भूटान : प्रार्थना ध्वज से स्वर्ग की राह

दुनिया में ऐसे देश बेशक हो सकते हैं जहां रेलगाड़ियां नहीं दौड़ती मगर ऐसा कोई देश शायद ही होगा जिसकी सड़कों पर एक से बढ़कर एक लग्ज़री कारें तो दौड़ती हैं मगर ट्रैफिक सिग्नल की जरूरत जहां 21वीं सदी में भी महसूस नहीं होती। भारत के पूर्वोत्तर में बसे, नन्हे हिमालयी देश भूटान में ऐसे ही कई चमत्कार साक्षात देखे जा सकते हैं। और दोपहिया वाहन यहां की सड़कों पर दिखना और भी दुर्लभ दृश्‍य होता है! मैजिकल भूटान में चमत्कार हैं, मगर विरोधाभास नहीं। यहां फैशन और स्टाइल है और परंपराओं का भी उतनी ही शिद्दत से पालन होता है। स्कूल बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिला तक पारंपरिक ड्रैस ’कीरा‘ में टहलती है तो खूबसूरत, रेशमी बालों को फैशनेबल अंदाज़ में बिखराकर चलती युवती भी भूटान की इस नेशनल ड्रैस में बेहद सहज दिखायी देती है। पुरुष भी उनसे कहां पीछे रहने वाले हैं! युवकों के बालों के स्टाइल आकर्षक हैं, लेकिन वो भी पारंपरिक पोषाक  ‘घो’ (जो बाथरोब की तरह लगता है) में ज्यादातर दिखते हैं। सचमुच 15वीं और 21वीं सदी यहां एक साथ कदमताल करती दिखती हैं।

इस देश ने बहुत, धीमी, संभली हुई रफ्तार से आधुनिकता को अपनाया है। इंटरनेट, मोबाइल, टेलीविजन सरीखे आधुनिक बोध के साधनों को जैसे भूटान के हिमालयी शिखरों ने लंबे समय तक यहां दाखिल नहीं होने दिया। भूटान की राजमाता आशी दोरजी वांग्मो वांग्चुक कहती हैं कि भूटान ने अपनी विशिष्‍ट पहचान को बनाए रखने की खातिर खुद पर अंकुश लगाए रखा। अलबत्ता, पिछले एक दशक में देश ने करवट लेनी सीखी है और धीरे-धीरे ही सही मगर बदलाव की बयार राजधानी थिंपू समेत अन्य जगहों पर महसूस की जा रही है। लेकिन यहां के जीवन को देखकर लगता है कि भूटानी समाज अपनी परंपराओं को भी जकड़े हुए है।
राजधानी थिंपू के छॉरतेन लम (Chorten Lam) यानी छॉरतेन स्ट्रीट पर बने ’मेमोरियल छॉरतेन‘ (तृतीय भूटान नरेष की स्मृति में निर्मित) में स्थानीय लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी आध्यात्मिकता के दर्शन  होते हैं। सवेरे जहां बुजुर्गों की कतार यहां ध्यानमग्न, मंत्र गान करती हुई दिखती है तो हर शाम युवाओं-प्रौढ़ों का एक कारवां इस पवित्र परिसर में परिक्रमा करने के लिए उमड़ता है। उम्र, जाति और पेशेगत भेदों से परे, कर्मकांडों से मुक्त ये स्थानीय लोग हाथ में माला, मणि लिए होते हैं, उनके होंठों पर सजे होते हैं बौद्ध गान और पैरों में नाइके, एडिडास के मंहगे जूते उनकी रफ्तार को बनाए रखते हैं।

करीब सात लाख की आबादी वाले इस देश में जिंदगी बहुत सहज लगती है, खासतौर से भारत के बस-अड्डों और रेलवे स्टेशनों की धक्का-मुक्की के बाद यहां जब आप कहीं भी भीड़ नहीं देखते तो सुखद अहसास होना स्वाभाविक है। बस स्टेशन के टिकट काउंटर पर आप प्रायः खुद को सबसे आगे पाते हैं। टैक्सी स्टैंड पर भी टैक्सियों (यहां ऑल्टो, सांत्रो, मारुति ओमनी और बोलेरो जैसी गाड़ियां टैक्सियों के रूप में इस्तेमाल में लायी जाती हैं) की कतार तो है मगर कोई शोरगुल, चिल्ल-पौं या ड्राइवरों की धींगा-मस्ती नहीं है। और अपनी मंजिल की ओर दौड़ती बस या टैक्सी की खिड़की से बाहर के खूबसूरत नज़ारों को निहारते हुए मन में यह सवाल अक्सर कौंधता है कि क्या यह देश सचमुच आखिरी शांगरी-ला है?

