी लगता है बड़ा ही निठुर हृदयहीन शहर है लंदन। मोनोटोनस और इतना एकरस की सब जगह, सब कुछ एक जैसा। सबवे साफ सुथरे, बसों में चढ़ने के लिए कतारें, धक्का मुक्की का नामो निशान नहीं, बाजारों में खूबसूरत विंडो से सजे सजाए शोरूम, कंज्यूमरिज़्म इतना कि देखकर उबकाई आ जाए। स्टोर्स पर बिक्री के लिए सामान ही सामान ठुंसा हुआ। सड़कों के किनारे जगह जगह छोटे छोटे खूबसूरत स्टोर्स जिनमें लाखों हजारों तो नहीं मगर सैंकड़ों वैरायटी के सैंडविच, पेस्ट्री, केक, चॉकलेट, शेक, ड्रिंक बिकते हैं। खरीदने के लिए काउंटर पर पहुंचते ही स्वागती मुस्कान आपका संकोच दूर कर देती है। आपकी मदद करने को आतुर सेल्सकर्मी, असिस्टेंट जगह जगह तैनात हैं। खरीदने पर मशीनी मुस्कान के साथ थैंक्यू कहना कोई नहीं भूलता। सच है अजनबियों के इस शहर में रहते हुए कभी कभी तो लगता ही नहीं कि आप यहां गैर हैं, नए हैं, पराए हैं, हर कोई आपके साथ सहजता से पेश आता है। लेकिन इस शहर की सहजता और स्वाभाविकता बस इतने तक ही सिमटकर रह गई है। काम से काम रखने वाला शहर। बाकी किसी बात से इसे कोई सरोकार नहीं। आप हंस रहे हैं तो मस्तराम, आंखों में आंसू भरे हैं तो भी बेपरवाह। कभी कभी तो इतना बेरुखा कि आपको लगता है कहीं ये इंसान के भेस में घूमते पुतले तो नहीं हैं? ऐसे पुतले जो रोबोट की तरह रटी रटायी कुछ गतिविधियां और संवाद कर लेते हैं लेकिन जिनमें से भावनाएं नदारद हैं। कोल्ड वाइब्स देता शहर जान पड़ा लंदन। जिस गर्मजोशी और अपनेपन के हम आदी हैं उसकी अपेक्षा यहां करना बेमानी लगा। दिन भर यहां से वहां दौड़ आइये, हजारों हजार चेहरों को देख लीजिए, वही जड़ता, वही संवेदनहीनता, व्यस्तता, अपने भीतर सिमटे रहने की लंदनवासियों की फितरत आपको हैरत में डाल देगी। कभी कभी तो तकलीफ का विषय बन जाती है लंदनवासियों की ये मशीनी फितरत।

सही मायने में एकदम पेशेवर शहर। हां, आपका परिवार साथ है, यार दोस्त संग हैं तो जिंदगी इतनी दिलकश कि आप कभी यहां से जाना ही नहीं चाहेंगे। सब कुछ व्यवस्थित, अपेक्षाओं के मुताबिक यानी च्युंगम चबाने के बाद उसका रैपर फेंकने का ख्याल आने से पहले ही कचरा बिन सामने होगा, आप हर पल सुरक्षित हैं इसका अहसास दिलाते सीसीटीवी कैमरे चप्पे चप्पे पर नज़र रखते दिखेंगे, ठंड लगने पर गर्मी का इंतजाम और भूख प्यास सताते ही खाने पीने की व्यवस्था। हां, पूरे शहर में एक खास बात दिखायी देती है और वो यह कि हर आदमी, औरत, युवती और नौजवान एक बस्ता जरूर टांगकर चलता है, उसकी बहुपयोगी जेबों में भरा होता है लंदन में जीने का सामान यानी एक पॉकेट में पानी की बोतल, दूसरी में कोई रंग बिरंगा पेय, बस्ते के अंदर एक मोटा सा उपन्यास, पैंट की जेब में मोबाइल, और कान में आइपॉड की डोरी ठुंसी है। और मैट्रो का बरसों पुराना बनाया गया मानचित्र। कहते हैं इतने बरस बीत गए लेकिन इस मानचित्र में किसी सुधार की गुंजाइष कभी महसूस नहीं हुई। इंसान न हुआ पूरी चलती फिरती किट हो गया। कई बार तो देखकर अजीब सी हैरानी भी होती है कि ट्यूब में बैठा अधेड़ अपने बस्ते से कुछ पैकेट निकालकर चुपचाप खाने में जुट जाता है, आसपास के दूसरों लोगों से एकदम बेपरवाह। आप हम सोच भी नहीं सकते कि उनकी उम्र की हमारी मां या पिताजी या खुद हम कभी इस तरह किसी सार्वजनिक स्थान पर इस तरह कुछ खा सकते हैं। हम तो शायद बस में अपनी साथ वाली सीट पर किसी के बैठे होने पर पानी की बोतल भी खोलेंगे तो पहले पूछने की कोशिश करते हैं कि भई तुम भी पानी पिओगे? (अलबत्‍ता, इधर कुछ सालों से दिल्‍ली मैट्रो ने इसी संस्‍कृति का पोषण कर डाला है)। कभी ऐसा हो सकता है कि आप अकेले बैठे बैठे चाय सुड़क जाएं और ऑफिस का पियन आपका मुंह ताकता रह जाए? एक बिस्कुट में से भी आधा तोड़कर सामने वाले के साथ बांटे बगैर अपने मुंह में डालना भारी पड़ जाता है। मगर लंदन को ऐसी किसी तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ता। पता नहीं यह फायदे की बात है या शहर का ठंडापन।