 

Tiger’s Nest Monastery – the most visiblesight in Bhutan

 

भूटान के बारे में लोनली प्लेनेट का दावा है कि यह ऐसा शांगरी-ला  है जिसके बारे में आप सिर्फ ख्वाबों में सोचा करते हैं कि ऐसी जगह-जमीन कहीं है, लेकिन सचमुच में है, इसका शायद इल्म भी नहीं होगा आपको! हो भी कैसे भला? हिमालय की गोद में बसे नेपाल, सिक्किम, लद्ददाख, दार्जिलिंग, हिमाचल जैसे तमाम देशों,प्रदेशों का मिला-जुला नज़ारा भूटान में बेशक है, मगर यह देश सबसे अलहदा है। लाल-पीले वस्त्रों में ढके बौद्ध भिुक्षओं के रूप में लेह-लद्दाख की झलक यहां दिखती है तो है लेकिन मठों (जिन्हें यहां ज़ोन्खा – Dzong कहा जाता है और जो सिर्फ मठ ही नहीं होते बल्कि अक्सर प्रशासनिक महकमे भी होते हैं   और प्राचीनकाल में किलों के तौर पर भी इस्‍तेमाल हुआ करते थे) का विशिष्‍ट वास्‍तुशिल्‍प इसके लैंडस्केप को अद्भुत पहचान देता है। बौद्ध धर्म ने यहां तांत्रिक धारा के रूप में अपनी जड़ें जमायी हैं, लिहाजा पूरी भूटान भूमि पिछली कई सदियों से आध्यात्म की एक खास लय-ताल को गुनगुना रही है।

पारो जॉन्‍ग 

करीब चार साल पहले अमरीकी राष्ट्रपति पद की दौड़ में हार का स्वाद चखने के बाद जॉन मैक्केन अपने घावों में मरहम भरने भूटान रिट्रीट पर आए थे और यहां के सुकून भरे माहौल ने उनकी आत्मा तक को सराबोर कर दिया था। इस जादुई हिमालयी प्रदेष में आप खुद को महसूस कर सकते हैं, खुद से संवाद कर सकते हैं और तब लगता है कि ये जमीन सचमुच रिज्यूवनेषन के लिए ही बनी है।

इस हिमालयी साम्राज्य ने बेहद सूझबूझ से उस हिप्पी कल्चर से खुद को दूर रखा है जिसने नेपाल जैसे एक और हिमालयी देष को भ्रष्‍ट कर डाला है। भूटान ने बहुत समय तक विदेशी टूरिस्टों के लिए अपने दरवाजे बंद रखे और जब 1974 में पर्यटन का झोंका आया भी तो बेहद सधे हुए अंदाज़ में ऐसा हुआ। टूरिज़्म के अद्भत मॉडल के चलते यहां लो इम्पैक्ट, हाइ वैल्यू पर्यटन पर ज़ोर दिया गया है। विदेशियों के लिए जहां भूटान में सैर-सपाटा काफी खर्चीला है (करीब 200 से 250 डॉलर प्रति व्यक्ति/प्रतिदिन)। वहीं आम भारतीय सैलानी अपने मनमाने बजट के अनुरूप इस नन्हे से देश (पूर्व से पश्चिम तक कुल जमा 200 मील और उत्तर से दक्षिण तक सिर्फ 100 मील) को अपनी रफ्तार से देख-जान सकते हैं।  अलबत्ता, उन्हें यहां आने के लिए विशेष  परमिट (भारतीयों के लिए वीज़ा की जरूरत नहीं है) लेना होता है जो सड़कमार्ग से आने पर फ्युंशलिंग (पश्चिम बंगाल में न्यू जलपाईगुड़ी से करीब 165 किलोमीटर दूर), समद्रुप जोंखार (गोवाहाटी से 110 किलोमीटर दूर) या असम-भूटान सीमा पर गेलेफू स्थित इमीग्रेशन कार्यालय से जारी किया जाता है।

भूकंप से क्षतिग्रस्‍त पारो नेशनल म्‍युज़ियम

आम भूटानी नागरिक को जैसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाहरी दुनिया किस रफ्तार से दौड़ रही है। वह अपनी मंथर चाल से, अपनी संस्कृति, अपनी रवायतों में पूरी तरह मस्त है। थिंपू शहर हो या पारो की गलियां, हर जगह मुस्कुराते, खिलखिलाते चेहरे और आत्मा की गहराई तक आत्म संतुष्‍ट भूटानी देश के Gross national happiness – GNH  के समीकरण की जैसे जीती-जागती मिसाल है।

चौथे भूटान नरेश जिग्मे सिग्मे वांग्चुक ने 1972 में देश की तरक्की को नापने के लिए जब जीडीपी जैसे ठोस आर्थिक पैमाने के बजाय जीएनएच को ज्यादा तवज्जो देने का नारा बुलंद किया था तो देखा-देखी कुछ यूरोपीय देशों ने भी इस ’राजनीतिक फुटबॉल‘ को खूब उछाला था। दुनिया के बाकी देशों में इस फुटबॉल की सिलाई कभी की उधड़ चुकी है लेकिन भूटान में आज खुशहाली का आलम यह है कि हर कोई अपने वर्तमान से पूरी तरह मंत्रमुग्ध दिखता है। अकेले हैं, दुकेले हैं, परिवार के संग हैं या परिवार से दूर किसी मोनैस्ट्री की छत्रछाया में हैं, हर चेहरे पर मस्ती का अनूठा रंग है जो आपको देश के इकलौते हवाई अड्डे (पारो) पर उतरते ही दिखने लगता है। थिंपू शहर से करीब 55 किलोमीटर (90 मिनट का सड़क मार्ग से सफर)  दूर खूबसूरत पारो घाटी में स्थित यह हवाई अड्डा काफी ऊपर से ही से दिखने लगता है। यह हवाई अड्डा दुनिया के सबसे खतरनाक लैंडिंग वाले हवाई अड्डों में गिना जाता है, मगर यहां उतरने के बाद आप खुद को ऐसे अनोखे भूटानियों के बीच पाते हैं जिनके चेहरे की मांसपेशियों ने संभवतः हंसना ही सीखा है। कभी कभी तो मन होता है किसी को रोककर पूछने का कि तनाव, दबाव, गम और चिंता से परे कैसे रहता है उनका समाज? और तभी बौद्ध दर्शन याद दिलाता है कि जीवन अनावश्‍यक दुखों को सहने के लिए नहीं बना। बुद्ध की इस शिक्षा को अगर सही मायने में किसी ने अपनाया है तो वह भूटानी समाज ही है। तभी तो साल भर तरह-तरह के उत्सवों, नृत्य, छंग (स्थानीय शराब) की मस्ती में भूटानी समाज डूबा रहा है।

कभी सत्तर के दशक की शुरूआत तक घर-परिवार ही शादी-ब्याह तय करते थे यहां और आज लड़का-लड़की खुद ही अपना जीवन साथी तलाशकर कभी शादी की रवायत के संग तो कभी ’लिविंग टुगैदर‘ की व्यवस्था के तहत् साथ-साथ जीने-मरने की कसमें उठा लेते हैं। मातृ-सत्तामक समाज व्यवस्था आम है, लिहाजा षादी के बाद लड़का अपनी पत्नी के घर में शिफ्ट हो जाता है। और तलाक की नौबत आती है तो उतने ही सहज ढंग से वापस अपने पुराने घर लौट जाता है!

एक समय हुआ करता था कि हर घर से एक लड़का मठ की राह अवश्‍य पकड़ता था लेकिन आज भूटानी समाज इस बंधन से मुक्त है। जो परिवार अपने बच्चों को बौद्ध भिक्षु या भिक्षुणी बनाने का फैसला करते हैं, वे स्वतंत्र रूप से, बिना किसी दबाव के ऐसा करते हैं। लेकिन भूटान में जगह-जगह बिखरी मोनैस्ट्री और ननरी (भिक्षुणियों के मठ) इस बात की गवाह हैं कि बौद्ध धर्म की इस अनूठी व्यवस्था की जड़ें आज भी भूटानी समाज शिद्दत से सींच रहा है।

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