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लंदन की इस बेहयाई और बेरूखेपन ने मेरा दिल तोड़ दिया था। दूसरे तीसरे ही दिन आंखों में आंसू लिए मैं सड़क पर बढ़ी चली जा रही थी – सेंट्रल लंदन में रीजेंट स्ट्रीट पर वेस्टमिंस्टर यूनीवर्सटी के ठीक सामने, सड़क पार बने लंदन के सबसे विख्यात स्थल के गेट पर खड़ी थी। मैडम टूसॉड्स के प्रवेश द्वार पर टिकट विंडो तक गई, अंदर जाऊं या न जाऊं की ऊहापोह से गुजरती रही। आधा पौना घंटा यूंही गुजर गया तो सोचा समय काटने के लिए इस वैक्स म्युज़ियम का सहारा बुरा नहीं होगा। बहरहाल, बारह तेरह पौंड में टिकट कटाकर अंदर पहुंची। वाह, नज़ारा इतना शानदार! दुनियाभर की जानी मानी जाने कितनी ही हस्तियों के मोम के बने पुतले वहां लगे थे, और उन्हें देखने के लिए दुनियाभर से आए सैलानी भी कोई कम नहीं थे। कैमरों की फ्लैश हर पल चमक रही थी, हर कोई अपने संगी साथी का फोटो उसकी मनपसंद हस्ती के गले में बांहे डाले हुए पोज़ में तो कभी किसी के गाल से गाल सटाकर खड़े हुए पोज़ में उतार लेने को मचल रहा था। मेरे पर्स में उस रोज कैमरा नहीं था। न ही मेरी फोटो उतारने के लिए कोई साथ था। अकेलापन मेरे भीतर तक चुभ रहा था। आसपास कितने ही लोग थे, संगीत था, शोर था, उत्साही दर्शकों की चीखें थीं मगर मेरा मन पल पल कांच के टुकड़ों में बदल रहा था। आइ कुड फील इट सिंकिंग। चेहरे पर उदासी जमा हो चुकी थी। लग रहा था जैसे पूरा खून सर्द होकर जम गया होगा। दुनिया का इतना शानदार नज़ारा इस तरह अकेले देखूंगी कभी सोचा नहीं था। घर की याद ने सताना शुरू कर दिया था। उन ढेरों पुतलों और उनको निहारती भीड़ के बीच मैं अकेली थी, भीतर ही भीतर उस दिन कुछ दरक रहा था, टूट रहा था और मन था कि उदासी से बार बार छलनी हो रहा था। दुख का यह अहसास एकदम अलग था!

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सैमुअल जॉनसन ने एक दफा कहा था -When a man is tired of London he is tired of life! तो क्या मैं उस रोज़ लंदन से थक चुकी थी?

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